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    ख़ुत्बा – 18

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    [ फ़तावा (फ़त्वों, निर्णयों) में उलमा के मुख्तलिफुल आरा (विभित्र मत) होने की मज़म्मत (निन्दा) में फ़रमाया ]

    जब उन में से किसी एक के सामने कोई मुआमला (वाद, अभियोग) फ़ैसले (निर्णय) के लिये पेश होता है तो वह अपनी राय (विचार) से उन का हुक्म (निर्णय) लगा देता है। फिर वही मस्अला (वाद) ब ऐनेही (अक्षरश 🙂 दूसरे के सामने पेस होता है वह उस पहले हुक्म (पूर्वादेश) के ख़िलाफ़ (विपरीत) हुक्म (आदेश) लगा देता है, फिर यह तमाम के तमाम (समस्त) क़ाज़ी के पास जम्अ (कत्र) होते है, जिस ने उन्हें क़ाज़ी बना रखा है, तो वह सब रायों (मतों) को सहीह क़रार देता है। हालेंकि (यद्दपि) उन का अल्लाह एक, नबी एक, और किताब एक है। (उन्हें ग़ौर तो करना चाहिये) क्या अल्लाह ने उन्हें इख़तिलाफ़ (मतभेद) कर के उसका हुक्म (आदेश) दिया था। और यह इख़तिलाफ़ (मतभेद) कर के उस का हुक्म बजा लाते हैं या उस ने हक़ीक़तन (वास्तव में) इख़तिलाफ़ कर के उस की नाफ़रमानी (अवज्ञा) करना चाहते हैं। या यह कि अल्लाह ने दीन को अधूरा छोड़ा था और इन के तक्मील (पूर्ण करने) के लिये हाथ बटाने का ख़्वाहिशमन्द (इच्छुक) हुआ था, या यह कि अल्लाह के शरीक (सहयोगी) थे कि उन्हें उस के अह्काम (आदेशों) में दखू़ल देने (हस्तक्षेप करने) का हक़ (अधिकार) हो,और उस पर लाज़िम (अनिवार्य) हो कि वह उस पर रज़ामन्द (सहमत) रहे, या यह कि अल्लाह ने दीन (धर्म) को तो मुकम्मल उतारा था मगर उसके रसूल (स.) ने उसके पहुंचाने और अदा करने में कोताही (उदासीनता) की थी। अल्लाह ने क़ुरआन में तो फ़रमाया है कि हम ने किताब में कोई चीज़ बयान करने में कोताही (उदासीनता) नहीं की और उस में हर चीज़ (वस्तु) का वाज़ेह बयान (स्पष्ट वर्णन) है और यह बी कहा है कि क़ुरआन के बअज़ (अमुक) हिस्से (भाग) बअज़ हिस्सों (अमुक हिस्सों) की तस्दीक़ (पुष्टि) करते हैं और उस में कोई इख़तिलाफ़ (मतभेद) नहीं। चुनांचे अल्लाह का यह इर्शाद है कि अगर यह क़ुरआन अल्लाह के अलावा (अतिरिक्त) किसी और का भेजा होता, तो तुम इस में काफ़ी इख़तिलाफ़ पाते और यह कि इस का ज़ाहिर (प्रत्यक्ष) ख़ुशनुमा (सुदृश्य) और बातिन गहरा है न इस के अजाइबात मिटने वाले (नाशवान) न इस के लताइफ़ (मृदुलता व स्वच्छता) ख़त्म (समाप्त) होने वाले हैं। जु़मलात (जहालत, अज्ञान) का पर्दा इसी से चाक किया जाता है ।

