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    ख़ून की विजय – 2

    ख़ून की विजय – 2
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    मोहर्रम का महीना इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन की याद दिलाता है। कर्बला के मैदान में हुसैनी आंदोलन सदैव के लिए अमर हो गया। हो सकता है कि आपके मन में यह प्रश्न उठे कि पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के पचास वर्ष बाद की कम अवधि में इस्लामी समाज कहां पहुंच गया कि करबला की घटना घटी और पैग़म्बरे इस्लाम के नाती इमाम हुसैन को शहीद कर दिया गया। इमाम हुसैन के मदीना नगर से मक्के और मक्के से करबला की ओर पलायन और यात्रा के दौरान इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भाषणों का यदि सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाए तो हमें बहुत सी ज्ञानवर्धक बातें सामने आती हैं।
    इमाम हुसैन (अ) ने मदीने से मक्के और मक्के से करबला की यात्रा 160 दिनों में तय की। इमाम हुसैन (अ) ने यज़ीद के आज्ञापालन का इन्कार करते हुए 28 रजब को अपने नाना के मदीने को छोड़ दिया और मक्के की ओर रवाना हो गये और तीन शबान को उन्होंने विभूतियों की स्रोत मक्के की पवित्र धरती पर क़दम रखा। पवित्र नगर मक्के में इमाम हुसैन (अ) शाबान, रमज़ान, शव्वाल, ज़ीक़ाद और आठ ज़िल्हिज्जा तक रहे और जब उन्हें पता चला कि हाजियों के वेश में हत्यारे काबे की परिक्रमा के दौरान उनकी हत्या करना चाहते हैं तो उन्होंने इतिहास के सबसे महान आंदोलन का आधार रखने के लिए वहां से करबला की ओर पलायन किया।
    पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के बाद घटने वाली घटनाएं इस वास्तविकता की पुष्ट करती हैं कि समाज के कुछ धड़ों ने अज्ञानता के काल की परंपराओं और आस्थाओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया और कुछ लोगों ने अपनी ढुलमुल आस्था के कारण मौन धारण किए रखा और सत्ता तक उनकी पहुंच बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपने अमर संदेश और अपने महान व अध्यात्मिक व्यक्तित्व से उस समय के समाज में भारी परिवर्तन उत्पन्न किया किन्तु उनके स्वर्गवास के बाद लोगों ने उनके परिजनों से मुंह फेर लिया और धर्म में नई – 2 बातें प्रविष्ट करने का प्रयास करने लगे। यह विषय माविया और उसके भ्रष्ट पुत्र यज़ीद के शासन काल में अपने चरम पर पहुंच गया था।
    इन परिस्थितियों में इमाम हुसैन जैसी हस्ती मौनधारण नहीं कर सकती थी और इन ख़तरनाक व भ्रष्ट विचारधाराओं की मूकदर्शक नहीं रह सकती थी। मदीने से मक्के और मक्के से करबला तथा करबला में शहादत से पहले उन्होंने जितने पत्र लिखे, भाषण दिए और कथन बयान किए वह समय के इस्लामी समाज की विपदा को बयान करने वाले और उनकी क्रांति के लक्ष्य को बयान करने वाले थे।
