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    यमन का चयन न करना

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    सवाल 6: इमाम हुसैन अ. ने अपने आंदोलन के लिए यमन का चयन क्यूं नहीं किया जहाँ पहले से शिया मौजूद थे?
    इब्ने अब्बास जैसे दिग्गज लोगों के कथनों में यह प्रस्ताव देखने में आता है कि इमाम यमन की तरफ़ चले जाएं और वहाँ से अपने प्रचारकों को आसपास के इलाक़ों में भेजें और अपने आंदोलन को संगठित करें ताकि यज़ीद के मुक़ाबले में खड़े हो सकें। (अल-कामिल. फ़ित्तारीख़ जिल्द 2 पेज 545)।

    अब सवाल यह पैदा होता है कि इमाम हुसैन अ. नें क्यों इस विकल्प की बिल्कुल अनदेखी कर दी?
    इस सवाल के जवाब में निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है:
    1- हालांकि यमन के लोग रसूलुल्लाह स.अ. के ज़माने में हज़रत अली अ. के यमन में आने से बहुत ख़ुश थे (पिछला रिफ़्रेंस) और आपके प्रति उनके मन में झुकाव था, लेकिन कूफ़े के मुक़बले में इस जगह को इमाम हुसैन अ. के युग में कदापि शियों के सेंटर के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता था।
    2- यमन के निवासियों का इतिहास बताता है कि गंभीर और संकट के हालात में उन पर कोई ख़ास भरोसा नहीं किया जा सकता था क्योंकि हज़रत अली अ. की हुकूमत के समय में उन्हें यमन वालों नें मुआविया की फ़ौज के मुक़ाबले में कि जो ज़्यादा मज़बूत व ताक़तवर नहीं थी (ग़ारात, के नाम से मशहूर) सिलसिले वार हमलों में सुस्ती दिखाई और अपने शासक अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास को इस तरह अकेला छोड़ दिया कि वह कूफ़ा भागने पर मजबूर हुए और मुआविया के निर्दयी सिपाहियों नें बस्र बिन अबी अरतात की अगुवाई में बड़ी आसानी से शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया और कुछ लोगों का (जिनमें अब्दुल्लाह बिन अब्बास के दो छोटे बच्चे भी थे) नरसंहार कर डाला।
    3- उस समय यमन इस्लामी दुनिया के अहेम और सेंट्रल शहरों में नहीं गिना जाता था और बसरा व मदायन जैसे दूसरे शहरों की तरह नज़दीक नहीं था, जहाँ से इमाम के मदद करने वालों के उपस्थित होने और कूफ़ा में मौजूद आपके सिपाहियों में शामिल होने की सम्भावनाएं ज़्यादा पाई जाती थीं।
    4- पैग़म्बरे इस्लाम स. की वफ़ात के आरम्भिक महीनों में यमन के कुछ क़बीलों के मुरतद (इस्लाम क़ुबूल करने के बाद काफ़िर हो जाना।) हो जाने का अतीत, लोगों के ज़हनों में उस शहर की तरफ़ से नकारात्मक छवि पाई जाती थी और इस बात की सम्भावना थी कि अगर इमाम हुसैन अ. उसे आंदोलन का सेंटर बनाते हैं तो अमवी पिठ्ठू हुकूमत के ख़िलाफ़ आपके आंदोलन को उसी नकारात्मक छवि से जोड़ कर पूरा फ़ायदा उठा सकते थे।
    5- दूसरे इस्लामी शहरों से यमन की दूरी और अलग थलग पड़ना, अमवी हुकूमत के लिये यह सम्भावना उपलब्ध करा सकता था कि आंदोलन के अमली होने की सूरत में वह उसे आसानी से कुचल दें।
    6- उस समय इमाम हुसैन अ. को यमन के निवासियों की तरफ़ से गंभीरता से यमन आने की दावत नहीं दी गई थी इसलिए उनके अन्दर यज़ीद के मुक़ाबिले में इमाम हुसैन अ. की हिमायत करने की कोई प्रेरणा नहीं थी और इमाम हुसैन अ. को कूफ़ा बुलाने के सिलसिले में वहाँ के लोगों में जो भावनाएं थीं उसका एक प्रतिशत भी यमन वालों के अंदर मौजूद नहीं था, वह भावनाएं कुछ तरह की थीः अहलेबैत अ. का आईडियालोजिकल बचाव (अक़ीदती देफ़ाअ), सीरिया के मुक़ाबिले में कूफ़े को दोबारा सेंटर बनाना, कूफ़े में अद्ल व न्याय पर आधारित अलवी हुकूमत की दोबारा स्थापना, और बनी उमय्या के ज़ुल्म व अत्याचार से रिहाई आदि।