    यह मस्अला (प्रकरण) महल्ले निज़ाअ (विवादग्रस्त) है कि जिस चीज़ पर शरअ (धर्म शास्त्र) की रु से (अनुसार) कोई क़तई दलील क़ाइम (अन्तिम तर्क स्थापित) न हो। आया वाक़े (वास्तव) में उस का कोई हुक्म (निर्णय) होता भी है या नहीं। अबुल हसन अश्अरी और उन के उस्ताद (गुरु) अबू अली जिबाई का मस्लक (मत) यह है कि अल्लाह ने उस के लिये कोई हुक्म (निर्णय) तजवीज़ (प्रस्ताविक) ही नहीं किया बल्कि ऐसे मवारिद (अवसरों) में तश्रीइ व हुक्म (विधान बनाने एंव निर्णय) का इख़तियार (अधिकार) मुज्तहिदीन (धर्म शास्त्रीय विद्धानों) को सौंप दिया है कि वह अपनी सवाबदीद (शुद्ध दृष्टि) से जिसे हराम (वर्जित) ठहरा लें उसे वाक़ई (वास्तव में) हराम (वर्जित) क़रार दे दिया जायेगा। और जिसे हलाल कर दें, उसे वाक़ई हलाल क़रार दिया जायेगा और अगर कोई कुछ कहे और कोई कुछ तो फिर जितनी उन की रायें (मत) होंगीं उतने अह्काम (आदेश) बनते चले जायेंगे और उन में से हर एक का नुक़्तए निगाह (दृष्टिकोण) हुक्मे वाक़ई (वस्तुत: आदेश) का तर्जुमान द्दोतक) होगा। मसलन (उदाहरणार्थ) अगर एक मुजताहिद (धर्मशास्त्रीय विद्धान) की राय यह ठहरी कि नबीज़ (मदिरा, शराब) हराम है और दूसरे मुजतहिद की राय यह हुई कि नबीज़ (मदिरा, शराब) हलाल है तो वह वाक़े (वास्तव में हलाल भी होगी हराम भी) । यअनी (अर्थात्) जो उसे हराम समझे उस के लिये पीना नाजाइज़ है और जो हलाल समझ कर पिये उस के लिये पीना जाइज़ है। चुनांचे शहरिस्तानी इस तस्वीब (मत) के मुतअल्लिक़ तहरीर करते हैं :–

    उसूलीयीन का एक गुरोह (रुढ़वादियों का एक वर्ग) इस का क़ाइल है कि जिन मसाइल (प्रकरणों) में इज्तिहाद (धर्म सम्बंधी शोध कार्य) किया जाता है, उन के लिये जवाज़ (औचित्य) व अदमे जवाज़ (अनौचित्य) और हलाल व हराम के एतिबार से (अनुसार) कोई तयशुदा (निशि्चत) हुक्म (आदेश) नहीं होता। बल्कि जो मुजतहिद की राय होती है वही ख़ुदा का हुक्म होता है। क्यों कि हुक्म का क़रार पाना ही इस बात पर मौक़ूफ़ (निर्भर) है कि वह किसी मुजतहिद के नज़रीये (विचारधारा) से तय (निर्णित) हो। अगर यह चीज़ न होगी तो हुक्म भी साबित (सिद्ध) न होगा। और इस मस्लक की बिना पर हर मुज्तहिद अपनी राये में दुरुस्त होगा।

    इस सूरत (सि्थति) में मुजतहिद खता (दोष) से इस लिये महफ़ूज़ (सुरक्षित) समझा जाता है कि खता (दोष) तो वहां मुतसव्विर हुआ करती है जहां कोई क़दम वाक़े के खिलाफ़ उठे और जहां कोई वाक़े ही न हो वहां ख़ता के क्या मअनी (अर्थ) । इसके अलावा इस सूरत में भी मुज्तहिद से ख़ता का इम्कान न होगा कि जब यह नज़रीया (विचारधारा) क़ाइम कर लिया जाये कि मुज्तहिदीन की आइन्दा (भविष्य में) जितनी राय होने वाली थीं अल्लाह ने उन से बाखबर (अवगत) होने की बिना पर पहले ही से उतने अह्काम बना रखे हैं कि जिस की वजह से हर राय हुक्म वाक़ई के मुताबिक़ ही पड़ती है। या यह कि उस ने यह इन्तिज़ाम (व्यवस्था) कर रखा है कि बर सबीले इत्तिफ़ाक़ (संयोगवश) उन में से हर एक की राय उन अह्काम में से किसी एक न एक हुक्म से बहर सूरत (प्रत्येक दशा में) मुवाफ़िक़त (सहमति) करेगी।

