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    ख़ुत्बा – 13

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    [अहले बसरा (बसरा निवासियों) की मज़म्मत (निन्दा) में ]

    तुम एक औरत (स्त्री) की सिपाह (सेना) में और एक चौपाए के ताबे (अधीन) थे। वह बिलबिलाया तो लब्बैक (आ गया आ गया) कहते हुए बढे और वह ज़ख्मी (आहत) हुआ तो तुम भाग खड़े हुए । तुम पस्त अख़लाक (नैतिक रुप से पतित) और अहद शिकन (प्रत्यक्ष) कुछ है और बातिन (अप्रत्यक्ष) कुछ। तुम्हारी सरज़मीन (धरती) का पानी तक शूर (खारी) है। तुम में इकामत (निवास) करने वाला गुनाहों (पापों) के जाल में जकड़ा हुआ है और तुम में से निकल जाने वाला अपने पर्वरदिगार की रहमत को पा लेने वाला है। वह (आने वाला) मंज़र (दश्य) मेरी आखों में फिर रहा है, जब कि तुम्हारी मसजिद यूं नुमायां होगी जिस तरह कश्ती का सीना दरांहालेकि (इस दिशा में कि) अल्लाह ने तुम्हारे शहर पर उस के ऊपर और उस के नीचे से अज़ाब (दण्ड) भेज दिया होगा, और अपने रहने वालों समेत डूब चुका होगा।

    [ एक और रिवायत में यूं (इस प्रकार ) है ]

    ख़ुदा की कसम, तुम्हारा शहर गर्क हो (डूब) कर रहेगा। इस हद तक कि उसकी मसजिद कश्ती के अगले हिस्से, या सीने के बल बैठे हुए शुतुरमुर्ग की तरह मुझे नज़र आ रही है। (एक और रिवायत में इस तरह है) जैसे पानी के गहराव में परिन्दे (पक्षी) का सीना ।

    [ एक और रिवायत में इस तरह है ]

    तुम्हारा शहर अल्लाह के सब शहरों से मिटी के लिहाज़ से गंन्दा और बदबूदार है। यह (समुन्दर के) पानी से करीब (निकट) और आसमान (आकाश) से दूर है। बुराई के दस हिस्सों (अंशों) में से नौ हिस्से (नौ अंश) इस में पाए जाते हैं। जो इस में आ पहुंचा वह अपने गुनाहों में असीर (गिरफ्तार) है। और जो इस से निकल गया, अफवे इलाही (अल्लाह की क्षमा) उस के शरीक हाल रहा। गोया में अपनी आखों में इस बसती को देख रहा हूं कि सैलाब (बाढ) ने इसे हद तक ढांप लिया है कि मसजिद के कंगूरों के अलावा कुछ नज़र नहीं आता और वह यूं मालूम होते हैं जैसे समुन्दर के गहराव में परिन्दे (पक्षी) का सीना।

    इबने मीसम लिखते हैं कि जब जंगे जमल ख्तम हो गई, तो उस के तिसरे दिन हज़रत ने बसरे की मसजिदे जामे में सुब्ह की नमाज़ अदा की और नमाज़ से फ़ारिग़ (निवृत) हो कर मुसल्लेह की दाहनी जानिब दीवार से टेक लगा कर खड़े हो गए और यह ख़ुतबा इरशाद फ़रमाया, जिस में अहले बसरा (बसरा निवासीयों) की पस्तिए अखलाक (नैतिक पतन) और उन की सुबकिए अकल (भ्रष्ट बुद्दि) का तज़किरा (वर्णन ) किया है कि वह बे सोचे समझे दूसरों के भड़काने पर भडक उठे और एक औरत (स्त्री) के हाथों में अपनी कमान सौंप दी और ऊंट के पीछे लग गए। और बैअत के बाद पैमान शिकनी की और दो रुखी कर के अपनी पस्त किर्दारी (नीच प्रवृत्ति) व बद बातिनी (दुष्ट अन्त:करण) का सुबूत दिया। इस खु़तबे में औरत (स्त्री) से मुराद (अभिप्राय) हज़रत आइशा और चौपाए से वह ऊंट है जिस की वजह से बसरा का मारकाए कारज़ार जंगे जमल के नाम से मशहूर हुआ।

