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    क़ूरआत व हिफ़्ज़े कूरआन

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    समस्त प्रकार मुस्लमान नारी व पूरुष क्यों न हो, चाहे वह छोटे हो या बडे़। पवित्र कूरआन को हिफ़्ज़ करते थे और उस आसमानी आयातों को पाठ करके आपने विताब क़ल्बों को अराम व अनन्द पहँचाते थें। और आयत के माध्यम ख़ूश व ख़ूशी जीवन कि पाठ अर्जन करते थे। नतीजे में विसात की ज़िन्दगी शुरु से लेकर पवित्र कूरआन के दोस्त व दुश्मन, बिरुद्ध व अबिरुद्ध आयाते कूरआन को सूनते थे और उन में बहूत सारे लोग पवित्र कूरआन को हिफ़्ज़ करते थे। इस विनापर पवित्र ग्रंथ किसी एक विशेष कौम और न जात के लिए निर्दष्ट नहीं था. नाज़िल होने के समय से लेकर आज तक सब प्रकार के मुस्लमान इस पवित्र कूरआन को अटल से पकढ़ कर रख़ा है। और पवित्र कूरआन की आयतों को नमाज़ व गैर नमाज़ में भी पाठ करते है। इस पवित्र कूरआन की आयातों के ज़रीए इस्तिदलाल करके एक अपरों को परामर्श देते थे इस सूरत में कि आयत नाज़िल होने के एक दो दीन के बाद वेशि भाग पैग़म्बरे (स.) के असहाब उस को हिफ्ज़ करते थे।

    अपर तरफ़ एक दल जो कहने का उपयुक्त है, कि पैग़म्बरे (अ) के असहाब और उन के दोस्त कूरआन पाठ करने में मश्गूल थे और वह लोग समस्त प्रकार मुस्लमान के अन्दर (क़ूर्रा) के नाम से प्रसिद्ध व माअरुफ़ थें।

    दितीय तरफ़ एक दल ऐसे थे जिन व्यक्तियों के नेता हज़रत अली (अ) थें वह लोग ( कूत्ताबे वही) पवित्र कूरआन लिख़ने के नाम से प्रसिद्ध थें। जो कुछ पवित्र कूरआन में नाज़िल होता था, पैग़म्बरे अकरम (स.) के निदेश से आपकी पवित्र सेवा में आयाते कूरआन को परष्पर व सजा के लिख़ा जाता था. जिस तरह आप निदेश फ़रमाते थे उस निर्देश के मुताविक़ एक विशेष कागज़ के उपर लिख़ते थे। और यह सब काज-काम आपकी निज़ारत में सम्पादन हुआ करता था। हत्ता लिख़ने के बाद आप उस लिख़े हुये विशेष कागज़ों को पढ़ने के लिए निदेश फ़रमाते थे ताकि सही तरीके से उस आयत को चाँच-पर्ताल की जायें।

    इस में कोई शक नहीं कि बेशि भाग कूरआन मजीद के सूरा जो पैग़म्बरे अकरम (स.) के समय प्रसिद्ध थे, ख़ुद पैग़म्बरे अकरम (स.) सूरा और उसकी नाज़िल होने का स्थान और आयत को निर्वाचन फ़रमाते थे, हत्ता बहूत सारे सूरों मिसालः तुअल, मिअएन व माछानी वगैरह उस समय में नाम रख़ा गया था, पैग़म्बरे अकरम (स.) उन समस्त प्रकार सूरों को पढ़ते थे और उस सूरों को पाठ करने का सवाब भी बयान भी करते थें, अब्दुल्लह इब्ने मसऊद, अबि कअब व अपर महान वक्तित्व पवित्र कूरआन मजीद को रसूल (स.) के पवित्र सेवा में पाठ करके समाप्त किया. और उस की तिलावत फ़रमाई ।

    दितीय कथा यह है कि जब पवित्र कूरआन की आयतें नाज़िल होती थी, उस के साथ साथ पुल्तकत करते थे, ताकि उस को मसजिद में किसी एक विशेष स्थान पर संरक्षण किया जा सके, ताकि समस्त प्रकार मुस्लमान उस को लिख़े और पढ़े, इस तरीके से पवित्र कूरआन सब के निकट पहुँचा है।