    लेकिन फ़िर्क़ए इमामिया यह है कि अल्लाह ने न किसी को शरीअत साज़ी (शरीअत बनाने) का हक़ दिया है और न किसी चीज़ के हुक्म को मुज्तहिद की राय के ताबे (अधीन) ठहराया है और न आरा (रायों) के मुख़्तलिफ़ (भित्र) होने की सूरत में एक ही चीज़ के लिये वाक़े में मुतअद्दिद (अनेक) अहकामात (आदेश) बनाए हैं। अलबत्ता जब मुज्तहिद की हुक्म वाक़ई (वीस्तविक आदेश) तक रसाई (पहुंच) नहीं हो पाती तो तलाशो तफ़हहुस (खोज का शोध) के बाद जो नज़रीया (विचार धारा) उस का क़रार पाता है उस पर अमल पैरा (कार्यरत) होना उस के लिये और उस के मुक़ल्लिदीन (अनुयाइयों) के लिये किफ़ायत (पर्याप्त) कर जाता है। लेकिन उस की हैसियत सिर्फ हुक्मे ज़ाहिरी की होती है जो हुक्म वाक़ई का बदल है और ऐसी सूरत में हुक्मे वाक़ई के छूट जाने पर वह माज़ूर (विवश) क़रार पा जाता है। क्यों कि उस दरियाए ना पैदा किनार में ग़ोता लगाने और उसकी तह तक पहुंचने में कोई कोशिश प्रयत्न) उठा नहीं रखी। मगर इस पर क्या इख़तियार कि दुरे शाहवार (बड़े मोती) के बजाय ख़ाली सदफ़ (सीप) ही उस के हाथ लगे। लेकिन वह यह नहीं कहता है कि दिखने वाले उसे मोती समझें और मोती के भाव बिके। यह दूसरी बात है कि कोशिशों का परखने वाला उस की भी आधी क़ीमत लगा दे ताकि न उस की मेहनत अकारत जाए और न उस की हिम्मत टूटने पाए।

    अगर इस तसवीब (शुद्ध विचार) के उसूल (सिद्धान्त) को मान लिया जाए तो फिर हर फ़त्वे को दुरुस्त और हर क़ौस (कथन) को सहीह मानना पड़ेगा जैसा कि मुबैज़ी ने फ़वातेह में लिखा है :–

    हक़ दर इन मस्अला मज़्हबे अश्अरी अस्त पस तवानद बूद कि मज़ाहिबे मुतनाक़िज़ा हमा हक़ बाशन्द ज़िन्हार दर शाने उलमा गुमाने बद मबर व ज़बान बतअने ईशान मकुशा ।

