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    कुर्दिस्तान

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    कुर्दिस्तान प्रांत ईरान की उस धरती का एक भाग है जिस पर माद जाति का शासन रहा है।

    कुर्द समुदाय का संबंध आर्य जाति से है जो लगभग चार हज़ार वर्ष पूर्व पूरब की ओर से इस क्षेत्र में पहुँची थी और बाद में उसने उत्तर पश्चिम तथा उरूमिये नदी के पूर्व की ओर पलायन किया। तख़्ते जमशीद में दारयूश के शिलालेख के अनुसार माद जाति के लोग वर्ष 550 ईसा पूर्व में हख़ामनेशी शासन के अधीन थे। कुर्दिस्तान प्रांत का क्षेत्रफल 28203 वर्ग किलो मीटर है और यह ईरान के पश्चिम में स्थित है।इस प्रांत में 9 ज़िले, 23 नगर, 26 तहसीलें और 83 ग्राम सभाएं हैं। बाने, बीजार, सक़्किज़, सनन्दज, दीवानदर्रे, कामयारान, क़रवे, मरीवान और सर्वाबाद इस प्रांत के सबसे महत्वपूर्ण नगर हैं। इस प्रांत की जलवायु उत्तरी क्षेत्र में अपेक्षाकृत ठंडी तथा दक्षिणी क्षेत्रों में संतुलित व मरुस्थलीय है। दक्षिणी क्षेत्र में बड़ी- बड़ी चरागाहें और उपजाऊ मैदान स्थित हैं। वसंत ऋतु में कुर्दिस्तान प्रांत की जलवायु बड़ी ही मनमोहक होती है और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। इस प्रांत की भाषा कुर्दी है जो विभिन्न बोलियों में बोली जाती है। भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि कुर्दी भाषा, हिंदी, युरोपीय तथा ईरानी भाषा के गुट से संबंधित है। कुर्दी भाषा यूँ तो विभिन्न बोलियों में बोली जाती है किंतु किरमान्जी व सूरानी इसके दो मुख्य स्वरूप हैं। कुर्दिस्तान की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और इस प्रांत के 32 प्रतिशत लोग खेती-बाड़ी का काम करते हैं। कुर्दिस्तान के अधिकांश लोग विभिन्न रंगों में स्थानीय वस्त्र पहनते हैं जिनमें पजामा, लम्बा कुर्ता, पगड़ी और शाल शामिल है। कुर्दिस्तान प्रांत में बड़ी संख्या में प्राचीन अवशेष एवं प्राकृतिक आकर्षण पाए जाते हैं। इस प्रांत में इस्लाम से पूर्व के काल के भी अनेक अवशेष मौजूद हैं जिनमें ज़ीविये के प्राचीन टीले, करफ़्तू गुफा और तंगीवर के शिलालेख आदि का नाम लिया जा सकता है। इसी प्रकार इस्लामी काल के बाद के भी अनेक अवशेष हैं जिनमें मस्जिदे दारुल एहसान, सफ़वी काल की आसिफ़ुद्दीवान इमारत और बाबा गरगर के मज़ार की ओर संकेत किया जा सकता है। कुर्दिस्तान प्रांत में अनेक ऐतिहासिक दुर्ग भी हैं जिनमें से कुछ का हम उल्लेख कर रहे हैं।पालंगान दुर्गः

    पालंगान ग्राम, कामयारान नगर से 15 किलो मीटर की दूरी पर स्थित है। वर्तमान समय में इस ग्राम में स्थित दुर्ग के कुछ ही अवशेष बचे हैं जिनमें कुछ कमरे, अग्निकुंड और प्राचीन पुल शामिल हैं। इन अवशेषों को देखने से भली भांति समझ में आ जाता है कि इस दुर्ग का संबंध इस्लाम से पूर्व के काल से है। तोहफ़ए नासेरी नामक इतिहास की पुस्तक में वर्णित है कि वर्ष 564 हिजरी क़मरी में ख़ुसरो ख़ान अर्दलान नामक शासक ने पालंगान दुर्ग पर नियंत्रण कर लिया और इसे अपने शासन का केंद्र बनाया।चंगीज़ दुर्गः

