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    कारदानाह

    कारदानाह
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    कहते हैं कि एक बंदर था जो बंदरों का राजा था। उसका नाम कारदानाह था। परन्तु वह बूढ़ा और कमज़ोर हो चला था। उसमें अब युवा अवस्था वाली न तो फुर्ती ही थी और न ही उस समय की शक्ति। बंदरों के बीच एक बहुत ही चालाक, होशियार और अवसरवादी युवा बंदर भी था। वह सदैव ही राजा बनने का स्वप्न देखा करता था। वह अपने सपने को साकार करने के लिए सदैव अवसर की तलाश में रहता था। एक दिन उसने सोचा कि अब अधिक प्रतीक्षा से कोई लाभ नहीं है। राजा में अब शासन करने की क्षमता नहीं रह गई है। उसने अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर एक षडयंत्र रचा। युवा बंदर ने एक बड़ी सेना तैयार की और बूढे एवं कमज़ोर राजा पर आक्रमण कर दिया। कारदानाह जो उससे और उसकी सेना से लड़ने की क्षमता नहीं रखता था उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और सत्ता उसके हवाले कर दी किंतु नए राजा ने इसको पर्याप्त नहीं समझा बल्कि वह कारदानाह की हत्या करना चाहता था। इस कारण कारदानाह वहां से भाग खड़ा हुआ और वह समुद्र के किनारे स्थित एक हरे-भेर क्षेत्र में चला गया। कारदानाह एक अंजीर के पेड़ पर चढ़ गया और उसकी एक शाख पर जा बैठा। उस शाख पर बैठा वह अपने राज के बारे में सोचने लगा और एक लंबी सांस लेकर उसने स्वयं से कहा, हे नीचे संसार! एक दिन तू ऊंचाइयों पर ले जाता है और एक दिन धरती पर पटक देता है। लंबे समय तक मैंने आराम का जीवन बिताया और अब बुढ़ापे में मुझको अकेले ही इस पेड़ पर जीवन बिताना पड़ रहा है।दिन गुज़रते रहे। धीरे-धीरे कारदानाह को उस पेड़ और स्थान से लगाव हो गया। वह उसकी अंजीरें खाता और अकेला रहा करता था। एक दिन की बात है कि वह सदैव की भांति अकेला पेड़ पर बैठा अंजीर खा रहा था उसके हाथ से एक अंजीर छूट कर पानी में गिर गई। एक कछुआ जो पेड़ के नीचे आराम कर रहा था उसने अंजीर को देखा और पानी में जाकर उसने वह अंजीर खा ली। उसे अंजीर स्वादिष्ट लगी। कारदानाह जिसे पानी में अंजीर के गिरने की आवाज़ से आनंद आ रहा था वह एक अंजीर खाता और एक पानी में फेंकदेता। नीचे बैठा हुआ कछुआ अगली अंजीर के पानी में गिरने की प्रतीक्षा में रहता। जैसे ही अंजीर गिरती वह उसे तुरंत उठाकर खा लेता। कछुआ जो यह सोच रहा था कि अंजीर को कोई ऊपर से उसके लिए फेक रहा है उसकी कृपा एवं दया के कारण मन ही मन उससे प्रेम करने लगा। उसने पेड़ के नीचे से पुकारकर कहा। हे नए मित्र जिसे मैंने अभी तक नहीं देखा है, तू जो कोई भी है, मैं तेरी कृपा का आभारी हूं। खाने वाली जो चीज़ें तुमने मेरे लिए नीचे भेजी हैं वे बहुत ही स्वादिष्ट हैं। कारदानाह ने शाखाओं के बीच से नीचे की ओर झांक कर देखा तो उसे दिखाई दिया कि पेड़ के नीचे तथा जल के निकट एक कछुआ बैठा हुआ है। उसने कछुए को सलाम किया और कहा, हे मेरे नए मित्र मैं इस बात से बहुत प्रसन्न हूं कि आप यहां पर हैं। मै अकेलेपन से थक चुका हूं। आपकी उपस्थिति मेरे लिए एक बहुत बड़ी विभूति है। मैं नीचे आता हूं ताकि दोनों एक-दूसरे से निकट से परिचित हो सकें। फिर वह छलांगे लगाता हुआ पेड़ के नीचे आया और कछुए के सामने जा खड़ा हुआ। उससे कहा हे प्रिय कछुए सलाम। कछुए ने कहा हे कृपालु बंदर मेरा सलाम भी स्वीकार करो। बताओ तुम कहां से आए हो और कहां जा रहे हो़? यहां पर क्या कर रहे हो़?