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    क़ज़ा नमाज़़

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    सवाल 521:  मैं 17 साल की उम्र तक एहतेलाम और ग़ुस्ल वग़ैरह के बारे में नहीं जानता था और उन उमूर के मुताल्लिक़ किसी से भी कोई बात नहीं सुनी थी ख़ुद भी जनाबत और गु़स्ल वाजिब होने के मानी नहीं समझता था लिहाज़ा क्या उस उमर तक मेरे रोज़े और नमाज़ों में हर्ज है? आप मुझे इस फ़रीज़े से मुत्तला फ़रमायें जिस का अंजाम देना मेरे ऊपर वाजिब है?

    जवाब:  उन तमाम नमाज़ों की क़ज़ा वाजिब है जो आपने जनाबत की हालत में पढ़ी हैं लेकिन अस्ल जनाबत का इल्म न होने की सूरत में आपने जो रोज़े जनाबत की हालत में रखे हैं वो सही और काफ़ी हैं उनकी कज़ा वाजिब नहीं है।
    सवाल 522:  अफ़सोस के मैं जहालत और इरादे में कमज़ोर होने की वजह से इसतमना किया करता था जिसकी वजह से कुछ औक़ात (कभी-कभी) नमाज़ नहीं पढ़ता था लेकिन मुझे ये मालूम नहीं है कि मैंने कितनी मुद्दत तक नमाज़ छोड़ी है मेरा नमाज़ न पढ़ना मुसलसल नहीं था (यानी में कभी कभार नमाज़ पढ़ता था) बल्कि उन्हीं औक़ात में नमाज़ नहीं पढ़ता था जिनमें मुजनिब (यानी जिस पर ग़ुस्ले जनाबत वाजिब हो जाता है) होता था और गु़स्ल नहीं कर पाता था, मेरे ख़्याल में 6 महीने की नमाज़ छूटी होगी और मैंने उस मुद्दत की क़ज़ा नमाज़ों को बजा लाने का इरादा कर लिया है, क्या इन नमाज़ों की क़ज़ा वाजिब है?
    जवाब:  जितनी पंजगाना नमाज़ों के बारे में आपको यक़ीन है कि अदा नहीं की हैं या हालते जनाबत में पढ़ी हैं उनका क़ज़ा वाजिब है?
    सवाल 523: जिस शख़्स को ये मालूम न हो के उसके ज़िम्मे कज़ा नमाज़ें हैं या नहीं अगर बिलफ़र्ज़ उसके जि़म्में क़ज़ा नमाज़ें हों तो क्या उसकी मुस्तहब और नाफ़िला के तौर पर पढ़ी हुई नमाज़ें क़ज़ा नमाज़ें शुमार हो जायेंगी?
    जवाब:  नवाफ़िल और मुस्तहब नमाज़ें क़ज़ा नमाज़़ शुमार नहीं होंगी अगर उसके ज़िम्मे क़ज़ा नमाज़ें हैं तो उनको क़ज़ा की नियत से पढ़ना वाजिब है।
    सवाल 524:  मैं तक़रीबन 6 माहिने पहले बालिग़ हुआ हूं और बालिग़ होने से कुछ हफ़्ते पहले तक मैं ये समझता था कि बलूग़ की अलामत सिर्फ़ क़मरी हिसाब से 15 साल का मुकम्मल होना है मगर मैंने अब एक किताब का मुतालेआ किया है जिसमें लड़कों के बलूग़ की दूसरी निशानियाँ बयान हुई हैं जो मुझमें पाई जाती थीं लेकिन मैं ये नहीं जानता कि ये निशानियां कब से शुरू हुई हैं क्या अब मेरे ज़िम्मे नमाज़ रोज़े की क़ज़ा है या नहीं? वाज़ेह रहे कि मैं कभी-कभी नमाज़ पढ़ता था और पिछले साल रमज़ान के महीने के पूरे रोज़ मैंने रखे हैं लिहाज़ा मेरी ज़िम्मेदारी क्या है?
    जवाब:  उन तमाम रोज़ों और नमाज़ों की क़ज़ा वाजिब है जिनके शरई तौर पर बालिग़ होने के बाद छूट जाने का यक़ीन हो।
    सवाल 525:  अगर कोई शख़्स माहे रमज़ान में तीन गु़स्ले जनाबत अंजाम दे मसलन एक गु़स्ल 20 तारीख़ को दुसरा 25 तारीख़ तीसरा 27 तारीख़ को अंजाम दे और उसे यक़ीन हो जाये के इस में से एक गुस्ल बातिल था तो उस शख़्स की नमाज़ और रोज़े का क्या हुक्म है?
