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    क़ुरआने मजीद में मोहकम व मुतशाबेह मौजूद है

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    ख़ुदा वंदे तआला अपने कलामे मजीद में फ़रमाता है:

    क़ुरआन ऐसी किताब है जिसकी आयात बहुत मोहकम (पुख़्ता, सिक़ह) हैं।

    सूरह हूद आयत 1

    और फिर फ़रमाता है:

    अल्लाह तआला ने बेहतरीन बात (अल्फ़ाज़, क़ुरआन) नाज़िल फ़रमाई है जिसकी आयात आपस में मुशाबेह और शबीह और दो दो हैं। इस किताब के बाइस जो लोग खडुदा से डरते हैं (ख़ौफ़ से) उनकी खालें उतर जाती हैं और क़ुरआन को सुन कर उन पर लरज़ा तारी हो जाता है। सूरह ज़ुमर आयत 23

    फिर फ़रमाता है:

    ख़ुदा वह है जिसने तुझ पर किताब नाज़िल फ़रमाई जबकि उसकी बाज़ आयात मोहकम हैं जो इस किताब की उम्मुल किताब, बुनियाद, माँ और मरजा हैं और बाज़ आयात मुतशाबेह हैं लेकिन जिन लोगों के दिलों में कजरवी है और इस्तेकामत से इंहेराफ़ की तरफ़ मायल हैं वह उस किताब की मुतशाबेह आयात की पैरवी करते हैं ता कि लोगों को फ़रेब और धोखा दे सकें और इस तरह फ़ितना बरपा करें इस लिये उसकी तावील बनाना चाहते हैं हालाकि उसकी तावील भी ख़ुदा के सिवा कोई नही जानता लेकिन जो लोग अपने इल्म में साबित क़दम हैं वह मुतशाबेह आयात के बारे में कहते हैं कि हम उन पर ईमान रखते हैं चूँकि यह सब आयात ख़ुदा की तरफ़ से नाज़िल हुई हैं।

    जैसा कि वाज़ेह है कि क़ुरआन की पहली आयत उसके पुख़्ता (मोहकम) होने का सुबूत फ़राहम करती है और अलबत्ता उसका मतलब यह है कि किताब (क़ुरआन) हर क़िस्म के ऐब व नक़्स और ख़लल व बुतलान से मुबर्रा है और दूसरी आयत तमाम क़ुरआन को मुतशाबेह के तौर पर मुतआरिफ़ कराती है और उससे मुराद यह है कि क़ुरआनी आयात ख़ूब सूरती, उसलूब, हलावत, लहजे और ख़ारिक़ुल आदत बयान के लिहाज़ से यकसाँ हैं और पूरे क़ुरआन की यही हालत हैं।

    और तीसरी आयत जो इस बाब में हमारे पेशे नज़र है, क़ुरआने मजीद को दो क़िस्मों यानी मोहकम व मुतशाबेह में तक़सीम करती हैं और कुल्ली तौर पर क़ुरआने मजीद से यूँ नतीजा निकलता है:

    पहली बात तो यह कि मोहकम वह आयत है जो अपनी दलील व बुरहान और सुबूत में मोहकम व पुख़्ता हो और उसके मअना व मतलब में किसी किस़्म का शक व शुबहा मौजूद न हो यानी हक़ीक़ी मअना के अलावा कोई और मअना उससे अख़्ज़ न किये जा सकें और मुतशाबेह उसके बर ख़िलाफ़ है।

    और तीसरी बात यह है कि हर मोमिन जो अपने ईमान में रासिख़ और साबित क़दम है उसका ईमानी फ़र्ज यह है कि आयात मोहकमात पर ईमान लाये और अमल करे और इसी तरह मुतशाबेह आयात पर भी ईमान लाये लेकिन उन पर अमल करने से परहेज़ करे। सिर्फ़ वह लोग जिसके दिल मुनहरिफ़ और ईमान टेढ़े हैं वह मुतशाबेह आयात की अवाम को फ़रेब और धोखा देने के लिये तावीलें बना बना कर उन प अमल करते हैं और उनकी पैरवी करते हैं।