कारदानाह ने अपने जीवन की कहानी कछुए को सुनाते हुए कहा अब मैं तुम्हरी सेवा में हूं। कितना अच्छा हुआ कि तुमसे भेंट हो गई। अकेलेपन से मैं बुरी तरह से उकता चुका था। कछुए ने कहा, तुमसे मिलकर मुझे भी बहुत प्रसन्नता हो रही है। मैं आशा करता हूं कि हम दोनों एक-दूसरे के लिए अच्छे मित्र सिद्ध होंगे। कुछ ही दिनों के भीतर दोनों घनिष्ठ मित्र बन गए। वे हर विषय पर आपस में बात किया करते थे। कछुए के पत्नी और बच्चे थे किंतु वह उन्हें भूल चुका था। एक नए मित्र की उपस्थिति ने उसे इतना व्यस्त कर दिया था वह किसी अन्य विषय के बारे में सोचता ही नहीं था। उसे इस बात का आभास ही नहीं था कि कोई उसकी प्रतीक्षा में है। कछुए की पत्नी जो अपन पति की कुछ दिनों की अनुपस्थिति से चिन्तित और क्रोधित थी उसकी नींद उड़ चुकी थी। उसे इस बात का पता ही नहीं था कि कछुए पर क्या बीत रही है। सुबह से शाम तक वह उसकी प्रतीक्षा करती कि शायद उसके बारे में कहीं से कोई सूचना मिले। किंतु उसके पति की कोई सूचना नहीं थी। उसका कोई अतापता नहीं था। एक दिन जब वह अकेली बैठी हुई एक ओर देख रही थी कि उसने अपनी पड़ोसी को देखा। पड़ोसी महिला ने जब उसे निराशा की स्थिति में देखा तो उससे पूछा कि क्या हुआ? तुम क्यों इतनी परेशाना हो?उसने एक आह भरते हुए कहा, कुछ न पूछ! हे बहन, मैं तुमको क्या बताऊं। मैं बहुत चिन्तित हूं। कई दिन से मेरा पति घर नहीं आया है। कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि मैं कहां जाऊं? कछुए की पड़ोसन कुछ आग आई और बोली, मुझको पता है कि तुम्हारा पति कहां है? कछुए की पत्नी ने अधीर होकर कहा, क्या तुमको पता है कि वह कहां हैं? कृप्या मुझको बताओ ताकि मैं चिंता से मुक्त हो सकूं। पड़ोसी महिला ने कहा, दो-तीन दिन पहले जब मैं तट के निकट से गुज़र रही थी तो उसे देखा कि वह एक बंदर के साथ बैठा हुआ बातें कर रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उनमें नई-नई दोस्ती हुई है। मुझको लगता है कि उसके घर न आने का कारण नया मित्र ही है। कछुए की पत्नी ने कहा कि उस बंदर से मित्रता, क्या मुझसे और मेरे बच्चों से बढ़कर है? यह कहकर वह रोने लगी। उसकी पड़ोसन ने हमदर्दी से कहा कि चिन्तित न हो। रोने से कोई काम नहीं हो पाएगा। रोने के बजाए समस्या के समाधान के बारे में सोचो। कछुए ने कहा मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं? पड़ोसन ने कहा, इस समस्या का सबसे उचित समाधान बंदर की हत्या करना है। तुम उसको रास्ते से हटा दो ताकि तुम्हारा पति पुनः पुराने जीवन की ओर लौट आए। इसके बारे में मेरे पास एक योजना है। तुमको बीमारी का नाटक करना होगा और बाक़ी सारी बातें तुम मुझ पर छोड़ दो। तुम केवल यह काम करना है कि जब मैं तुम्हारे पति को ले आऊं तो तुम ख़ूब रोना। पड़ोसन ने उससे विदा ली और उस स्थान की ओर गई जहां पर कछुआ था। कछुए ने अपनी पड़ोसन को जब वहां देखा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ इसलिए उसने आने का कारण पूछा। बड़े क्रोधित होकर उसकी पड़ोसन ने कहा, वास्तव में तुम बहुत ही मनमौजी और निश्चिंत हो। आज कितने दिन हो गए कि तुम अपने घर से बाहर हो और तुमको इस बात की कोई चिंता नहीं है कि तुम्हारी पत्नी और बच्चे अकेले हैं। हो सकता है कि उनके लिए कोई मुश्किल आ जाए। कछुए ने कहा, तुम सही कह रही हो। मैं उनको भूल गया था। क्या उनके साथ कोई घटना घटी है? पड़ोसन ने कहा, कुछ दिनों से तुम्हारी पत्नी बीमार पड़ी है और वह लगातार तुमको पुकारती रहती है। कछुए ने, जो अपनी पत्नी की बीमारी की सूचना से बहुत चिन्तित हो गया था, कहा हे ईश्वर मुझको क्षमा कर। उसके पश्चात उसने बंदर से कहा, हे प्रिय बंदर मैं तुमको छोड़कर अपने घर जाने के लिए विवश हूं। मैं तुमको वचन देता हूं कि फिर तुमसे मिलने आऊंगा। कारदानाह मुझको अनुमति दो। कारदानाह ने बड़े खेद से कहा, वास्तव में मैं यह समाचार सुनकर बहुत दुखी हूं। यदि मुझसे कुछ हो सकता हो तो मुझे अवश्य सूचित करना। मैं बड़ी खुशी से उसे करने के लिए तैयार हूं। कछुए ने आभार व्यक्त किया और अपनी पत्नी के पास वापस चला गया।