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    ख़ज़र सागर के ज्वार भाटे की क्षतिपूर्ति 2

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    पुस्तक का नामः कुमैल की प्रार्थना का वर्णन

    लेखकः आयतुल्ला हुसैन अंसारीयान

     

    इन हवाओ की शक्ति इतनी अधिक होती है कि ख़ज़र सागर के पानी को इतना ऊपर ले जाती है कि अधिकांश नौका चालक उसका मुक़ाबला करने मे असमर्थ हो जाते है।

    यह हवाएं ख़ज़र सागर के उत्तर मे उपस्थित बादलो को दक्षिण की ओर भगा देने का कार्य भी करती है जिसके कारण ईरान के उत्तरीय क्षेत्र मे वर्षा होती है ताकि वहां पर कृषि हरि भरि हो जाए।

    यह हवाए इस नदि के पानी को “मिरदाबे अंज़ली” (अंज़ली तालाब) मे ढकेल देती है ताकि तालाब“मिरदाब” का पानी स्वच्छ हो जाए गीलान शहर की नदी वर्षा के कारण अधिकांश समय मटमैला होती है जिसमे जंगली घास के बीज इत्यादि होते है और जब इस तालाब मे मिट्टी भर जाती है, उस से पानी के ऊपर झाग उत्पन्न होते है, घास के बीज इत्यादि वहा पर अंकुरित होने लगते है, इन दो कारणो से इस तालाब का पानी सूख जाना चाहिए तथा उसे दलदल मे परिवर्तित हो जाना चाहिए परन्तु हज़ारो वर्षो से यह तालाब इसी प्रकार बाक़ी है, इसका कारण क्या है?

    इसलिए कि ईश्वर कमी की क्षतिपूर्ति करने वाला है इस समस्या की रोक थाम हेतु इस नदि के पानी को बाढ़ से मिला देता है और जिस समय “सरेनोक”, “ख़ज़री” तथा “मियानवा” नामक हवाएं बादलो को बरसने के लिए दक्षिण की ओर ढ़केलती है तो नदि का स्वच्छ एंव पवित्र पानी, गदले पानी से मिल जाता है जिसके कारण उस गदले पानी की ग़ज़लत कम हो जाती है, बीज और बेल इत्यादि समुद्र के नमकीन पानी मे नष्ट हो जाते है।

    जिस समय यह वर्णित हवाएं बंद हो जाती है उस समय “करामू”, “किनारवा” तथा “आफ़ताब बोशू” नामक हवाए चलती है जो इस तालाब के पानी को ख़ज़र सागर मे पहुंचा देती है जिसके कारण वहां गदला पानी साफ हो जाता है।

    इसी प्रकार “गेलवा” और “दुरुशत्वा” नामक हवाए तालाब के पानी को उत्तर से दक्षिण की ओर ले जाती है तथा उस पानी को मिलाने मे सहायता करती है।!![1]


    [1] निशानेहाए आज़ाद, पेज 151