    जब मुतज़ाद नज़रीये (परस्पर विरोधी विचार धारायें) और मुखतलिफ़ (विभित्र) फ़त्वे (निर्णय) तक सहीह तस्लीम (स्वीकार) किये जाते हैं तो हैरत (आश्चर्य) है कि बअज़ नुमायां फ़राद के इक़्दामात को खताए इजतिहादी से क्यों तअबीर (अभिप्राय) किया जाता है। जब कि मुज्तहिद के लिये खता (त्रुंटि) का तसव्वुर (कल्पना) ही नहीं हो सकता। अगर अक़ीदए तसवीब (शुद्ध विचारो का विश्वास) सहीह है तो अमीरे शाम (शाम के शासक) और उम्मुल मोमिनीन के इक़दामात (द्वारा उठाए गए क़दम) दुरुस्त मानना पड़ेंगा। और अगर उन के इक़्दामात (कृत कार्यवाहियां) ग़लत समझे जाते हैं तो तसलीम (स्वीकार) कीजिये कि इज्तिहाद ठोकर भी खा सकता है। और तस्वीब का अक़ीदा ग़लत है और यह अपने मक़ाम पर तय होता रहेगा कि उम्मुल मोमिनीन के इज्तिआद में अनूसियत (स्त्रित्व) तो सद्दे राह (बाधक) नहीं होती या अमीरे शामका यह इज्तिहाद था या कुछ और। बहर सूरत (प्रत्येक दशा में) यह तस्वीब का अक़ीदा खताओं (त्रुटियों) के छिपाने और ग़लतियों पर हुक्मे इलाही की नक़ाब डालने के लिये ईजाद (आविष्कार) किया गया था ताकि न मक़सद बर आरियों (उद्देश्य प्राप्तियों) में रोक पैदा हो और न मन मानी कार्यवाहियों के खिलाफ़ कोई ज़बान खोल सके । अमीरुल मोमिनीन ने इस ख़ुत्बे में ऐसे ही लोगों का ज़िक्र किया है जो अल्लाह की राह से कट कर और वहिये इलाही की रौशनी से आंखे बन्द कर के क़ियास व राय (कल्पना एंव अनुमान) के अंधेरों में टाबक टोइयें मारते रहते हैं और दीन (धर्म) को अफ़्कारो आरा (विचारों एंव मतों) की आमाजगाह (केन्द्र) बना कर नित नए फ़त्वे देते रहते है और अपने जी से अह्काम गढ़कर इखतिलाफ़ात (मतभेदों) के शाखसाने (वाद विवाद) छोढ़ते रहते हैं। और फिर तस्वीब की बना पर तमाम मुख्तलिफ़ व मुतज़ाद अह्काम को अल्लाह की तरफ़ से समझ लेते हैं। गोया उन का हर हुक्म वहिये इलाही का तर्जुमान है कि न उन का कोई हुक्म ग़लत हो सकता है और न किसी मोक़े पर वह ठोकर खा सकते हैं। चुनांचे हज़रत इस मस्लक की रद में बयान फ़रमाते है कि :–

    (1) जब अल्लाह एक किताब व एक रसूल (स.) एक हैं तो फिर दीन भी एक ही होना चाहिये, और जब दीन एक है तो एक ही चीज़ के लिये मुखतलिफ़ व मुतज़ाद अह्काम क्यों कर हो सकते हैं। क्यों हुक्म में तज़ाद (विरोधाभास) इस सूरत (स्थिति) में हुआ करता है कि जब हुक्म देने वाला पहला हुक्म भूल चुका हो, या उस पर ग़फ़्लत या मदहोशी तारी हो गई हो। या जान बूझ कर उन भूल भुलैयों में चाहता हो, और अल्लाहो रसूल (स.) इन चीज़ो से बलन्द तर हैं। लिहाज़ा इस इखतिलाफ़ को उन की तरफ़ मन्सूब नहीं किया जा सकता। बल्कि यह इखतिलाफ़ात उन लोगों के खयालात व आरा का नतीजा हैं कि जिन्हों ने क़ियास आराइयों से दीन के नुक़ूश को मस्ख करने का तहैया कर लिया था।

    (2) अल्लाह ने या तो उन इखतिलाफ़ (मतभेदों) से मनआ किया होगा या इखतिलाफ़ (मतभेद) पैदा करने का हुक्म दिया होगा। अगर हुक्म दिया है तो वह कहां और किस मक़ाम पर है और मुमानिअत (रोकना) सुनना चाहो तो क़ुरआन कहता है :–

    इन से कहो क्या अल्लाह ने तुम्हें इजाज़त दे दी है या तुम अल्लाह पर इफ़तिरा (लांछन) करते हो।

