islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. क़िबले के अहकाम

    क़िबले के अहकाम

    Rate this post

    (784) ख़ान-ए-काबा जो कि मक्क-ए-मकर्रेमा में है वह हमारा क़िबला है, लिहाज़ा (हर मुसलमान के लिए) ज़रूरी है कि उसके लिए सामने ख़ड़े हो कर नमाज़ पढ़े। लेकिन जो इंसान उससे दूर हो अगर वह इस तरह ख़ड़ा हो कि लोग कहे कि क़िबले की तरफ़ मुँह कर के नमाज़ पढ़ रहा है तो काफ़ी है और दूसरे काम जो क़िबले की तरफ़ मुँह कर के अंजाम देने ज़रूरी हैं। (मसलन हैवानात को जिबह करना) उनके बारे में भी यही हुक्म है।

    (785) जो इंसान ख़ड़े हो कर वाजिब नमाज़ पढ़ रहा हो उसके लिए ज़रूरी है कि उसका सीना और पेट क़िबले की तरफ़ हो बल्कि उसका चेहरा क़िबले से बहुत ज़्यादा फिरा हुआ नहीं होना चाहिए और एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसके पावँ की उंगलियां भी क़िबले की तरफ़ हों।

    (786) जिस इंसान के लिए नमाज़ बैठकर पढ़नी हो ज़रूरी है कि उसका सीना और पेट नमाज़ के वक़्त क़िबले की तरफ़ हो। बल्कि उसका चेहरा भी क़िबले से बहुत ज़्यादा फ़िरा हुआ न हो।

    (787) जो इंसान बैठकर नमाज़ न पढ़ सके तो ज़रूरी है कि दाहिने पहलू के बल यूँ लेटे कि उसके बदन का अगला हिस्सा क़िबले की तरफ़ हो और अगर यह मुमकिन न हो तो ज़रूरी है कि बायें पहलू के बल यूँ लेटे कि उसके बदन का अगला हिस्सा क़िबले की तरफ़ हो। और जब तक दाहिने पहलू के बल लेट कर नमाज़ पढ़ना मुमकिन हो एहतियाते लाज़िम की बिना पर बायें पहलू के बल लेटकर नमाज़ न पढ़े। अगर यह दोनों सूरतें मुमकिन न हों तो ज़रूरी है कि पुश्त के बल यूँ लेटे कि उसके पावँ के तलवे क़िबले की तरफ़ हों।

    (788) नमाज़े एहतियात, भूले हुए सजदे और भूले हुए तशह्हुद को क़िबले की तरफ़ मुँह कर के अदा करना ज़रूरी है और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर सजदा-ए-सहव को भी क़िबले की तरफ़ मुँह कर के अदा करे।

    (789) मुस्तहब नमाज़ रास्ता चलते हुए और सवारी की हातल में पढ़ी जा सकती है और अगर इंसान इन दोनों हालतों में मुस्तहब नमाज़ पढ़े तो ज़रूरी नहीं कि उसका मुँह क़िबले कि तरफ़ हो।

    (790) जो इंसान नमाज़ पढ़ना चाहता हो उसके लिए ज़रूरी है कि क़िबले की सिम्त को मुऐय्यन करने के लिए कोशिश करे ताकि क़िबले की सिम्त के बारे में यक़ीन या ऐसी कैफ़िय्यत जो यक़ीन के हुक्म में हो (मसलन दो आदिल आदमियों की गवाही) हासिल कर ले। अगर ऐसा न कर सके तो ज़रूरी है कि मुसलमानों की मसजिदों के मेहराब से या उनकी क़बरों से या दूसरे तरीक़ों से जो गुमान पैदा हो उसके मुताबिक़ अमल करे हत्ता कि अगर ऐसे फ़ासिक़ या काफ़िर के कहने पर जो साइंसी क़वाएद के ज़रिए क़िबले का रुख़ पहचानता हो, क़िबले के बारे में गुमान पैदा करे तो वह भी काफ़ी है।

    (791) जो इंसान क़िबले की सिम्त के बारे में गुमान करे, अगर वह उससे क़वी तर गुमान पैदा कर सकता हो तो वह अपने गुमान पर अमल नहीं कर सकता मसलन अगर मेहमान, साहिबे ख़ाना के कहने पर क़िबले की सिमत के बारे में गुमान पैदा कर ले लेकिन किसी दूसरे तरीक़े पर ज़्यादा क़वी गुमान पैदा कर सकता हो तो उसे साहिबे ख़ाना के कहने पर अमल नही करना चाहिए।

    (792) अगर किसी के पास क़िबल का रुख़ मुऐय्यन करने का कोई ज़रिया न हो (मसलन क़ुतुब नुमा) या कोशिश के बावुजूद उसका गुमान किसी एक तरफ़ न हो तो उसका किसी भी तरफ़ मुँह कर के नमाज़ पढ़ना काफ़ी है। एहतियाते मुस्तहब यह है कि अगर नमाज़ का वक़्त वसी हो तो नमाज़े चारों तरफ़ मुँह कर के पढ़े (यानी वही एक नमाज़ चार मरतबा एक एक सिम्त की जानिब मुँह कर के पढ़े)

    (793) अगर किसी इंसान को यक़ीन या गुमान हो कि क़िबला दो में से एक तरफ़ है तो ज़रूरी है कि दोनों तरफ़ मुँह कर के नमाज़ पढ़े।

    (794) जो इंसान कई तरफ़ मुँह कर के नमाज़ पढ़ना चाहता हो, तो अगर वह ऐसी दो नमाज़ें पढ़ना चाहे जो ज़ोहर और अस्र की तरह यके बाद दीगरे पढ़नी ज़रूरी है तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि पहली नमाज़ मुख़त्लिफ़ सिम्तों की तरफ़ मुँह कर के पढ़े और बाद में दूसरी नमाज़ शुरू करे।

    (795) जिस इंसान को क़िबले की सिम्त का यक़ीन न हो अगर वह नमाज़ के अलावा कोई ऐसा काम करना चाहे जिसके लिए क़िबले की तरफ़ मुँह करना ज़रूरी हो मसलन अगर वह कोई हैवान ज़िबह करना चाहता हो तो उसे चाहिए कि गुमान पर अमल करे और अगर गुमान पैदा करना मुमकिन न हो तो जिस तरफ़ मुँह कर के वह काम अंजाम दे दुरुस्त है।