    इस जंग की दाग़ बेल यूं पड़ी कि जनाबे आइशा बावजूद इस के कि हज़रत उसमान की ज़िन्दगी में उन की सख्त मुखालिफ़त (विरोध) किया करती थीं। और मुहासिरे (घेराव) में उन को छोड़ कर मदीने से मक्के की तरफ़ रवाना हुई थीं। और इस ऐताबार से उन के कत्ल में उन का काफ़ी हाथ था। जिस की तफ़सील आइन्दा मुनासिब मौकों पर आयेगी। मगर जब आप ने मक्के से मदीने की तरफ़ पलटते हुए अब्दुल्लाह इबने अबी सलमा से यह सुना कि उसमान के बाद अली इबने अबी तालिब खलीफ़ा तसलीम कर लिये गए हैं तो बेसाख्ता आप की ज़बान से निकला, अगर तुम्हारे साथी की बैअत हो गई तो काश यह आसमान ज़मीन पर फट पड़े मुझे अब मक्के की तरफ़ ही जाने दो। चुनांचे आप ने मक्के की वापसी का तहैया कर लिया और फ़रमाने लगीं, ख़ुदा की कसम उसमान मज़लूम मारे गए और में उन के ख़ून का बदला ले कर रहूंगी। अब्दुल्लाह इबने अबी सलमा ने जब यूं ज़मीन व आसमां बदला हुआ देखा तो हैरत से कहा कि यह आप क्या फ़रमा रहीं हैं ? आप तो फ़रमाया करती थीं, उकतुलूहो नअसलन फ़कद कफ़रा, (इस नअसल को कत्ल करो, यह बेदीन हो गया है।)

    आप ने फ़रमाया, में क्या सब लोग यह कहा करते थे मगर छोड़ उन बातों को जो अब में कह रही हूं वोह सुन वोह ज़ियादा बेहतर और काबिले तवज्जोह है, भला यह भी कोई बात हुई पहले तो उन से तौबा करने के लिये कहा गया और फ़िर उसका मोका दिये बग़ैर उन्हें कत्ल भी कर दिया जाता है । इस पर इबने अबी सलमा ने आप से मुखातिब हो कर यह शेर पढे :—

    आप ही ने पहल की और आप ही ने (मुखालिफ़त के) तूफ़ाने बादो बारां उठाए और अब आप ही अपना रंग बदल रही हैं। आप ही ने खलीफ़ा के कत्ल का हुक्म दिया और हम से कहा कि वह बेदीन हो गए हैं। हम ने माना कि आप का हुक्म बजा लाते हुए यह कत्ल हमारे हाथों से हुआ मगर असली कातिल हमारे नज़दीक वोह है कि जिस ने इस का हुक्म दिया हो। (सब कुछ हो गया मगर) न आस्मान हमारे ऊपर फ़टा, और न चांद सूरज को गहन लगा और लोगों ने उस की बैअत कर ली जो कुव्वतो शिकोह से दुशमनों को हंकाने वाला है, तलवारों को करीब भटकने नहीं देता और (गर्दन कशों के) बल निकाल देता है। और लड़ाई के पूरे साज़ो सामान से आरास्ता रहता है और वफ़ा करने वाला ग़द्दार के मानिन्द नहीं हुआ करता ।