    बीजार नगर से 20 किलो मीटर दूर एक पर्वत पर एक दुर्ग के अवशेष पाए जाते हैं। यह दुर्ग चंगीज़ दुर्ग के नाम से विख्यात है। वर्तमान समय में इस दुर्ग की केवल कुछ दीवारों और पानी एकत्रित करने के केंद्र के अवशेष मौजूद हैं। यह दुर्ग पत्थरों से बनाया गया था और इसके निर्माण में सारूज के मसाले का प्रयोग किया गया है। सारूज चूने, राख और रेत को मिला कर बनाए गए मसाले को कहते हैं। चंगीज़ दुर्ग के निर्माण के सही समय का ज्ञान नहीं है किंतु इसकी वास्तुकला और इसमें प्रयोग होने वाली मिट्टी से पता चलता है कि यह इस्लाम के आरंभिक काल में बनाया गया होगा।ज़ीविए दुर्गः

    सक़्क़िज़ से 55 किलो मीटर दक्षिण पूर्व में ज़ीविए नाम के ग्राम में इसी नाम का एक दुर्ग स्थित है। यह दुर्ग एक टीले पर स्थित है जहाँ से पूरे क्षेत्र पर दृष्टि रखी जा सकती है। यह दुर्ग वास्तुकला की दृष्टि से अपने काल की महत्वपूर्ण इमारतों में से एक समझा जाता है। माना जाता है कि 2700 वर्ष पूर्व मानना जाति के लोग इस क्षेत्र में रहते थे। लगभग 65 वर्ष पूर्व भारी वर्षा के कारण इस दुर्ग का कुछ भाग ढह गया जिसके बाद कुछ लोगों ने खुदाई करके इसके मूल्यवान अवशेषों को लूट लिया और उन्हें ईरान से बाहर पहुँचा दिया। ये अवशेष इस समय संसार के प्रसिद्ध संग्रहालयों में मौजूद हैं। इस दुर्ग से प्राप्त होने वाले मिट्टी के बर्तनों से पता चलता है कि आठ सौ वर्ष ईसा पूर्व हख़ामनेशी शासन काल में इस दुर्ग में लोग रहते थे।क़ुमचक़ाए दुर्गःयह दुर्ग बीजार से 45 किलो मीटर दूर क्षेत्र के एक ऊंचे पर्वत पर स्थित है। इस दुर्ग की भौगोलिक स्थिति दो कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रथम तो यह कि यह एक ओर से एक ऐसे दर्रे के सामने स्थित है जिसे प्राचीन काल में राजाओं का दर्रा कहा जाता था और इस पर्वत की नुकीली चट्टानों और ख़तरनाक ढलानों के कारण इस तक पहुंचना बहुत कठिन था और दूसरे यह कि इसके अन्य तीन छोरों पर भी ख़तरनाक ढलानें थीं अतः इस दुर्ग के लिए सुरक्षा प्रबंध की आवश्यकता नहीं थी। क़ुमचक़ाए दुर्ग की दीवारों के अवशेष से पता चलता है कि इसका निर्माण दो हज़ार वर्ष से भी पहले किया गया था और सासानी तथा इस्लामी काल में भी इसे प्रयोग किया जाता रहा है। इसी प्रकार कुर्दिस्तान प्रांत में कई अन्य दुर्ग हैं जिनमें कोहने, क़ज़क़ले, सियावमे, नमशीर, कीवेरू, शोए, आर्मर्दे क़पलानतो, सनन्दज तथा मरीवान आदि दुर्गों का नाम लिया जा सकता है।ऊरामान ग्रामःकुर्दिस्तान में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ और पशु-पक्षी पाए जाते हैं जिन्होंने प्रकृति प्रेमियों के लिए इस क्षेत्र को अत्यंत मनमोहक बना दिया है। ऊरामान या हूरामान का गांव कुर्दिस्तान के दक्षिण में स्थित है जो इस प्रांत के सबसे अच्छे जलवायु वाले क्षेत्रों में से एक माना जाता है। इस क्षेत्र में घरों की बनावट अत्यंत रोचक है। एक ढलान पर बने हुए घर सीढ़ियों की भांति प्रतीत होते हैं। इस प्रकार से कि नीचे वाले घर की छत ऊपर वाले घर का आंगन होती है। इस क्षेत्र के घर पत्थर और लकड़ी के बने हुए हैं और उन्हें बड़ी सुंदरता के साथ बनाया गया है। ईरान के रश्त नगर के मासूले क्षेत्र में भी इसी प्रकार के घर बने हुए हैं अतः ऊरामान को कुर्दिस्तान का मासूले भी कहा जाता है।चूंकि यह क्षेत्र प्राचीन काल में स्थानीय शासकों की राजधानी था अतः ऊरामान को तख़्त अर्थात राजधानी भी कहा जाता है। इस गांव को कुर्दों की कला और उनकी संस्कृति का उदाहरण समझा जा सकता है।कुर्दिस्तान प्रांत में अनेक झीलें, नदियाँ और झरने हैं जो इस प्रांत की जलापूर्ति करने के साथ ही साथ इसकी सुंदरता में भी चार चाँद लगाते हैं। इनमें से कुछ का हम उल्लेख कर रहे हैं।ज़रीवार झीलः