    यअनी (अर्थात्) हर वह चीज़ जो बहुक्मे खुदा न हो वह इफ़्तिरा (लांछन) है और यह इफ़्तिरा मम्नउ (वर्जित) और हराम (निषिद्ध) है। और इफ़्तिरा पर्दाज़ों (लांछन लगाने वालों) के लिये उक़बा (मृत्योपरान्त जीवन) में न फ़ौजो कामरानी (पद व सफ़लता) है न फ़लाहो बहबूद (हित व भलाई), चुनांचे इर्शाद क़ुद्रत है :–

    जो तुम्हारी ज़बानों पर झूटी बातें चढ़ी हुई हैं उन्हें कहा न कहो और न अपनी तरफ़ (ओर) से हुक्म (आदेश) लगाया करो कि यह हलाल है। और यह हराम है कि अल्लाह पर झूट बोह्तान (लांछन) बांधने लगो और जो इफ़्तिरा पर्दाज़ियां करते हैं वह कामयाबी व कामरान से हम किनार न होंगे।

    (3) अगर अल्लाह ने दीन (धर्म) को नातमाम (अपूर्ण) रखा है तो उसे अधूरा छोड़ने की यह वजह होगी कि उस ने अपने बन्दों से यह चाहा होगा कि वह शरीअत (धर्म विधान) को पायए तक्मील (पूर्णता) तक पहुंचाने में उस का हाथ बटायें और शरीअत साज़ी (विधायन) में उस के शरीक (सहयोगी) हों तो यह अक़ीदा (विश्वास) सरासर (शिर्क, अनेकेश्वरवाद) है । अगर उस ने दीन को मुकम्मल (पूर्ण) उतारा है तो फिर पैग़म्बर (स.) ने उस के पहुंचाने में कोताही (उदासीनता) की होगी ताकि दूसरों के लिये उस में क़यास व राय (अनुमान एंव विचार) की गुंजाइश रहे तो मआज़ल्लाह (अल्लाह की पनाह) यह पैग़म्बर (स.) की कमज़ोरी औऱ इन्तिखाबे क़ुद्रत (अल्लाह द्वारा चयन) पर बदनुमा धब्बा होगा।

    (4) अल्लाह सुब्हानहू ने क़ुरआन में फ़रमाया है कि हम ने किताब में किसी चीज़ को उठा नहीं रखा और हर चीज़ को खोल कर बयान कर दिया है। तो फिर क़ुरआन से हट कर जो हुक्म तराशा जायेगा वह शरीईत से बाहर होगा और उस की असास (अधार) इल्मो बसीरत (ज्ञान एंव चेतना) और क़ुरआनो सुत्रत पर न होगी। बल्कि अपनी ज़ाती राय और अपना ज़ाती फ़ैसला होगा। जिस का दीन व मज़हब से कोई लगाव नहीं समझा जा सकता।

    (5) क़ुरआन दीन (धर्म) का मब्ना (मूल आधार) व माखज़ (स्त्रोत) और अह्कामे शरीअत का सरचश्मा (उदगम) है। अगर अह्कामें शरीअत मुख्तलिफ़ (विभित्र) और जुदा जुदा (पृथक-पृथक) होते तो फिर उस में भी इख़तिलाफ़ (मतभेद) होना चाहिये था और उस में इख़तिलाफ़ होता तो यह अल्लाह का कलाम न रहता और जब यह अल्लाह का कलाम है तो फिर शरीअत के अह्काम मुख्तलिफ़ (विभित्र) हो ही नहीं सकते कि तमाम मुख्तलिफ़ (विभित्र) व मुतज़ाद (परस्पर विरोधी) नज़रीयों (विचार धाराओं) को सहीह समझ लिया जाए और क़ियासी फ़त्वों (अनुमान पर आधारित निर्णयों) को उस का हुक्म (आदेश) क़रार दे दिया जाए।

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