    बहर हाल जब आप इनितिकामी जज़बे को लेकर मक्के पहुंच गई तो हज़रत उसमान की मज़लूमीयत के चर्चे कर के लोगों को उन के ख़ून का बदला लेने के लिये उभारना शुरू किया। चुनांचे सब से पहले अब्दुल्लाह इबने आमिरे हज़री ने इस आवाज़ पर लब्बैक कही जो हज़रत उसमान के अहद में मक्के का वाली रह चुका था और साथ ही मर्वार इबने हकम सईद इबने आस और दूसरे बनी उमैया हमनवा बन कर उठ खड़े हुए। उधर तलहा इबने अब्दुल्लाह और ज़ुबैर इबने अवाम भी मदीने से मक्के चले आए। यमन से योली इबने मंबा जो दौरे उसमान में वहां का हुक्मरां था आ पहुंचा और बसरे का साबिक हुक्मरां (भूतपूर्व प्रशासक) अब्दुल्लाह इबने आमिर इबने कुरज़ी भी पहंच गया और आपस में एक दूसरे से गठ जोड़ कर के मन्सूबा बन्दी (योजना बनाने) में लग गए। जंग तो बहरहाल तय थी मगर रज़्मगाह (रणक्षेत्र) की तजवीज़ (प्रस्ताव) में फ़िकरें (बुद्दियां) लड़ रही थीं। हज़रत आइशा की राय थी कि मदीने ही को ताख्तो ताराज का निशाना (लक्ष्य) बनाया जाय मगर कुछ लोगों ने इस की मुखालिफ़त (विरोध) किया और कहा कि अहले मदीना से निपटना मुशकिल है और किसी जगह को मर्कज़ बनाना चाहिये। आख़िर बड़ी रद्दो कदह और सोच विचार के बाद तय पाया कि बसरा की तरफ़ बढ़ना चाहिये, वहां ऐसे लोगों की कमीं नहीं जो हमारा साथ दे सकें। चुनांचे अब्दुल्लाह इबने आमिर की बैपनाह दौलत और योली इबने मंबा की छ : लाख दिर्हम और छ : सौ ऊंटों की पेशकश के सहारे तीन हज़ार की फ़ौज (सेना) तर्तीब देकर बसरे की तरफ़ चल खड़े हुए। रास्ते में मामूली सी रुकावट पैदा हुई जिस की वजह से अम्मुल मोमिनीन ने कुत्तों के भोकने की आवाज़ सुनी तो सरबान से पूछ लिया कि इस जगह का नाम क्या है उसने कहा कि, हौअब। नाम सुनते ही पैग़म्बर की तंबीह (चेतावनी) याद आ गई कि उन्हों ने एक दफ़आ (बार) अज़वाज (पत्नियों) से मुखातिब होकर फ़रमाया था, कुछ पता तो चले कि तुम में से कोन है कि जिस पर हौअब के कुत्ते भोकेंगे। चुनांचे जब आप को मालूम हुआ कि अज़वाज के पर्दे में मैं ही मुखातब थी तो ऊंट को थपकी देकर बिठाया और सफ़र (यात्रा) को मुलतवी (स्थगित) कर देने का इरादा किया। मगर सात वालों की वक्ती सियासत ने बिगड़े काम को संभाल लिया। अब्दुल्लाह इबने ज़ुबैर ने कसम खा कर यकीन दिलाने की कोशिश की कि यह मकाम हौअब नहीं है। तलहा ने भी इस की ताईद की और मज़ीद तशफ़्फ़ी के लिये वहां के चालीस आदमीयों को बुलवा कर उस पर गवाही भी दिलवा दी। अब जहां पूरी कोम का इजमा (एकता) हो वहां एक अकेली राय क्या बना सकती थी, आख़िर उन्हीं की जीत हुई और उम्मुल मोमिनीन फ़िर उसी जोशो खरोश के साथ आगे चल पड़ीं।

    अब यह सिपाह मक्के के करीब पहंची, तो उस में उम्मुल मोमिनीन की सवारी देख कर लोगों की आंखें फ़टी की फ़टी रह गई। जारिया इबने किदामा ने आगे बढ़कर कहा कि, ऐ उम्मुल मोमिनीन कत्ले उसमान तो एक मुसीबत थी ही, लेकिन उस से कहीं बढ़ कर यह मुसीबत है कि आप इस मलऊन ऊंट पर बैठ कर निकल खड़ी हों और अपने हाथों से अपना दामने इज़्ज़तो हुर्मत चाक कर डालें। बेहतर यही है कि आप वापस पलट जायें,। मगर जब हौअब का वाकिआ इनांगीर न हो सका और, कर्नाफ़ी बुयूतो कुमा (अपने घरों में टिक कर बेठी रहो) का हुक्म ज़ंजीरे पा न बन सका, तो उन आवाज़ों का क्या असर हो सकता था। चुनांचे आप ने सुनी अन सुनी कर दी।

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