    यह झील मरीवान के उत्तर पश्चिम में स्थित है और समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 1285 मीटर है। इसे कुर्दिस्तान प्रांत के सबसे सुंदर प्राकृतिक आकर्षणों में से एक समझा जाता है। कई सोतों और नदियों के पानी से यह झील बनी है। ज़रीवार झील छः किलो मीटर लम्बी तथा तीन किलो मीटर चौड़ी है। इसे स्थानीय लोग ज़रीबार भी कहते हैं। ज़रीवार या ज़रीबार का अर्थ होता है, समुद्र जैसा। इस झील के बारे में बहुत सी दंत कथाएं प्रचलित हैं जिनमें से सबसे विख्यात यह है कि इसके नीचे एक नगर दफ़्न है।बेल झरनाःकिरमानशाह प्रांत की सीमा के निकट बेल नामक एक गाँव स्थित है। इसी गाँव से थोड़ी दूर पर एक अत्यंत सुंदर झरना है जिसे बेल कहा जाता है। इस झरने का पानी, क्षेत्र के लोगों के पेय जल की आपूर्ति करता है। इस झरने का पानी बहुत वेग के साथ एक पर्वत से निकलता है। बेल झरने का पानी अपने आस-पास के पेड़ पौधों को तृप्त करते हुए सीरवान नदी में जाकर गिरता है। बाबा गरगर सोताः

    क़रवे ज़िले के 18 किलो मीटर उत्तर पूर्व में बाबा गरगर नामक गाँव स्थित है जिसमें एक सोता है जिसे दंगेज़ भी कहा जाता है। इस सोते का पानी 200 मीटर व्यास के एक गोलाकार हौज़ में एकत्रित होता है। सोते के पानी का रंग लाली लिए हुए है और कभी कभी उसमें पीलापन भी आ जाता है जिसका कारण सोते के पानी में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के लवण तथा गंधक है। सोते का पानी पाचन तंत्र व चर्म रोगों सहित विभिन्न रोगों के उपचार में प्रभावी है।सनन्दज की जामा मस्जिदः

    प्रमाणों से पता चलता है कि इस मस्जिद का निर्माण क़ाजारी शासन काल में वर्ष 1228 हिजरी क़मरी में क़ुर्दिस्तान के शासक अमानुल्लाह ख़ान के आदेश पर किया गया था। इस जामा मस्जिद में दो बड़े हॉल हैं और बीच में एक बड़ा सा आंगन है जिसके किनारे धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों के लिए 12 कमरे बने हुए हैं। मस्जिद की छत 24 बड़े-बड़े स्तंभों पर टिकी हुई है जिन पर क़ुरआने मजीद की आयतें लिखी हुई हैं। जामा मस्जिद की दीवारों पर टाइलों का सुंदर काम किया गया है जबकि मुख्य द्वार को संगे मरमर से सजाया गया है।आबीदर पार्कः

