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    क़ुरआनी आईने और चराग़

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    हदीसे सक़लैन की रौशनी में “क़ुरआन और इतरत”ऐसे दो इलाही अतिये हैं जो एक दूसरे की तकमील करने वाले हैं।

    हिकमत व रविशे इलाही इस तरह क़रार पाई है कि लोग अहले बैत (अ.स.) के ज़रीए से मआरिफ़े क़ुरआन से आशना हों। बिनाबर ईन अल्लाह ने तालिबाने सआदत के लिये इमामत का एक दाइमी रास्ता मुक़र्रर फ़रमाया। क़ुरआनी मआरिफ़ इस क़द्र गहरे वसीअ व अमीक़ हैं इन्सान जिस क़द्र अहले बैत (अ.स.) के उलूम में तफ़क्कुर व तदब्बुर करे इतना ही क़ुरआन की अज़मत और मारिफ़त व इरफ़ान के चश्मे फ़ूटने शुरु हो जाते हैं।

    तौहीद के इस समुन्दर से जितना पीते जाएं तो सैराब होने के बजाए इन्सान तिशनातर होता जाता है।