    22 रजब सन साठ हिजरी क़मरी में माविया के मरने के बाद उसका भ्रष्ट पुत्र यज़ीद शासक बना और गद्दी संभालते ही उसने तुरंत विभिन्न स्थानों पर अपने गर्वनरों को पत्र लिखकर माविया के मरने और अपने शासक बनने की सूचना दी। उसने पत्र में उन्हें अपने पदों पर बने रहने और लोगों से पुनः आज्ञापालन का वचन लेने का आदेश दिया। उसने इसी प्रकार मदीने के गवर्नर वलीद को भी पत्र लिखा और उसने इस पत्र के साथ एक छोटा सा पत्र भी भेजा जिसमें उन तीन प्रसिद्ध हस्तियों से आज्ञा पालन का वचन लेने पर बल दिया गया था जो माविया के काल में यज़ीद के आज्ञापालन पर तैयार न थे। पत्र में आया था कि किसी भी प्रकार हुसैन इब्ने अली, अब्दुल्लाह बिन उमर और अब्दुल्लाह बिन ज़ुबेर से आज्ञापालन का वचन लो और उन्हें किसी भी प्रकार की छूट व अवसर न दो।
    वलीद को जैसे ही यह पत्र मिला उसने माविया के काल के गवर्नर मरवान बिन हकम को बुलाया और उक्त पत्र के बारे में सलाह करने लगा। उसने सुझाव दिया कि इन तीनों लोगों को माविया की मृत्यु की सूचना फैलने से पहले जितनी जल्दी हो सके दरबार में बुलाओ और यहीं इन लोगों से आज्ञापालन का वचन ले लो। वलीद ने उसी समय अपने एक कारिंदे को इमाम हुसैन के पास दरबार में आने का निमंत्रण लेकर भेजा। इमाम हुसैन वलीद के पास पहुंचे और जब उसने यज़ीद की आज्ञापालन का प्रस्ताव पेश किया तो इमाम हुसैन ने कहा कि मुझ जैसा यज़ीद जैसे का आज्ञापालन नहीं कर सकता। हम पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन हैं, हम पवित्रता के प्रतीक हैं, हम ईश्वरीय संदेश के स्रोत हैं, हमारा परिवार फ़रिश्तों के आने जाने और ईश्वरीय संदेश उतरने का स्थान है किन्तु यज़ीद जो मुझसे आज्ञा – पालन की आशा रखता है, शराबी है और निर्दोष लोगों का हत्यारा। वह ऐसा व्यक्ति है जिसने ईश्वरीय आदेशों का उपहास किया और खुलकर सबके सामने वर्जित कार्य करता है और शराब पीता है। मुझ जैसा प्रतिष्ठित यज़ीद जैसे शराबी की आज्ञापालन नहीं कर सकता। इस संबंध में हमें यह देखना होगा कि इस्लामी समाज पर शासन के योग्य कौन है और लोगों के मार्गदर्शन और उनपर शासन करने का किसे अधिकार है।
    इस प्रकार इमाम हुसैन (अ) ने अपने इस बयान से यह स्पष्ट कर दिया कि वह माविया के पुत्र यज़ीद के बारे में क्या दृष्टिकोण रखते हैं और उसकी सरकार को ग़ैर क़ानूनी समझते हैं। इमाम हुसैन ने अपने परिवार की विशेषताओं व गुणों को जो इस्लामी समाज के मार्गदर्शन के योग्य है, बयान करने के बाद यज़ीद की धज्जियां उड़ा दीं और यह सिद्ध कर दिया कि वह इस्लामी नेता बनने के योग्य नहीं है। इमाम हुसैन (अ) शक्ति के उस भ्रम को तोड़ना चाहते थे जो अयोग्य होते हुए मुसलमानों पर शासन करना चाहती थी और भ्रष्टता फैलाकर इस्लामी समाज को दिगभ्रमित करना चाहती थी। इमाम हुसैन यह बात भलिभांति जानते थे कि यज़ीद चाहता था कि इस्लामी शासन की आड़ में इस्लाम व क़ुरआन से संघर्ष में अबू सुफ़ियान के परिवार के लक्ष्य को व्यवहारिक बनाए।
