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    कैसा है ईश्वर का जीवन? : 1

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    ईश्वर के व्यक्तिगत गुणों में से एक जीवन है। हम इसी विषय की समीक्षा करेंगे।

    इस विश्व और ब्रह्मांड में बहुत सी चीज़े जीवित हैं किंतु उन में बहुत अंतर है। जीवन में भी अंतर होता है।

    जब हम यह कहते हैं कि ईश्वर जीवित है तो यह प्रश्न उठता है कि वह किस प्रकार जीवित है? और उसका जीवन किस प्रकार का है?

    जीवन का अर्थ जीवित रहना है और यह ईश्वर की रचनाओं में से दो प्रकार की रचनाओं के बारे में कहा जा सकता है।

    एक पेड़-पौधों के बारे में जो फलते-फूलते हैं और दूसरे, प्राणियो और मनुष्यों के बारे में जो बोध व इरादा रखते हैं।

    पेड़-पौधों के बारे में हम जब जीवन की बात करते हैं तो उन में एक कमी का पता चलता है।

    पेड़-पौधे फलते-फूलते हैं और फलना-फूलना यह दर्शाता है कि जो बढ़ रहा है या फल-फूल रहा है वह इससे पूर्व परिपूर्ण नहीं हो सकता और उसमें कमी है

    जिसे वह बढ़ कर या फल-फूल कर पूरी करता है। अर्थात पेड़-पौधों की परिपूर्णता उन के बढ़ने और फलने-फूलने पर निर्भर होती है

    और उन का फलना-फूलना और बढ़ना कुछ बाहरी तत्वों पर निर्भर होता है।

    अर्थात उनकी परिपूर्णता की प्रक्रिया कुछ बाहरी कारकों पर निर्भर होती है जिन के आधार पर धीरे-धीरे उनमें परिवर्तन आता है और वह धीरे-धीरे अपने पूर्ण स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं।

    यह भी जीवित होना और जीवन है किंतु इस प्रकार के जीवन की ईश्वर के लिए कल्पना भी नहीं की जा सकती ।

    जीवन का दूसरा अर्थ जो प्राणियों और विशेषकर मनुष्यों में चरितार्थ होता है वह वास्तव में परिपूर्णता का ही एक अर्थ है।

    यद्यपि जिन रचनाओं पर यह अर्थ चरितार्थ होता है उन में कमियां और अवगुण भी पाए जाते हैं किंतु इस के लिए हम मनुष्य के अंतिम और उस चरण की कल्पना कर सकते हैं

    जिसमें वह परिपूर्णता तक पहुंच चुका हो और उसमें कोई कमी न रह गयी हो।