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    ख़ुशी और प्रसन्नता के महत्त्व – 2

    ख़ुशी और प्रसन्नता के महत्त्व – 2
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    हम सब की चाहत होती है कि हमारा जीवन सफ़ल एवं समृद्ध हो। ख़ुशियों से इन्सान को अपने जीवन में संतोष प्राप्त होता है। जीवन में ख़ुशियों की प्राप्ति एक ऐसा विषय है जिसमें अधिकांश लोगों को दिलचस्पी होती है। पिछली कड़ी में हमने स्थिर ख़ुशियों की प्राप्ति के कुछ मार्गों का उल्लेख किया था। अब हम इस संदर्भ में अन्य मार्गों की चर्चा करेंगे।

    ख़ुश रहने का एक तरीक़ा हंसना है, जिससे ख़ुशी को प्रकट किया जाता है। शोध से पता चलता है कि हंसना न केवल लोगों की ख़ुशी का कारण है बल्कि उन्हें स्वस्थ भी रखता है।
    हंसी से शरीर का इम्यून सिस्टम या प्रतिरक्षी तंत्र मज़बूत होता है और उससे निराशा उत्पन्न करने वाले हॉर्मोन में कमी होती है तथा उनसे प्रतिरक्षी तंत्र प्रभावित नहीं होता। हंसते और खिलखिलाते चेहरे सामाजिक मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं, इसीलिए इस्लामी शिक्षाओं में सिफ़ारिश की गई है कि सामाजिक मेल मिलाप और मुलाक़ातों में मुस्कराते और हंसते रहना चाहिए, यहां तक कि अगर दिल दुखी भी हो। मुस्कराहट और हंसी, दिल को द्वेष से पाक कर देते हैं और लोगों के बीच मेल मिलाप में वृद्धि का कारण बनते हैं। जब हम हंसते हैं तो हमारे शरीर और मन को बहुत लाभ पहुंचता है। हंसी उस समय लाभदायक होती है जब सही समय पर हो और उससे दूसरों के दिलों को ठेस न पहुंचे। इस्लाम मुस्कराने और ख़ुश रहने की सिफ़ारिश के साथ ही क़हक़हा लगाकर हंसने से मना करता है। इस्लाम एक दूसरे का मज़ाक़ उड़ाकर ख़ुश होने का भी विरोध करता है।

    प्रफुल्ल चेहरा, अच्छा आचरण और नर्म लहजे में बातचीत ऐसे गुण हैं कि जिन्हें हर कोई पसंद करता है और दूसरों से इसकी आशा रखता है। इन्सानों के लिए यह विशेषता ऐसी ही जैसी वनस्पतियों के लिए सूर्य का प्रकाश। जिस प्रकार सूर्य वनस्पतियों में नई जान फूंकता है, उसी तरह अच्छे बर्ताव, मीठी बातचीत और ख़ुश मिज़ाजी से इंसान स्वस्थ, ज़िंदा दिल और प्रसन्न रहता है। अल्लाह ने क़ुरान में विनम्रता और अच्छे आचरण के कारण पैग़म्बरे इस्लाम (स) की प्रशंसा की है। हज़रत अली (अ) ने कट्टरता और क्रोध को एक प्रकार का पागलनपन क़रार दिया है और अपने दोस्तों से अच्छे आचरण एवं अच्छी बोलचाल का आहवान किया है। स्वयं वे अपने साथियों से बहुत मीठे लहजे में बातचीत किया करते थे और उनके साथ हंसी मज़ाक़ करते थे तथा लोगों को आकर्षित करने के लिए इसे सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा मानते थे। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) के अनुसार, एक मुसलमान का अपने दूसरे मुसलमान भाई के लिए हंसता और मुस्कराता चेहरा बहुत अच्छा है। वे फ़रमाते हैं कि मिनम्र रहो, अच्छा बोलो और अपने भाई से ख़ुश मिज़ाजी से मिलो।

