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    क़ज़ा नमाज़

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    सवालः अगर कोई इंसान सुबह़ की नमाज़ को उसके समय निकल

    जाने के बाद क़ज़ा की नियत से पढ़ना चाहता है तो क्या उसे ऊँची

    आवाज़ से पढ़ेगा या धीमी आवाज़ से?
    जवाबः सुबह़ मग़रिब और इशा की नमाज़ों के

    अलह़म्द और उसके बाद वाले सूरे को ऊँची

    आवाज़ में पढ़ना ज़रूरी है चाहे उसके समय में

    पढ़े या समय के निकल जाने के बाद पढ़े चाहे दिन

    में पढ़े या रात में और अगर किसी ने जानबूझ कर

    सूरों को ऊँची आवाज़ में नहीं पढ़ा तो नमाज़ बातिल है।