    अलबत्ता उस काल में इमाम हुसैन के इस निर्णय पर प्रतिष्ठित लोगों की भी प्रतिक्रिया सामने आयी। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के पुत्र मुहम्मद हनफ़िया उन लोगों में से एक थे जो इमाम हुसैन के निर्णय से चिंतित और घबराए हुए थे । प्रसिद्ध इतिहासकार तबरी और अन्य इतिहासकारों के हवाले से आया है कि मुहम्मद हनफ़िया ने जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का यह निर्णय सुना तो वह आपकी सेवा में उपस्थित हुए और इस प्रकार कहा कि भाई, आप लोगों में सबसे लोकप्रिय और सम्मानीय हैं, मैं जिस चीज़ में भलाई समझता हूं, मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं आपको बताऊं। मैं समझता हूं कि आपके लिए जहां तक संभव हो किसी एक नगर में न रहें और स्वयं को अपने बच्चों को यज़ीद की पहुंच से बहुत दूर रखें और यहां से बहुत दूर चले जाएं और लोगों की ओर अपने प्रतिनिधि भेंजे और लोगों का समर्थन प्राप्त करें और यदि उन्होंने आपकी आज्ञापालन का वचन दिया तो ईश्वर का आभार व्यक्त करें और यदि दूसरों का आज्ञापालन कर लें तब भी आपको कोई हानि नहीं पहुंचेगी। हज़रत इमाम हुसैन ने अपने भाई मुहम्मद हनफ़िया के उत्तर में कहा कि भाई तुम यज़ीद की आज्ञापालन से बचने के लिए एक नगर से दूसरे नगर जाने का सुझाव दे रहे हो तो यह जान लो कि यदि इस विस्तृत संसार में मेरे लिए कोई शरण न हो तब भी मैं यज़ीद की आज्ञा पालन नहीं करूंगा। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने बारम्बार रोकने पर कहा कि मेरे भाई, ईश्वर आपको पारितोषिक दे कि आपने भलाई करने की ज़िम्मेदारी निभाई किन्तु मैं अपने दायित्वों से भलिभांति अवगत हूं, मैंने मक्का जाने का निर्णय कर लिया है। मैने, मेरे बेटों, और मेरे भाईयों और भतीजों व भांजों तथा मेरे कुछ अनुयाइयों ने मेरे साथ यात्रा पर जाने का निर्णय किया है क्योंकि हमारी आस्थाएं समान हैं और हमारे लक्ष्य एक हैं किन्तु आपकी एक ज़िम्मेदारी यह है कि आप मदीने में ही रहें और मेरी अनुपस्थिति में बनी उमय्या के सहायकों की गतिविधियों पर दृष्टि रखें और आवश्यक सूचनाएं मुझ तक पहुंचाते रहें।
    रात के समय जब कारवां तैयार हो गया तो इमाम हुसैन पैग़म्बरे इस्लाम के मज़ार पर गये और मज़ार से लिपट कर रोने लगें। आप कह रहे थे कि नाना आपका हुसैन जा रहा है, नाना आपके सीने पर सोने वाला हुसैन जा रहा है, नाना आपके आनुयाइयों ने मुझे मदीने में रहने नहीं दिया, मुझे आप से जुदा कर दिया। हे ईश्वर यह तेरे पैग़म्बर की क़ब्र है और मैं तेरे पैग़म्बर का नाती हूं, मुझे किन परिस्थितियों का सामना है तू बेहतर जानता है, हे ईश्वर, मैं भलाई को पसंद करता हूं और बुराई से दूर हूं, हे सम्मान देने वाले महान ईश्वर, तुझे इस क़ब्र और इस क़ब्र में सोए व्यक्ति का वास्ता, मैं तुझसे कामना करता हूं कि मेरे सामने वह मार्ग प्रशस्त कर जो तेरी इच्छा व मर्ज़ी का मार्ग हो।
    हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी इस दुआ में अपने आंदोलन के महत्त्व की ओर संकेत किया। वह भलाई को पसंद करते हैं और बुराईयों से दूर हैं और सत्य से मित्रता व बुराई से दूरी, इस बात की मांग करती है कि हर उस बात को स्वीकार करने के लिए स्वयं को तैयार किया जाए जो सत्य को मज़बूत करने और बुराइयों के आधारों को ढाने में प्रभावी हो, यदि यह तैयारी अपनी जान के न्यौछावर करने के रूप में ही क्यों न सामने आए।
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