    व्यवस्थित रूप एवं स्वच्छ वस्त्र धारण करने और ख़ुशबू लगाने से मन ताज़ा होता है और प्रसन्नता प्राप्त होती है। इसी कारण धार्मिक शिक्षाओं में इसकी सिफ़ारिश की गई है। पैग़म्बरे इस्लाम स्वयं स्वच्छ रहने, अच्छे और साफ़ सुथरे वस्त्र धारण करने और ख़ुशबू के उपयोग में एक आदर्श थे। वे फ़रमाते हैं कि अपने वस्त्रों को साफ़ सुथरा रखो, दातून करो और सजे बने अर्थात व्यवस्थित रहो।
    निःसंदेह व्यवस्थित रूप से रहने, साफ़ सुथरे वस्त्र पहनने और ख़ुशबू के प्रयोग का लोगों संबंधों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और एक प्रकार से हर किसी को इससे ख़ुशी प्राप्त होती है।
    ख़ुशहाल जीवन की प्राप्ति का एक दूसरा रास्ता परिजनों एवं संबंधियों से से मेल मिलाप है। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, मेल जोल से आयु में वृद्धि होती है। संभवतः उसका एक कारण एक दूसरे से मिलने जुलने और बातचीत से लोगों का मन हलका हो जाता है जिससे वे शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। उत्तम मेल मिलाप की शुरूआत अपने परिजनों से होती है। जब पति और पत्नि शांति से एक साथ बैठकर बातचीत करते हैं और जीवन के मामलों में विचार विमर्श करते हैं तो वे इस बात के लिए आश्वस्त हो सकते हैं कि ख़ुशियां उनके द्वार से बस एक क़दम की दूरी पर हैं। इसलिए कि कठिनाईयों में एक दूसरे के साथ से उत्साहित हैं। ईश्वर भी उनके जीवन में उनके बीच प्यार और प्रेम द्वारा समृद्धता प्रदान करता है, इस प्रकार उनके दुख और दर्द दूर हो जाते हैं और घर में ख़ुशियां भर जाती हैं। निःसंदेह परिजनों एवं सगे संबंधितों से मेल मिलाप और उनके साथ उठने बैठने से मन ख़ुश होता है। अच्छे और भले लोगों के साथ उठने बैठने से इंसान को आंतरिक संतोष एवं ख़ुशी प्राप्त होती है और उसके दुख दर्द दूर होते हैं।

    ख़ुशियां प्राप्त करने का एक मार्ग यात्रा भी है। एक सीमित स्थान पर रहना, हर दिन एक जैसे ही काम अंजाम देना और एक ही तरह के लोगों से मिलते रहने और बातचीत करने से भी इंसान बोर होता है और थकन महसूस करता है। कभी दिनचर्य के घटनाक्रमों का दबाव इंसान को थका देता है और जीवन में कड़वाहट घोल देता है। यात्रा करने और दिनचर्य के कामों एवं शोर शराबे से दूर होने से इंसान को ताज़गी प्राप्त होती है और नई ऊर्जा मिलती है। यद्यपि यह परिवर्तन एक ही दिन के लिए क्यों न हो।
    पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने इस बिंदु की ओर संकेत करते हुए फ़रमाया है, यात्रा करो ताकि स्वस्थ रहो।

    हज़रत अली (अ) ख़ुश रहने में यात्रा की भूमिका का उल्लेख करते हुए फ़रमाते हैं, प्रगति एवं विकास के लिए अपने वतनों से दूर जाओ और यात्रा करो, इसलिए की यात्रा में पांच लाभ छिपे हुए हैं, मन की ख़ुशी एवं प्रसन्नता, आजीविका की प्राप्ति, ज्ञान एवं अनुभव की प्राप्ति, जीवन के संस्कारों का सीखना और दक्ष एवं महान लोगों से मुलाक़ात।
    सेहत एवं स्वास्थ्य भी एक बहुत ही मूल्यवान ईश्वरीय अनुकंपा है, ख़ुशहाल जीवन में इसकी बहुत अहम भूमिका होती है। स्वास्थ अदृश्य अनुकंपा है जब इंसान से छिन जाती है तो उसके चिन्ह प्रकट होने लगते हैं। इस मूल्यवान विषेशता का जीवन में महत्व इतना अधिक होता है कि भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रतिभाएं इसके द्वारा प्रकट होती हैं और यह ईश्वरयी अनुकंपाओं से लाभान्वित होने का आधार बनती है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) का कथन है, जीवन का लाभ प्राप्त नहीं होता लेकिन यह कि स्वास्थ्य एवं सेहत द्वारा।

