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    क़िराअत और उसके अहकाम

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    सवाल 455:  उस नमाज़ का क्या हुक्म है जिसमें क़िराअते जम्हूरी (बुलन्द आवाज़ से) न हो?
    जवाब: मर्दो पर वाजिब है के सुब्ह मग़रिब और इशा की नमाज़ में हम्दो सूरा को बुलन्द आवाज़ से पढ़े लेकिन अगर भूले से या लाइल्मी की वजह से आहिस्ता पढ़लें तो नमाज़ सही और अगर जान बूझ कर आहिस्ता पढ़े तो नमाज़ बातिल है।
    सवाल 456: अगर हम सुबह की क़ज़ा नमाज़ पढ़ना चाहें तो क्या उसे बुलन्द आवाज़ से पढ़ेंगे या आहिस्ता?
    जवाब: सुबह मग़रिब और इशा की नमाज़ में चाहे वो अदा हो या क़जा हम्द व सूरा को हर सूरत में बुलन्द आवाज़ से पढ़ना वाजिब है चाहे उनकी क़ज़ा दिन में ही पढ़ी जाये और जान बूझकर बुलन्द आवाज़ से न पढ़ी जाये तो नमाज़ बातिल है।
    सवाल 457:  हम जानते हैं कि नमाज़ एक रकअत नीयत तकबीरतुल अहराम हम्द व सूरा और रुकू व सुजूद पर मुश्तमिल होती है दूसरी तरफ़ मग़रिब की तीसरी रकअत और ज़ोहर व अस्र की आख़री दो रकअतों को आहिस्ता पढ़ना वाजिब है, रेडियो और टेलीवीज़न से जो नमाज़े जमाअत पक्श की जाती हैं उसकी तीसरी रकअत में इमामे जमाअत रुकू सुजूद को बुलन्द आवाज़ से पढ़ता है बल्कि रुकू व सुजूद दोनों ही इस रकअत के जुज़ हैं जिसको आहिस्ता पढ़ना वाजिब है इस मसअले के बारे में हुक्म क्या है?
    जवाब: मग़रिब इशा व सुबह की नमाज़ में बुलन्द आवाज़ में और ज़ोहर व अस्र की नमाज़ में आहिस्ता आवाज़ से पढ़ने का वाजिब होना सिर्फ़ हम्द व सूरा से मख़सूस है जैसा कि मग़रिब व इशा की पहली दो रकअतों के अलावा बाक़ी रकअतों में आहिस्ता आवाज़ से पढ़ने का वाजिब होना सिर्फ़ सूरा-ए-हम्द या तस्बीहाते (अर्बा) से मख़सूस हैं लेकिन रुकू व सुजूद के ज़िक्र नीज़ तशहुद व सलाम और इसी तरह नमाज़े पंजगाना के दूसरे वाजिब ज़िक्रों में मुकल्लफ़ (वोह शख़्स जिस को यह मसअला पैश आया है) को इख़्तियार है के वो इन्हें बुलन्द आवाज़ से पढ़े या आहिस्ता आवाज़ से।
    सवाल 458:  अगर कोई शख़्स रोज़ाना की 17 रकअत नमाज़ों के अलावा ऐहतियातन 17 रकअत नमाज़ पढ़ना चाहता है तो क्या इस पर सुबह और मग़रिब व इशा की पहली दो रकअतों में हम्द व सूरा को बुलन्द आवाज़ से पढ़ना वाजिब है या आहिस्ता आवाज़ से भी पढ़ सकता है?
    जवाब:  नमाज़े पंजगाना के इख़फ़ात (आहिस्ता) व जहर (बुलन्द आवाज़ से) के वाजिब होने में अदा और क़ज़ा नमाज़ के लिहाज़ से कोई फ़र्क़ नहीं है चाहे वो क़ज़ा नमाज़ ऐहतियाती ही क्यों न हो।
    सवाल 459:  हम जानते हैं कि लफ़्ज़े “सलात” के आख़ीर में “त” है लेकिन अज़ान में “हय्यालस्सला” के साथ ”ह” कहते हैं, क्या ये सही है?