    जवाब:  रोज़े सही हैं लेकिन नमाज़ की क़ज़ा उस पर वाजिब है कि इसे बरीउज़जि़म्मा होने का यक़ीन हासिल हो जाये। (यानी उसे अपनी ज़िम्मेदारी ख़त्म होने का अहसास हो जाये)
    सवाल 526:  एक शख़्स ने एक अर्से तक हुक्मे शरई को न जानने की बिना पर गु़स्ले जनाबत में तरतीब का ख़याल नहीं किया तो उस की नमाज़ और रोज़ों का क्या हुक्म है?
    जवाब:  अगर गु़स्ल इस तरह अंजाम दिया हो जो शरअन बातिल हो तो जो नमाज़ें उसने हदस अकबर की हालत में पढ़ी हैं उनकी क़ज़ा वाजिब है, लेकिन उसके रोज़े अगर वो इस वक़्त अपने गु़स्ल को सही समझता था तो सही हैं।
    सवाल 527:  जो शख़्स एक साल की क़ज़ा नमाज़ें पढ़ना चाहता है उसको किस तरह क़ज़ा करनी चाहिये?
    जवाब:  वो किसी एक नमाज़ को शुरू करे और फि़र इन्हें नमाज़े पंजगाना की तरह पढ़ता रहे।
    सवाल 528:  अगर किसी शख़्स पर काफ़ी अर्से की क़ज़ा नमाज़ें वाजिब हों तो क्या वो नीचे दी गई तरतीब के मुताबिक़ उन की क़ज़ा करके पढ़ सकता है?
    (1)  सुबह की मसलन बीस नमाज़ें पढ़े।
    (2)  ज़ोहर व असर से हर एक की बीस-बीस नमाज़ें पढ़े।
    (3)  मग़रिब व इशा में से हर एक की बीस-बीस नमाज़ें पढ़े और साल भर इसी तरीक़े पर अमल पैरा रहे।
    जवाब:  ज़िक्र किये गऐ तरीक़े से क़ज़ा नमाज़ें पढ़ने में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 529:  एक शख़्स का सर ज़ख़्मी हो गया है और ये ज़ख़्म इसके दिमाग़ तक जा पहुंचा है इसके नतीजे में उसका हाथ, बायां पैर और ज़बान में फ़लज का मरज़ हो गया है चुनांचे वो नमाज़ का तरीक़ा भूल गया है और वो इसे दोबारह सीख भी नहीं सकता है, लेकिन किताब से पढ़ कर या कैसिट से सुनकर नमाज़ के मुख़्तलिफ़ हिस्सों को समझ सकता है, उस वक़्त नमाज़ के सिलसिले में उस के सामने यह मुश्किले हैं: (1) वो पेशाब के बाद तहारत नहीं कर सकता और न ही वुज़ू कर सकता है।
    (2) नमाज़ में किरअत उस के लिये मुश्किल है, इस का क्या हुक्म है? और इसी तरह तक़रीबन 6 माहीने से उसकी जो नमाज़ें छूट गई हैं, इनका क्या हुक्म है?
    जवाब:  अगर वुज़ू या तयम्मुम कर सकता हो चाहे दूसरों की मदद से ही हो तो वाजिब है कि वह जिस तरह नमाज़ पढ़ सके, नमाज़ पढ़े, चाहे कैसिट सुनकर या किताब देखकर या किसी तरीक़े से और पिछली नमाज़े जो छूट गई हों उन की क़ज़ा वाजिब है, मर ये के जिस नमाज़ के पूरे वक़्त में वो बेहोश रहा हो तो उसकी क़ज़ा वाजिब नहीं है और अगर बदन का पाक रखना उस के लिये मुमकिन नहीं है हत्ता के किसी दूसरे की मदद से भी तो उस की नमाज़ के लिये बदन के नजिस होने में कोई हर्ज नहीं है और उसकी नमाज़ सही है।
    सवाल 530:  मैंने जवानी के ज़माने में मग़रिब व इशा और सुबह की नमाज़ों से ज़ोहर व असर की नमाज़ें ज़्यादा क़ज़ा की हैं, लेकिन न मैं उन के तसलसुल को जानता हूं न तरतीब को और न उनकी तादाद को क्या इस मौक़े पर उस नमाज़़ को तकरार  के साथ पढ़ना होगा? और ये कि नमाज़ में तकरार के क्या मानी हैं? उसकी वज़ाहत फ़रमाइये।
    जवाब:  क़ज़ा नमाज़ों में तरतीब करना वाजिब नहीं है लेकिन अगर ज़ोहर व असर और मग़रिब व इशा की नमाज़ें एक दिन से मुताल्लिक़ हों तो उन में तरतीब ज़रूरी है और जितनी नमाज़ों के छूट जाने का आपको यक़ीन हो उन्हीं की क़ज़ा बजा लाना काफ़ी है और तरतीब के लिये आप पर दौर यानि तकरार की नमाज़ वाजिब नहीं है।
    सवाल 531:  शादी के बाद कभी-कभी मुझ से एक क़िस्म का बहने वाला माद्दा निकलता है जिसे मैं नजिस समझता था इसलिये गु़स्ले जनाबत की नीयत से गु़स्ल करता और फि़र वुज़ू के बग़ैर नमाज़ पढ़ता था, ”तौज़ीहुल मसाइल (फ़तवों की किताब)“ में इस बहने वाले माद्दे को ”मज़ी“ का नाम दिया गया है, अब ये फ़ैसला मैं नहीं कर पा रहा हूं के जो नमाज़ें मैंने मुजनिब (यानी जिस पर ग़ुस्ले जनाबत वाजिब हो जाता है) हुए बग़ैर गुस़्ले जनाबत करके बग़ैर वुज़ू के पढ़ी हैं उनका क्या हुक्म है?