    सनन्दज के पश्चिम में आबीदर पर्वत के आंचल में एक अति सुंदर पार्क बनाया गया है। इस पार्क से सनन्दज नगर बहुत ही सुन्दर दिखाई पड़ता है। इस पार्क में कई बाग़ और प्राकृतिक सोते हैं। इनमें सबसे बड़ा बाग़, बाग़े अमीरिये है जिसमें देश का सबसे बड़ा खुला सिनेमा या ओपन थियेटर है। सनन्दज नगर के लोगों के अतिरिक्त निकटवर्ती क्षेत्रों के लोग भी यहाँ आकर सपरिवार छुट्टियाँ बिताते हैं और प्रकृति के सौंदर्य से आनंदित होते हैं।सनन्दज का बाज़ारः

    यह बाज़ार आज से लगभग 400 वर्ष पूर्व उस समय बनाया गया था जब अर्दलानों के शासनकाल में सनन्दज को सरकार का केंद्र बनाया गया था। यह बाज़ार आयताकार है और पहलवी शासन काल में बनाई जाने वाली सड़क के कारण दो भागों में विभाजित हो गया है। इसके उत्तरी भाग को सनन्दजी बाज़ार कहते हैं जबकि दक्षिणी भाग को बाज़ारे आसिफ़ का नाम दिया गया है। इसके भीतर विभिन्न प्रकार की पारंपरिक शैलियों में बनी हुई दुकानें हैं और नगर में नए-नए बाज़ार बन जाने के बावजूद इस बाज़ार की स्थिति यथावत अपने स्थान पर बनी हुई है।सनन्दज का संग्रहालयः

    इस संग्रहालय में कुर्दिस्तान प्रांत और देश के अन्य भागों से प्राप्त होने वाली ऐतिहासिक वस्तुओं को रखा गया है। संग्रहालय में रखी गई ऐतिहासिक वस्तुओं के अतिरिक्त स्वयं संग्रहालय की इमारत बहुत सुंदर है और इसकी दीवारों पर किया गया शीशे का काम दर्शनीय है। संग्रहालय मुल्ला लुत्फ़ुल्लाह शैख़ुल इस्लाम की इमारत के भीतर स्थित है। संग्रहालय में विभिन्न विषयों से संबंधित प्राचीन वस्तुएं रखी गई हैं। इस्लामी क्रांति से पहले इस संग्रहालय में हर थोड़े समय के पश्चात ईरान के किसी न किसी प्रांत के लोगों की संस्कृति व सभ्यता से संबंधित वस्तुओं का प्रदर्शन होता था किंतु इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद इसे केवल कुर्दिस्तान प्रांत की संस्कृति व सभ्यता से जुड़ी वस्तुओं के लिए विशेष कर दिया गया।ख़ुसरोआबाद इमारतः

    यह इमारत अपने आप में बेजोड़ है कि जो ख़ुसरो ख़ान अर्दलान के शासन का केंद्र थी। इमारत के चारों ओर बहुत ही सुंदर बाग़ है। इमारत के किनारे-किनारे सेवकों के कमरे और हम्माम इत्यादि बने हुए हैं। ख़ुसरोआबाद इमारत की वास्तुकला में चूने का सुंदर काम किया गया है। इसी प्रकार दीवारों पर ईंटों से सुंदर डिज़ाइन बनाए गए हैं।क़ालीनः

    कुर्दिस्तान ईरान में क़ालीनों का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहाँ बुने जाने वाले क़ालीन, ईरानी कला का उत्तम नमूना प्रस्तुत करते हैं। सनन्दज नगर, कुर्दिस्तान में बुने जाने वाले क़ालीनों का केंद्र समझा जाता है। इस प्रांत के क़ालीनों में प्रायः प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता है और बुनाई बड़ी सूक्ष्मता से की जाती है। कुर्दिस्तान के क़ालीनों के डिज़ाइन अति सुंदर एवं मनमोहक होते हैं। इन क़ालीनों की एक मुख्य विशेषता इनका टिकाऊ होना है। पिछली शताब्दियों में इस प्रांत पर राज करने वाले शासकों ने क़ालीन की बुनाई सहित विभिन्न स्थानीय कलाओं के प्रचलन हेतु लोगों को बहुत अधिक प्रोत्साहित किया था जिसके चलते यह कला आज भी कुर्दिस्तान में पूर्ण रूप से जीवित है।

