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    क़ुरआने मजीद नासिख़ व मंसूख़ का इल्म रखता है

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    क़ुरआने मजीद में अहकाम की आयतों के बीच कुछ ऐसी आयतें भी पाई जाती हैं जो नाज़िल होने के बाद पहले नाज़िल होने वाली अहकाम की आयतों की जगह ले लेती हैं जिन पर उस से पहले अमल होता था लिहाज़ा बाद वाली आयतों के नाज़िल होने के साथ ही पहले से मौजूद अहकाम ख़त्म हो जाते हैं, इस तरह पहले वाली आयते मंसूख़ हो जाती हैं और बाद में आने वाली आयतें जो पहले वाली आयतों पर हाकिम बन कर आई हैं उन को नासिख़ कहा जाता है जैसा कि पैग़म्बरे अकरम (स) की बेसत आग़ाज़ में मुसलमानों को आदेश मिला था कि दूसरी अहले किताब क़ौमों के साथ संबंध बनायें और मेल जोल के साथ जीवन व्यतीत करें। जैसा कि क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है:

    पस उन्हे माँफ़ कर दो, बख़्श दो (उन की ग़ल्तियों को) अनदेखा कर दो, यहाँ तक कि ख़ुदा की तरफ़ से हुक्म आ जाये। (सूरह बक़रह आयत 109)

    उस के थोड़े ही दिनों के बाद आय ए क़िताल (जिहाद, जंग) नाज़िल हुई और संबंध और मेलजोल का हुक्म ख़त्म हो गया। जैसा कि अल्लाह तआला फ़रमाता है:

    उन लोगों के साथ जंग करो जो अल्लाह और क़यामत के दिन पर ईमान नही लाते और जिस चीज़ को अल्लाह और उस के नबी ने हराम किया है उस को हराम नही करते और सच्चे दीन को नही चुनते, यह वही अहले किताब हैं।

    हाँ, मंसूख़ करने की हक़ीक़त जो हमारे दरमियान रायज है वह यह है कि लोग मसलहत के पेशे नज़र एक हुक्म या क़ानून बना कर उस चलाने के लिये आर्डर जारी कर देते हैं और थोड़े अरसे बाद अपनी ग़लती और ख़ता का अहसास करते हुए पहले हुक्म को मंसूख़ और दूसरे क़ानून को उस की जगह पर रख देते हैं लेकिन ऐसा नस्ख़ जो जहल और ग़लती के साथ हो उसे अल्लाह तआला से संबंधित नही किया जा सकता। क्योकि अल्लाह तआला हर ग़लती से पाक है और क़ुरआने मजीद में कोई ऐसा हुक्म मौजूद नही है कि जिस की आयतों में किसी तरह का कोई इख़्तिलाफ़ पाया जाता हो।

    बल्कि क़ुरआने मजीद में नस्ख़ के बयान से मुराद, मंसूख़ हो जाने वाले हुक्म के ख़त्म हो जाने का ज़माना लिया जाता है। इस तरह से कि पहले हुक्म के बनाने और जारी करने की मसलहत सीमित और वक़्ती होती है लिहाज़ा फ़ितरी तौर पर उस हुक्म का असर भी सीमित होगा, कुछ दिनों के बाद दूसरा हुक्म आ गया ता कि पहले हुक्म के ख़त्म हो जाने का ऐलान करे। इस मसले के पेशे नज़र कि क़ुरआने मजीद तेईस साल की मुद्दत में धीरे धीरे नाज़िल हुआ है लिहाज़ा ऐसे अहकाम का होना मुकम्मल तौर पर क़ाबिल तसव्वुर है।

    हाँ, वक़्ती तौर पर एक हुक्म या क़ानून बनाना जो अभी मुकम्मल और मुस्तक़िल न हो और उस की मुद्दत ख़त्म होने के बाद उसी हुक्म या क़ानून को मुस्तक़िल कर देने में कोई हरज या बुराई नही है। क़ुरआने मजीद से भी नस्ख़ के यही मअना हासिल होते हैं।

    ख़ुदा वंदे आलम इरशाद फ़रमाता है:

    और जब हम ने एक आयत की जगह दूसरी आयत नाज़िल कर के पहली को बदल दिया है तो इस का मतलब यह है कि अल्लाह तआला जो कुछ नाज़िल फ़रमाता है उस के बारे में मुकम्मल इल्म रखता है, काफ़िर लोग इल्ज़ाम लगाते हैं क्यो कि वह नही जानते। ऐ नबी, कह दीजिये कि जो लोग ईमान लाये हैं उन को अपने अक़ायद में मज़बूत कर दे और जो लोग खुदा के हुक्म के सामने सर को झुकाते हैं उन के लिये बशारत, खुशख़बरी और हिदायत है। (सूरह नहल आयत 101, 102)