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    कूफ़ियों का विश्वासघात

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    सवाल 7: कूफ़ियों नें बड़ी अक़ीदत, श्रृद्धा और गर्मजोशी के साथ इमाम हुसैन अ. को बुलाने के बावजूद क्यों आपकी मदद नहीं की बल्कि आपसे लड़ने को तय्यार हो गए?
    इस सवाल का जवाब दो और सवालों के विस्तारपूर्वक जवाब पर निर्भर है।

    सवाल 1: कूफ़ियों के ख़त लिखने और बड़े स्तर पर इमाम हुसैन अ. को बुलाने के क्या कारण थे?
    सवाल 2: अबदुल्लाह बिन ज़ियाद नें कूफ़े के आंदोलन के कुचलने के लिये किन तरीक़ों का इस्तेमाल किया?
    जवाब 1: शुरू में इस मतलब पर ध्यान देना ज़रूरी है कि कूफ़ियों के ख़त लिखने का सिलसिला मक्के में इमाम हुसैन अ. के यज़ीद के खिलाफ़ उठ खड़े होने (10 रमज़ान 20 हिजरी) से शुरू हुआ और अधिकता के हिसाब से इस संख्या तक पहुँच गए कि वास्तव में, उसकी व्यंज्ना पत्राचार आंदोलन से की जा सकती है।
    कुछ दिनों के अन्दर यह आंदोलन इस हद को पहुँच गया कि लगभग हर दिन छ: सौ ख़त इमाम की सेवा में आते, यहाँ तक कि बारह हज़ार की संख्या में इमाम को ख़त प्राप्त हुए। बचे रह गए कुछ ख़तों में जो नाम और हस्ताक्षर नज़र आते हैं उनके थोड़े बहुत अध्ययन औऱ समीक्षा से तथा सुबूतों को मद्दे नज़र रखने से इस नतीजे तक पहुँचा जा सकता है कि ख़त लिखने वाले किसी ख़ास ग्रुप से सम्बंध नहीं रखते थे बल्कि अत्यंत अलग अलग रुझान रखने वाले विभिन्न तरह के गिरोह उसमें शामिल थे यहाँ तक कि उनके बीच, सुलैमान बिन सुरद ख़ुज़ाई, रुफ़ाऐ बिन शद्दाद और हबीब बिन मज़ाहिर जैसे ख़ास शियों के नाम भी देखे जा सकते हैं।
    उनके मुक़ाबिले में, कूफ़े में रहने वाले अमवी ग्रुप के शबस बिन रबई (जिसने इमामे हुसैन अ. के कत्ल के शुकराने (कृतज्ञता) में एक मस्जिद बनवाई) हज्जार बिन अबजर (जिसनें आशूरा के दिन इमाम की सेवा में ख़त भेजने का इंकार किया, यह उमर बिन साद के फ़ौजी टुकड़ी के सरदारों में से एक था) यज़ीद बिन हारिस बिन यज़ीद (इसनें भी आशूरा के दिन इमाम अ. की सेवा में ख़त भेजने का इन्कार किया) अज़रा बिन क़ैस (उमर बिन साद के लश्कर में घुड़सवारों का सरदार था) और उमर बिन हज्जाज ज़ुबैदी (पाँच सौ सवारों के साथ फ़ुरात पर तैनात था ताकि इमाम अ. पानी तक न पहुंच सकें) जैसे लोग भी ख़त लिखने वालों की लाइन में दिखाई देते हैं, जिन्होंने इत्तेफ़ाक़ से बड़ी अक़ीदत व श्रृद्धा भरे ख़त लिखे और इमाम को तैयार फ़ौज की ख़बर दी।
    लेकिन हमारे ख़्याल में ख़त लिखने वालों की अधिकांश संख्या (जिनके नाम इतिहास में मौजूद नहीं हैं) जनता की थी जो अस्ल में अपने माद्दी फ़ाएदे (भौतिक लाभ) के चक्कर में थे और जिधर हवा का रुख़ देखते उसी तरफ़ को भागने लगते थे, यह लोग अगरचे सख़्त हालात में संकट का मुक़ाबला करने की सकत नहीं रखते हैं लेकिन यह एक महान मौज के समान हैं कि जिस तरह एक माहिर तैराक इंसान अपनी नीतियों के ज़रिये फ़ायदा उठाते हुए उसी मौज पर सवार होकर अपने मक़सद तक पहुँच सकता है ज़्यादा सम्भावना इस बात की है कि जनाबे मुस्लिम के हाथों पर बैअत करने वालों की अधिकांश संख्या उन्हीं लोगों की थी जो अपनी और अपने फ़ायदे को अब्दुल्लाह बिन ज़ियाद की सियासत के तहत ख़तरे में देखते ही जनाबे मुस्लिम से अलग हो गए और कूफ़े की गलियों में उन्हें अकेला छोड़ दिया।
    अगर यह लोग कर्बला के जंगल में इमाम की छोटी सी फ़ौज के मुक़ाबले में दिखाई दें तो स्वाभाविक बात है क्योंकि इब्ने ज़ियाद के वादे उनके दुनियावी फ़ाएदों के अनुकूल थे और इमाम की छोटी सी फ़ौज के प्रति उनकी मालूमात (जिसनें इब्ने ज़ियाद की कामयाबी के सम्भावित प्रतिशत को बहुत बढ़ा दिया था) उन्हें बड़ी हद तक उकसा रही थी. मानों कि वह अपनें दिलों में पैग़म्बरे इस्लाम स.अ के नवासे और हज़रत अली अ. के बेटे होने के नाते इमाम हुसैन अ. से थोड़ी बहुत मुहब्बत भी रखते थे, यही वह लोग हैं जिनका परिचय, मजमा बिन अब्दुल्लाह आएज़ी के कलाम में इमाम से सम्बोधन में इस तरह किया गया है…
    रही जनता तो उनके दिल आपकी तरफ़ हैं लेकिन कल को उनकी तलवारें आपके ख़िलाफ़ नियाम से बाहर होंगी।
    उन्हीं में से कुछ ऐसे भी थे जो करबला में एक कोने में खड़े इमाम हुसैन अ. के क़त्ल के तमाशाई थे आंसू बहा रहे थे और दुआ कर रहे थे कि ख़ुदाया: हुसैन अ. की मदद कर।
    अब इस प्राक्कथन के बाद हम इस नतीजे तक पहुँचते हैं कि ख़त लिखने वालों की बड़ी संख्या को नज़र में रखते हुए उनके ख़त लिखने के कारणों में किसी ख़ास प्रेरणा पर ध्यान केंद्रित नहीं किया जा सकता बल्कि मुख़्तलिफ़ ग्रुपों के होने के मद्दे नज़र नीचे बयान किये जाने वाले प्वाइंट्स के अनुसार मुख़्तलिफ़ प्रेरणाओं और कारणों को बयान किया जा सकता है।
    जारी………..