    पुले क़िश्लाक़ः

    यह पुल सनन्दज के पूर्व में क़िश्लाक़ नामक नदी पर बनाया गया है। इस पुल का निर्माण सफ़वी शासनकाल में किया गया था और बाद में क़ाजारी शासनकाल में इसका पुनर्निर्माण किया गया। वर्ष 1046 में सुलैमान ख़ान अर्दलान ने सनन्दज से हमदान के मार्ग में इस पुल का निर्माण किया था। यह पुल 78 मीटर लम्बा और 3 मीटर चौड़ा है जबकि इसके छः मुहाने हैं। हर मुहाने के निकट एक मीटर ऊंचा चबूतरा बना हुआ है जिस पर बैठ कर नदी के पानी को निकट से देखा जा सकता है। पुल के ऊपर आने-जाने के लिए अलग-2 मार्ग बने हुए हैं और पूरा पुल ईंटों से बना हुआ है। रात में इस पुल से नदी का दृश्य बड़ा सुंदर प्रतीत होता है।अमजदुल अशरफ़ इमारतःयह क़ाजार शासन काल की प्रख्यात इमारतों में से एक है जिसका पत्थरों से बना हुआ प्रांगण, हौज़, स्नानगृह और रंगमंच सबसे अधिक रोचक हैं। इस इमारत की भीतरी साज-सज्जा इस्फ़हान के विख्यात वास्तुकारों द्वारा की गई है। इस इमारत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दीवारों पर बनी हुई डीज़ाइनें और चूने का अद्भुत काम है।

    मुशीर इमारतः

    यह इमारत सनन्दज में स्थित है और इसका निर्माण क़ाजार शासन के एक प्रख्यात कुर्द मंत्री मीरज़ा रज़ा के पुत्र मीरज़ा यूसुफ़ मुशीर दीवान ने कराया था। इस इमारत में सात प्रांगण हैं और हर प्रांगण में एक फ़व्वारा है। सभी फ़व्वारे अलग-अलग डीज़ाइन के हैं। इसी प्रकार इस इमारत का मुख्य द्वार विशेष रूप से आगंतुक का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करता है।

    सईद सालार इमारतः

    यह इमारत कुर्दिस्तान प्रांत की ऐतिहासिक इमारतों में से एक है जिसे वर्तमान समय में संग्रहालय बना दिया गया है। इस इमारत का निर्माण नासिरुद्दीन शाह क़ाजार के शासन काल के अंतिम दिनों में किया गया। इसकी वास्तुकला क़ाजारी काल की वास्तुकला से प्रभावित है। इस इमारत के तहख़ाने में एक हौज़ है तथा इसकी छत गुंबदाकार है जिसे बड़ी सुंदरता से सजाया गया है। इस इमारत का सबसे रोचक भाग इसके हाल की खिड़कियां हैं जो अपने आप में एक बहुत अच्छी कलाकृति है।

    क़मे चूकी दुर्गः

    बीजार नगर में स्थित एक गांव क़मे चूकी से 12 किलोमीटर की दूरी पर एक दुर्ग स्थित है। इस दुर्ग को कुर्दिस्तान प्रांत की एक बेजोड़ इमारत कहा जा सकता है। इस दुर्ग का निर्माण आजसे लगभग 2800 वर्ष पूर्व किया गया था। इस दुर्ग के पश्चिमी भाग में 100 मीटर की गहराई में एक प्लेट फ़ार्म सा बना हुआ है जो इस दुर्ग को बाहरी रास्ते से मिलाता है। यह प्लेट फ़ार्म 100 मीटर लम्बा तथा 15 से 20 मीटर ऊंचा है। क़मे चूकी दुर्ग बड़े-2 पत्थरों से बनाया गया है जिससे इस दुर्ग को अधिक सुदृढ़ता प्राप्त हो गई है। इसकी वास्तु कला को देख कर सहज ही इसकी प्राचीनता का अनुमान लगाया जा सकता है। दुर्ग के उत्तर पूर्वी भाग में असंख्य सीढ़ियां हैं जो इसमें माद, अशकानी तथा पार्त शासकों के निवास की सूचक हैं। मंगोलों के शासन काल में दुर्ग में चार सीढ़ियां ऊपर चढ़ने के पश्चात एक मेहराब का निर्माण किया गया है जो बहुत ही सुंदर है। दुर्ग के पूर्वी भाग में सासानी काल के ढांचे पर ईंटों से बनाए गए निवास स्थान अब भी मंगोल वास्तुकला की विशेषताओं को चिन्हित करते हैं।

