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    ख़ुदा शनासी व तौहीद

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    पहला हिस्सा

    1) अल्लाह का वुजूद:

    हमारा अक़ीदह है कि अल्लाह इस पूरी कायनात का ख़ालिक़ है, सिर्फ़ हमारे वुजूद में,तमाम जानवरों में,नबातात में,आसमान के सितारों में,ऊपर की दुनिया में ही नही बल्कि हर जगह पर तमाम मौजूदाते आलम की पेशानी पर उसकी अज़मत,इल्म व क़ुदरत की निशानियाँ ज़ाहिर व आशकार हैं।

    हमारा अक़ीदह है कि हम इस दुनिया के राज़ों के बारे में जितनी ज़्यादह फ़िक्र करेंगे उस ज़ाते पाक की अज़मत,उसके इल्म और उसकी क़ुदरत के बारे में उतनी ही ज़्यादह जानकारी हासिल होगी। जैसे जैसे इँसान का इल्म तरक़्क़ी कर रहा है वैसे वैसे हर रोज़ उसके इल्म व हिकमत हम पर ज़ाहिर होते जा रहे हैं, जिस से हमारी फ़िक्र में इज़ाफ़ा हो रहा है,यह फ़िक्र उसकी ज़ाते पाक से हमारे इश्क़ में इज़ाफ़े का सरचश्मा बनेगी और हर लम्हे हमको उस मुक़द्दस ज़ात से करीब से करीबतर करती रहेगी और उसके नूरे जलालो जमाल में गर्क़ करेगी।

    क़ुरआने करीम फ़रमाता है कि “व फ़ी अलअर्ज़ि आयातुन लिल मुक़ीनीना * व फ़ी अनफ़ुसिकुम अफ़ला तुबसिरूना” यानी यक़ीन हासिल करने वालों के लिए ज़मीन में निशानियाँ मौजूद हैं और क्या तुम नही देखते कि ख़ुद तुम्हारे वुजूद में भी निशानियाँ पाई जाती हैं ? [1]

    “इन्ना फ़ी ख़ल्क़ि अस्समावाति व अलअर्ज़ि व इख़्तिलाफ़ि अल्लैलि व अन्नहारि लआयातिन लिउलिल अलबाबि *अल्लज़ीना यज़कुरूना अल्लाहा क़ियामन व क़ुउदन व अला जुनुबिहिम व यतफ़क्करूना फ़ी ख़ल्कि अस्समावाति व अलअर्ज़ि रब्बना मा ख़लक़ता हाज़ा बातिला ”[2] यानी बेशक ज़मीन व आसमान की ख़िलक़त में और दिन रात के आने जाने में साहिबाने अक़्ल के लिए निशानियाँ है। उन साहिबाने अक़्ल के लिए जो खड़े हुए,बैठे हुए और करवँट से लेटे हुए अल्लाह का ज़िक्र करते हैं और ज़मीनों आसमान की ख़िलक़त के राज़ों के बारे में फ़िक्र करते हैं (और कहते हैं)ऐ पालने वाले तूने इन्हे बेहुदा ख़ल्क़ नही किया है।

    2)सिफ़ाते जमाल व जलाल

    हमारा अक़ीदह है कि अल्लाह की ज़ाते पाक हर ऐब व नक़्स से पाक व मुनज़्ज़ह और तमाम कमालात से आरास्ता,बल्कि कमाले मुतलक़ व मुतलक़े कमाल है दूसरे अलफ़ाज़ में यह कहा जा सकता है कि इस दुनिया में जितने भी कमालात व ज़ेबाई पाई जाती है उसका सर चश्मा वही ज़ाते पाक है।