    जवाब:  वो तमाम नमाज़ें जो आपने बहने वाले माद्दे के निकलने के बाद गु़स्ले जनाबत करके बग़ैर वुज़ू किये अदा की हैं, उनकी क़ज़ा वाजिब है।
    सवाल 532: काफ़िर अगर (बालिग़ होने के बाद) कुछ अरसे बाद इस्लाम लाये तो क्या उस पर उन नमाज़ों और रोज़ों की क़ज़ा वाजिब है? जो उस ने अदा नहीं की हैं?
    जवाब:  वाजिब नहीं है।
    सवाल 533: कुछ लोगों ने कम्यूनिस्टों के गुमराह कुन प्रोपैगंडे के नतीजे में कई साल तक अपनी नमाज़ और दूसरे वाजिबात तर्क कर दिये थे, लेकिन इमाम ख़ुमैनी की तरफ़ से साबिक़ सोवियत यूनीन के हुक्मरानों के नाम तारीख़ी पैग़ाम के आने के बाद उन्होंने खु़दा से तौबा करली है और उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हो गया है और अगर वो छूट जाने वाले तमाम वाजिबात की क़ज़ा नहीं कर सकते उन का क्या हुक्म है?
    जवाब:  जितनी मिक़दार में भी मुमकिन हो उन पर छूट जाने वाले वाजिबात की क़ज़ा करना वाजिब है और जिस मिक़दार पर क़ादिर नहीं हैं उसकी वसीयत करना ज़रूरी है।
    सवाल 534: एक शख़्स मर गया है और उसके ज़िम्मे रमज़ानुल मुबारक के रोज़े और क़ज़ा नमाज़े हैं और इसका कोई बेटा भी नहीं है लेकिन उसने कुछ माल छोड़ा है, अब अगर उसे फ़क़त माहे मुबारके रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा पर ख़र्च किया जाये तो नमाज़ों की क़ज़ा बाक़ी रहेगी या फ़िर उससे नमाज़े पढ़वाई जा सकती हैं और रोज़े बाक़ी रह जाते हैं तो इस सूरत में किस को पहला अदा किया जाये?
    जवाब: नमाज़ और रोज़ों में से एक को दूसरे पर तरजीह नहीं है और वारिसों पर वाजिब नहीं है कि उसके छोड़े हुऐ माल को उसकी नमाज़ और रोज़ों की क़ज़ा के लिये ख़र्च करें मगर ये कि उसने उसकी वसीयत की हो तो उसके एक तिहाई माल से उसकी जितनी नमाज़ों और रोज़ों की क़ज़ा के लिये किसी को अजीर बनाना मुमकिन हो तो अजीर बनाइये।
    सवाल 535: मैं ज़्यादा तर नमाज़ पढ़ता रहा हूं और जो छूट गई हैं उनकी क़ज़ा की है, ये छूट जाने वाली नमाज़ें वो हैं जिन के औक़ात में, मैं सो रहा था या उस वक़्त मेरा बदन व लिबास नजिस था कि जिन का पाक करना मुशकिल था, लिहाज़ा नमाज़े पंजगाना, नमाज़े क़स्र और नमाज़े आयात में से अपने ज़िम्मे में मौजूद नमाज़ों का हिसाब कैसे लगाऊं?
    जवाब:  जितनी नमाज़ों के छूट जाने का यक़ीन हो उन्हीं की क़ज़ा बजा लाना काफ़ी है और उस में से जितनी मिक़दार के बारे में आप को ये यक़ीन हो के वो क़स्र हैं या नमाज़ आयात, तो उन्हें अपने यक़ीन के मुताबिक़ बजा लाइये और बाक़ी को नमाज़े पंजगाना के तौर पर पढि़ये इस से ज़्यादा आपके ज़िम्मे कोई चीज़ नहीं है।