    सलवाताबाद पुलः

    बीजार-तकाब राजमार्ग पर सलवाताबाद के स्थान पर एक अत्यंत सुंदर पुल बना हुआ है। सलवाताबाद पुल के नीचे नदी के पानी पर कई चबूरते बने हुए हैं जो ईरानी वास्तुकला और पुल निर्माण के सिद्धांतों के परिचायक हैं। इस पुल में नौ अर्ध गोलाकार मुहाने हैं। पुल की लम्बाई 130 मीटर है जबकि टोपोग्रेफ़ी की दृष्टि से इसकी ऊंचाई 8.4 से 12 मीटर तक है।

    इमामज़ादे अक़ील का मज़ारः

    यह मज़ार बीजार ज़िले के एक नगर हसनाबाद में स्थित है। यह मज़ार कुर्दिस्तान प्रांत में इस्लामी काल की सबसे प्राचीन इमारतों में से एक है। संभावित रूप से इसका निर्माण सलजूक़ी शासन काल में किया गया था। इस इमारत में मौजूद मिट्टी के प्राचीन बर्तनों से इस बात की पुष्टि होती है। इमारत चौकोर रूप में बनी हुई है और उसके चारों कोणों पर बड़े-2 स्तंभों का निर्माण किया गया है जो मज़ार की इमारत को सुदृढ़ता प्रदान करते हैं। इमारत की दीवारों पर ईंटों का सुंदर काम किया गया है और छोटी-2 ईंटों से क़ुरआने मजीद की आयतें लिखी हुई हैं। इसी प्रकार मज़ार के भीतरी भाग को चूने के सुंदर काम से सुसज्जित किया गया है। इसका गुंबद गिर चुका है किंतु इमारत की वास्तुकला और साज-सज्जा को देखकर पता चलता है कि इसका निर्मण सलजूक़ी काल में किया गया है और ईलख़ानी काल में इसकी मरम्मत की गई है।

    पीर उमर का मज़ारः

    यह मज़ार सनन्दज नगर में एक प्राचीन दुर्ग के किनारे स्थित है। मज़ार की मूल इमारत का निर्माण वर्ष 1040 हिजरी क़मरी में सुलैमान ख़ान अर्दलान के काल में किया गया था और बाद में इसमें विस्तार होता रहा। मज़ार की वर्तमान इमारत में दो भाग हैं, एक भाग में क़ब्र स्थित है जबकि दूसरे भाग को मस्जिद के रूप में प्रयोग किया जाता है। इमारत में किया गया चूने, ईंटों और आईने का काम अत्यंत दर्शनीय है। इसी प्रकार मज़ार की दीवारों के किनारे पर सुंदर लीपि में क़ुरआने मजीद की आयतें लिखी हुई हैं। कहा जाता है कि पीर उमर का वास्तविक नाम अब्दुस्समद था और वे हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सुपुत्र थे।

    बाबा गोरगोर मज़ारः

    यह इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के सुपुत्र सैयद जमालुद्दीन का मज़ार है किंतु चूंकि यह मज़ार बाबा गोरगोर नामक गांव में स्थित है इस लिए इसी गांव के नाम से से प्रख्यात है। मज़ार की इमारत एक बहुत बड़ी चट्टान पर बनाई गई है। पूरी इमारत स्थानीय पत्थरों और ईंटों से बनाई गई है और इन्हीं पत्थरों से इमारत की सजावट का काम लिया गया है। क्षेत्र के लोगों के मन में इस मज़ार के लिए विशेष आदर है। इस मज़ार की इमारत के निर्माण की सही तिथी ज्ञात नहीं है किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि इसे क़ाजार शासन काल में स्थानीय कारीगरों ने बनाया होगा।