    “ हुवा अल्लाहु अल्लज़ी ला इलाहा इल्ला हुवा अलमलिकु अलक़ुद्दूसु अस्सलामु अलमुमिनु अलमुहयमिनु अलअज़ीज़ु अलजब्बारु अलमुतकब्बिरु सुबहना अल्लाहि अम्मा युशरिकून हुवा अल्लाहु ख़ालिक़ु अलबारियु अलमुसव्विरु लहु अलअसमाउ अलहुस्ना युसब्बिहु लहु मा फ़ी अस्समावाति व अलअर्ज़ि व हुवा अलअज़ीज़ु अलहकीम ”[3] यानी वह अल्लाह वह है जिसके अलावा कोई माबूद नही है वही असली हाकिम व मालिक है,वह हर ऐब से पाक व मुनज़्ज़ह,वह किसी पर ज़ुल्म नही करता,वह अमन देने वाला है,वह हर चीज़ की मुराक़ेबत करने वाला है,वह ऐसा कुदरत मन्द है जिसके लिए शिकस्त नही है,वह अपने नाफ़िज़ इरादे से हर काम की इस्लाह करता है,वह शाइस्ताए अज़मत है,वह अपने शरीक से मुनज़्जह है। वह अल्लाह बेसाबक़ा ख़ालिक़ व बेनज़ीर मुसव्विर है उसके लिए नेक नाम(हर तरह के सिफ़ाते कमाल) है,जो भी ज़मीनों व आसमानों में पाया जाता है उसकी तस्बाह करता है वह अज़ीज़ो हकीम है।

    यह उसके कुछ सिफ़ाते जलाल व जमाल हैं।

    3) उसकी ज़ाते पाक नामुतनाही (अपार,असीम)है

    हमारा अक़ीदह है कि उसका वुजूद नामुतनाही है अज़ नज़रे इल्म व क़ुदरत,व अज़ नज़रे हयाते अबदीयत व अज़लीयत,इसी वजह से ज़मान व मकान में नही आता क्योँकि जो भी ज़मान व मकान में होता है वह महदूद होता है। लेकिन इसके बावजूद वह वक़्त और हर जगब मौजूद रहता है क्योँ कि वह फ़ौक़े ज़मान व मकान है। “व हुवा अल्लज़ी फ़ी अस्समाइ इलाहुन व फ़ी अलअर्ज़ि इलाहुन व हुवा अलहकीमु अलअलीमु ”[4] यानी (अल्लाह)वह है जो ज़मीन में भी माबूद है और आसमान में भी और वह अलीम व हकीम है। “व हुवा मअकुम अयनमा कुन्तुम व अल्लाहु विमा तअमलूना बसीर ”[5] यानी तुम जहाँ भी हो वह तुम्हारे साथ है और जो भी तुम अन्जाम देते हो वह उसको देखता है।

    हाँ वह हमसे हमारे से ज़्यादा नज़दीक है,वह हमारी रूहो जान में है,वह हर जगह मौजूद है लेकिन फ़िर भी उसके लिए मकान नही है। “व नहनु अक़रबु इलैहि मिन हबलि अल वरीद ”[6] यानी हम उस से उसकी शह रगे गरदन से भी ज़्यादा क़रीब हैं।

    “हुवा अलअव्वलु व अलआख़िरु व ज़ाहिरु व बातिनु व हुवा बिकुल्लि शैइन अलीम”[7] यानी वह (अल्लाह)अव्वलो आख़िर व ज़ाहिरो बातिन है और हर चीज़ का जान ने वाला है।

    हम जो क़ुरआन में पढ़ते हैं कि “ज़ु अलअर्शि अलमजीद ”[8]वह साहिबे अर्श व अज़मत है। यहाँ पर अर्श से मुराद बुलन्द पा तख़्ते शाही नही है। और हम क़ुरआन की एक दूसरी आयत में जो यह पढ़ते हैं कि “अर्रहमानु अला अलअर्शि इस्तवा ” यानी रहमान (अल्लाह)अर्श पर है इसका मतलब यह नही है कि अल्लाह एक ख़ास मकान में रहता है बल्कि इसका मतलब यह है कि पूरे जहान, माद्दे और जहाने मा वराए तबीअत पर उसकी हाकमियत है। क्योँ कि अगर हम उसके लिए किसी खास मकान के क़ायल हो जायें तो इसका मतलब यह होगा कि हमने उसको महदूद कर दिया, उसके लिए मख़लूक़ात के सिफ़ात साबित किये और उसको दूसरी तमाम चीज़ो की तरह मान लिया जबकि क़ुरआन ख़ुद फ़रमाता है कि “ लैसा कमिस्लिहि शैउन ”[9] यानी कोई चीज़ उसके मिस्ल नही है।

    “व लम यकुन लहु कुफ़ुवन अहद ” यानी उसके मानिन्द व मुशाबेह किसी चीज़ का वुजूद नही है।