    जवाब: लफ़्ज़ सलात को वक्फ़ (ठहरना) की सूरत में हा के साथ ख़त्म करने में कोई हर्ज नहीं है बल्कि यही सही है।
    सवाल 460:  तफ़्सीर सूरा-ए-हम्द में इमाम खुमैनी के नज़रये को ध्यान में रखते हुए कि आपने सूरा-ए-हम्द की तफ़सीर में लफ़्ज़े मुल्क पर तरजीह (अहमियत) दी है तो क्या वाजिब व ग़ैरे वाजिब नमाज़ में इस सूरा-ए-मुबारका को ऐहतियातन दोनों तरीक़ों से पढ़ना सही है?
    जवाब:  इस मक़ाम में ऐहतियात करने में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 461:  क्या नमाज़ गुज़ार के लिये सही है कि वो ग़ैरिल मग़ज़ूबी अलैहिम पढ़ने के बाद जल्द बाज़ी किये बिना वक़्फ़ (ठहरे) करे और फिर “वलज़्ज़़ाल्लीन” पढ़ें और क्या तशहुद में लफ़्ज़े मुहम्मद पर ठहरना सही है जैसा के हम (सलावात पढ़ते वक़्त) कहते हैं” अल्लहुम्मा सवालल्ली अला मुहम्मद फिर थोड़ा ठहरने के बाद व आले मुहम्मद?
    जवाब:  इस हद तक वक्फ़ (ठहरना) और फ़ासला करने में कोई हर्ज नहीं है जब तक के जुमले की मिलावट में ख़लल पैदा न हो।
    सवाल 462: इमाम खुमैनी से नीचे दिये गऐ सवालों को मालूम किया गया हैः तजवीद में हर्फ़ “ज़्वाद” के तलफ़्फुज़ के सिलसिले में कई तरह के क़ौल हैं आप किस क़ौल पर अमल करते हैं? इसका जवाब इमाम खु़मैनी ने यूं लिखा है उलेमा तजवीद के क़ौल के मुताबिक़ हुरूफ़ के मख़ारिज की पहचान वाजिब नहीं है बल्कि हर हर्फ़ का तलफ़्फ़ुज़ इस तरह होना वाजिब है के अरब के उर्फ़ के नज़दीक इस हर्फ़ क अदा होना सही हो। अब सवाल ये हैः  अव्वलन – इस इबारत के मानी क्या हैं कि ”अरब के उर्फ़ में इस हर्फ़ का अदा होना सही हो।”
    दूसरे यह कि – “क्या इल्मे तजवीद के क़ाएदे, उर्फ़े अरब और दीनी लुग़त से नहीं बनाये गये हैं जैसा के सर्फ़ व नहू के क़ाएदें भी इन्ही से बनाये गये हैं? पस किस तरह इन दो के दर्मियान जुदाई का क़ायल होना मुमकिन है? तीसरे यह कि – अगर किसी को भरोसे मन्द तरीक़े से यक़ीन हो जाये के वो क़िराअत के वक़्त हुरूफ़ को सही मख़ारिज (मख़रज) से अदा नहीं करता या पूरी तरह से हुरूफ़ व कलेमात को सही तरीके़ से अदा नहीं करता और इसे सीखने के लिये हर लिहाज़ से मौक़ा फ़राहम है मसलन इसे सीखने के लिये अच्छी सलाहियत या मुनासिब फ़ुर्सत रखता है तो क्या सलाहियत की हद तक सही क़िराअत को सीखने के लिये कोशिश करना वाजिब है?
    जवाब:  क़िराअत के सही होने का मेयार ये है कि वो अहले ज़बान के जिनसे तजवीद के क़ाएदें व लिये गये हैं उनकी क़िराअत की कैफ़ियत के लिहाज़ से सही हों इस बिना पर हुरूफ़ में से किसी हर्फ़ के तलफ़्फ़ुज़ की कैफ़ियत में उलेमा-ए-तजवीद के अक़वाल में जो इखि़्तलाफ़ है अगर ये इखि़्तलाफ़ अहले ज़बान के तलफ़्फ़ुज़ की कैफ़ियत में इखि़्तलाफ़ हो तो मुकल्लफ़ (वोह शख़्स जिस को यह मसअला पैश आया है) को इख़्तियार है कि इन अक़वाल में से जिस क़ौल को चाहे इख़्तियार करे और जो शख़्स अपनी क़िराअत को सही नहीं समझता उसको चाहिये कि सही क़िराअत को सीखने के लिये अक़दाम करे है।