    करफ़्तू गुफाः

    सक़्क़िज़ से 72 किलोमीटर पूर्व में दीवानदर्रे के स्थान पर करफ़्तू नामक गुफा स्थित है। अध्ययनों से पता चला है कि प्राचीन काल में यह गुफा पानी के भीतर थी और बाद में पानी का स्तर नीचे चले जाने के कारण यह गुफा बाहर निकल आई। यह एक प्राकृतिक एवं केल्शियम वाली गुफा है तथा विभिन्न कालों में इसमें परिवर्तन होते रहे हैं। करफ़्तू गुफा पहाड़ के भीतर है और इसकी चार मंज़िलें हैं। अनेक विदेशी अध्ययनकर्ताओं ने इस गुफा का निरीक्षण करके इसका प्राचीन मानचित्र तैयार किया है। यह गुफा 750 मीटर लम्बी है और इसमें कई मार्ग बने हुए हैं। वास्तुकला की दृष्टि से इस गुफा की चार निर्माण शैलियां हैं जो वास्तुकला के क्षेत्र में अत्यधिक महत्व रखती हैं। इस वास्तुकला में कमरे और रास्ते एक दूसरे से मिले हुए हैं और कुछ खिड़कियां व रौशनदान बाहरी भाग में बनाए गए हैं। गुफा की दीवार पर पशुओं, मनुष्यों और वनस्पतियों के कई चित्र उकेरे गए हैं जिनका धार्मिक आयाम भी है।

    अश्क़ून बाबा मीनारः

    यह मीनार बीजार ज़िले के एक नगर हसनाबाद के निकट स्थित है। मीनार को स्थानीय मसालों, पत्थरों तथा ईंटों से बनाया गया है और यह चौकोर आकार का है। संभावित रूप से यह मीनार लम्बी-2 यात्राएं करने वालों के लिए अस्थायी निवास हेतु बनाया गया था। कुछ लोगों के अनुसार इसका निर्माण ईलख़ानी काल में किया गया था किंतु इसमें सफ़वी काल में की गई मरम्मत के चिन्ह भी दिखाई देते हैं इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि इसका निर्माण संभावित रूप सफ़वी काल में हुआ था।

    बाने की सराएः

    बाने नगर से 25 किलोमीटर पूर्व में सक़्क़िज़-बाने राजमार्ग के किनारे एक पुरानी सराए के खंडहर मौजूद हैं। इस सराए की वास्तुकला पर्वतीय है। इस सराए में एक लम्बा और काफ़ी बड़ा दालान है जिसके दोनों ओर छः कमरे बनाए गए हैं। सराए की इमारत पत्थरों से बनाई गई है। खेद के साथ कहना पड़ता है कि वर्तमान समय में इस सराए की कुछ दीवारों और नींव के अतिरिक्त इमारत के सभी भाग गिर चुके हैं जिनकी मरम्मत की आवश्यकता है। इस सराए के निर्माण की तिथी पूर्णतः स्पष्ट नहीं है किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि इसका निर्माण सफ़वी काल में हुआ है और क़ाजार काल में इसकी मरम्मत की गई है।

    सरतुपुले बाज़ारः

    सनन्दज नगर में सरतुपुले नामक एक मुहल्ला है जिसमें एक बड़ा प्राचीन बाज़ार है जो मरीवान व सक़्क़िज़ से इराक़ी कुर्दिस्तान जाने के प्राचीन मार्ग पर स्थित है। बाज़ार के बीच के मुख्य मार्ग पर छत नहीं है और मार्ग के दोनों ओर विभिन्न काम करने वालों की दुकानें और कमरे बने हुए हैं। यद्यपि इस बाज़ार में आज पहले जैसी चहल-पहल नहीं रह गई है किंतु यह बात भली भांति स्पष्ट है कि अतीत में यह बाज़ार बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था और इस मार्ग से गुज़रने वाले कारवानों की बहुत सी आवश्यकताओं की पूर्ति करता था।

