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    क़ुरआने मजीद के अल्फ़ाज़ की तफ़सीर, उस की शुरुवात और तरक़्क़ी

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    क़ुरआने मजीद के अल्फ़ाज़ व इबारात और बयानात की तफ़सीर उस के नाज़िल होने के ज़माने से ही शुरु गो गई थी और ख़ुद पैग़म्बरे अकरम (स) क़ुरआन की तालीम उस के मअनों के बयानात और आयतों के मक़सद की वज़ाहत किया करते थे जैसा कि ख़ुदा वंदे आलम का इरशाद है:

    हम ने तुम पर किताब नाज़िल की है ताकि जो कुछ हम ने नाज़िल किया है उस को लोगों के लिये बयान करो। (सूरह नहल आयत 44)

    और फिर फ़रमाया:

    ख़ुदा वंद वह है जिस ने उम्मी (अनपढ़) लोगों में से एक नबी भेजा कि उस की आयतों को लोगों के लिये पढ़ कर सुनाता है और उन के नफ़्सों को पाक करता है और उन को किताब और हिकमत की तालीम देता है। (सूरह जुमा आयत 2)

    आँ हज़रत (स) के ज़माने में आप के हुक्म से कुछ लोग क़ुरआने मजीद की क़राअत, ज़बानी याद करना और उस को महफ़ूज़ रखने की कोशिशों में लगे रहते थे जिन को क़ुर्रा (क़ारी) कहा जाता था। आँ हज़रत (स) की वफ़ात के बाद आप के सहाबा और उन के बाद सब मुसलमान क़ुरआने मजीद की तफ़सीर में मशग़ूल और मसरुफ़ रहे और आज तक मसरुफ़ हैं।