    सेहतमंद एवं स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम एवं खेलकूद की बहुत सिफ़ारिश की गई है, और इससे इंसान को ख़ुशी भी प्राप्त होती है। शरीर और आत्मा के बीच क्योंकि परस्पर एवं सीधा संबंध है, इसीलिए जब कभी शरीर तरो-ताज़ा रहता है, आत्मा से निराशा एवं आलस्य भी दूर हो जाता है। इसी के दृष्टिगत कहा गया है कि स्वस्थ बुद्धि स्वस्थ शरीर में होती है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) का कथन है, व्यायाम करो और खेलो कूदो, तुम्हारे धर्म में उकताहट एवं नीरसता देखकर मुझे दुख होगा।
    दूसरों से हंसी मज़ाक़ और उन्हें प्रसन्न रखने से भी ख़ुशी प्राप्त होती है। लेकिन इस शर्त के साथ कि दूसरों को अपमान न हो और किसी का मज़ाक़ नहीं उड़ाया जाए। पैग़म्बरे इस्लाम (स) की नज़र में धर्म में गहरी आस्था रखने वालों की एक विशेषता ख़ुश मिज़ाज होना है। इसी कारण, धर्म में गहरी आस्था रखने वालों की जीवन शैली में हंसी मज़ाक़ का विशेष स्थान होता है। धार्मिक शिक्षाओं में है कि धर्म में गहरी आस्था रखने वाला ख़ुश मिज़ाज एवं नर्म लहजे में बात करने वाला होता है, और पाखंडी अंहकारी एवं क्रोध करने वाला होता है।
    पैग़म्बरे इस्लाम (स) मुसलमानों के चेहरों से दुख दर्द दूर करने के लिए कभी कभी उनके साथ हंसी मज़ाक़ किया करते थे और उन्हें हंसाते थे। इस संदर्भ में हज़रत अली फ़रमाते हैं, पैग़म्बरे इस्लाम (स) की शैली यह थी कि जब वे अपने किसी साथी को दुखी देखते थे, उसके साथ मज़ाक़ करके उसे ख़ुश किया करते थे और फ़रमाते थे, लोगां का अपने दोस्तों के साथ कठोरता से मिलना ईश्वर को पसंद नहीं है।

    इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) के एक साथी यूनुस शीबानी का कहना है कि एक दिन इमाम सादिक़ ने मुझ से पूछा, आप लोग हंसी मज़ाक को कैसा समझते हैं? मैंने जवाब दिया, हम बहुत कम हंसी मज़ाक़ करते हैं। इमाम ने फ़रमाया, ऐसा नहीं करो, निःसंदेह हंसी मज़ाक़ अच्छे आचरण का भाग है। और निःसंदेह तुम इस प्रकार अपने भाई को ख़ुश करते हो। पैग़म्बरे इस्लाम (स) लोगों से हंसी मज़ाक़ किया करते थे और उन्हें ख़ुश रखा करते थे।

    हालांकि हंसी मज़ाक़ अपने आप मूल्यवान नहीं है। यही कारण है कि उसके लिए कुछ शर्ते हैं। अगर वह अपनी सीमा से पार हो जाए तो उसका प्रभाव उलट जाता है, और लोगों को ख़ुश करने के बजाए उन्हें दुखी करता है। उदाहरण स्वरूप, हंसी मज़ाक़ में सच्चाई एवं वास्तविकता की सीमा को पार नहीं करना चाहिए और झूट नहीं बोलना चाहिए। इस संदर्भ में हज़रत अली (अ) फ़रमाते हैं, कोई भी ईमान का स्वाद नहीं चख सकता लेकिन यह कि वह अपने मज़ाक़ एवं गंभीरता में झूठ को छोड़ दे।

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