    बीजार का बाज़ारः

    यह बाज़ार, बीजार नगर के केंद्र में स्थित है बल्कि कहा जा सकता है कि इस समय बीजार नगर के प्राचीन ढांचे में से जो चीज़ बाक़ी बची है वह यही बाज़ार है। इस समय इस बाज़ार की केवल 16 प्राचीन दुकानें बाक़ी हैं जबकि बाक़ी दुकानों की मरम्मत की जा चुकी है और उनमें परिवर्तन आ गया है। चूंकि बीजार नगर कुर्दिस्तान और आज़रबाइजान के मार्ग में स्थित है इस लिए इस बाज़ार को एक विशेष व्यापकता प्राप्त हुई है। प्राचीन काल में व्यापारिक कारवानों के गुज़रने के मार्ग में स्थित होने के कारण इस बाज़ार में बहुत चहल-पहल रहती थी। इस बाज़ार के निर्माण की सही तिथि का ज्ञान नहीं है किंतु इसकी वास्तुकला और दुकानों को देख कर पता चलता है कि इसका निर्माण क़ाजारी शासन काल में हुआ है।

    मस्जिदे दारुलअमानः

    यह मस्जिद, सनन्दज नगर में स्थित है और इसका निर्माण क़ाजार शासन काल के दौरान अमानुल्लाह ख़ान अरदलान के पुत्र ग़ुलाम शाह ख़ान ने करवाया था। मस्जिद में एक बहुत ही सुंदर प्रांगण और बहुत बड़ा हाल है। वास्तुकला की दृष्टि से इसकी तुलना सनन्दज की दारुल एहसान मस्जिद से की जा सकती है। निर्माण के समय मस्जिद के साथ ही एक मदरसा भी था किंतु अब मदरसे के अवशेष बाक़ी नहीं हैं।

    दो मीनारा मस्जिदः

    सक़्क़िज़ नगर के प्राचीन भाग में एक बहुत ही सुंदर मस्जिद स्थित है और इस नगर के निवासियों का कहना है इसका निर्माण अफ़शारी शासनकाल के अंतिम और ज़न्दी शासनकाल के आरंभिक दिनों में किया गया। इस मस्जिद के दो बहुत ही ऊँचे मीनार हैं, इसी लिए इसे दो मीनारा मस्जिद कहा जाता है। मस्जिद का निर्माण कच्ची ईंटों, मिट्टी के गारे, पत्थरों और लकड़ी से किया गया है। मीनारों की सजावट के लिए टाइलों और ईंटों का सुंदर काम किया गया है। मस्जिद के प्रांगण में एक बड़ा सा हौज़ है जो वुज़ू करने के लिए बनया गया है। इस हौज़ के ऊपर एक सुंदर गुंबद दिखाई पड़ता है। इसी प्रकार मस्जिद की दीवारों पर टाइलों का सुंद काम किया गया है।

    क़ज़ल ओज़ोन नदीः

    यह नदी, सफ़ेद रूद नदी की मुख्य शाखाओं में से एक है और चेहल चश्मे, हेज़ार कानियान पर्वत तथा ज़ागरोस पर्वत श्रंखला से इसका उदगम होता है। यह नदी जब ज़न्जान प्रांत में प्रविष्ट होती है तो शाहरूद नदी से मिल जाती है और आगे चल कर सफ़ेद रूद में परिवर्तित हो जाती है। आगे चल कर क़ज़ल ओज़ोन नदी कैस्पियन सागर में गिरती है। इस नदी में विभिन्न प्रकार की सुंदर मछलियां पाई जाती हैं और अधिकांश स्थानों पर इसके तट बहुत सुंदर हैं।

    सीरवान नदीः

    यह कुर्दिस्तान प्रांत की सबसे लम्बी नदी है और गावरूद तथा क़िश्लाक़ जैसी नदियां इसी की शाखाएं हैं। सीरवान नदी का कुछ भाग, ईरान और इराक़ के बीच जल सीमा का काम करता है। फ़ार्स की खाड़ी में जा कर इस नदी का अंत हो जाता है। इस नदी के निकट के तटवर्ती भाग विभिन्न प्रकार की मछलियों और पक्षियों के पालन के लिए बहुत उचित हैं और उन्होंने इस नदी को एक विशेष सौंदर्य प्रदान कर दिया है।