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    काज़ी का मेहमान

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    एक शख़्स आम मेहमान की हैसियत से हज़रत इमाम अली (अ.) के घर वारिद हुआ और कई दिन तक आप का मेहमान रहा, लेकिन वोह एक आदी मेहमान न था। बल्कि उसके दिल में एक बात थी, जिसका शुरू में इज़हार नहीं किया था। हकीकत ये थी कि ये शख़्स किसी दूसरे शख़्स से इख़्तेलाफ़ रख़ता था। कि दूसरा फ़रीक ज़ाहिर हो तो झगड़े को हज़रत अली (अ.) की ख़िदमत में पेश करे। यहाँ तक की एक दिन खुद ही अस्ल मकसद से पर्दा उठाया। हज़रत अली (अ.) ने इरशाद फ़रमाया, तू दावे दार फ़रीक है।

    उसने जवाब दिया, जी हाँ या अमीरुल मोमिनीन।

    इमाम ने फ़रमाया, बहुत ही माज़रत चाहता हूं कि आज से एक मेहमान की हैसियत से में तुम्हारी मेहमानदारी नहीं कर सकता इसलिये कि हज़रत रसूले ख़ुदा सल्लललाहो अलैहि व आलेहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया है, जब भी काज़ी के पास कोई मुकद्दमा पेश हो तो काज़ी को ये हक़ नहीं कि सिर्फ़ एक की मेहमानदारी करे, फ़क़त इस सूरत में कि दोनों फ़रीक मेहमानी में हाज़िर हों।