    4)न वह जिस्म रखता है और न ही दिखाई देता है

    हमारा अक़ीदह है कि अल्लाह आखोँ से हर गिज़ दिखाई नही देता, क्योँ कि आख़ोँ से दिखाई देने का मतलब यह है कि वह एक जिस्म है जिसको मकान, रंग, शक्ल और सिम्त की ज़रूरत होती है,यह तमाम सिफ़तें मख़लूक़ात की है,और अल्लाह इस से बरतरो बाला है कि उसमें मख़लूक़ात की सिफ़तें पाई जायें।

    इस बिना पर अल्लाह को देखने का अक़ीदा एक तरह के शिर्क में मुलव्विस होना है। क्योँ कि क़ुरआन फ़रमाता है कि “ला तुदरिकुहु अलअबसारु व हुवा युदरिकु अलअबसारा व हुवा लतीफ़ु अलख़बीरु ” [10] यानी आँखें उसे नही देखता मगर वह सब आँखों को देखता है और वह बख़्श ने वाला और जान ने वाला है।

    इसी वजह से जब बनी इस्राईल के बहाना बाज़ लोगों ने जनाबे मूसा अलैहिस्सलाम से अल्लाह को देखने का मुतालबा किया और कहा कि “लन नुमिना लका हत्ता नरा अल्लाहा जहरतन ”[11] यानी हम आप पर उस वक़्त तक ईमान नही लायेंगे जब तक खुले आम अल्लाह को न देख लें। हज़रत मूसा (अ.)उनको कोहे तूर पर ले गये और जब अल्लाह की बारगाह में उनके मुतालबे को दोहराया तो उनको यह जवाब मिला कि “लन तरानी व लाकिन उनज़ुर इला अलजबलि फ़इन्नि इस्तक़र्रा मकानहु फ़सौफ़ा तरानी फ़लम्मा तजल्ला रब्बुहु लिल जबलि जअलाहुदक्कन व ख़र्रा मूसा सइक़न फ़लम्मा अफ़ाक़ा क़ाला सुबहानका तुब्तु इलैका व अना अव्वलु अलमुमिनीनावल ”[12] यानी तुम मुझे हर गिज़ नही देख सकोगो लेकिन पहाड़ की तरफ़ निगाह करो अगर तुम अपनी हालत पर बाकी रहे तो मुझे देख पाओ गे और जब उनके रब ने पहाड़ पर जलवा किया तो उन्हें राख बना दिया और मूसा बेहोश हो कर ज़मीन पर गिर पड़े,जब होश आया तो अर्ज़ किया कि पालने वाले तू इस बात से मुनज़्ज़ा है कि तुझे आँखोँ से देखा जा सके मैं तेरी तरफ़ वापस पलटता हूँ और मैं ईमान लाने वालों में से पहला मोमिन हूँ। इस वाक़िये से साबित हो जाता है कि ख़ुदा वन्दे मुतआल को हर नही देखा जा सकता।

    हमारा अक़ीदह है कि जिन आयात व इस्लामी रिवायात में अल्लाह को देखने का तज़केरह हुआ है वहाँ पर दिल की आँखों से देखना मुराद है, क्योँ कि कुरआन की आयते हमेशा एक दूसरी की तफ़्सीर करती हैं। “अल क़ुरआनु युफ़स्सिरु बअज़ुहु बअज़न ”[13]

    इस के अलावा हज़रत अली अलैहिस्सलाम से एक शख़्स ने सवाल किया कि “या अमीरल मोमिनीना हल रअयता रब्बका ? ” यानी ऐ अमीनल मोमेनीन क्या आपने अपने रब को देखा है ?आपने फ़रमाया “आ अबुदु मा ला अरा ” यानी क्या मैं उसकी इबादत करता हूँ जिसको नही देखा ? इसके बाद फ़रमाया “ला तुदरिकुहु अलउयूनु बिमुशाहदति अलअयानि,व लाकिन तुदरिकुहु अलक़लूबु बिहक़ाइक़ि अलईमानि”[14]उसको आँखें तो ज़ाहिरी तौर परनही देख सकती मगर दिल ईमान की ताक़त से उसको दर्क करता है।

    हमारा अक़ीदह है कि अल्लाह के लिए मख़लूक़ की सिफ़ात का क़ायल होना जैसे अल्लाह के लिए मकान,जहत, मुशाहिदह व जिस्मियत का अक़ीदह रखना अल्लाह की माअरफ़त से दूरी और शिर्क में आलूदह होने की वजह से है। वह तमाम मुकिनात और उनके सिफ़ात से बरतर है, कोई भी चीज़ उसके मिस्ल नही हो सकती।