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    ख़ून की विजय – 3

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    कूफ़े वालों को जब यह पता चला कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यज़ीद की बैअत अर्थात उसका आज्ञापालन न करने का निर्णय किया है और वे पवित्र नगर मक्का में हैं तो उन्होंने इमाम हुसैन को बड़ी संख्या में पत्र भेजे। कूफ़े वालों की ओर से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को भेजे गए पत्रों का विषय लगभग इस प्रकार थाः- हमें एक ऐसे पथप्रदर्शक की आवश्यकता है जो हमको समस्याओं से मुक्ति दिलाए और हमारा मार्गदर्शन करे। हम कूफ़े वालों ने यज़ीद के प्रतिनिधि “नोअमान बिन बशीर” का विरोध आरंभ कर दिया है। हमने उसके साथ हर प्रकार का सहयोग समाप्त कर दिया है। अब हम उसके पीछे नमाज़ भी नहीं पढ़ रहे हैं। हम आपके आने की प्रतीक्षा में हैं। हमारी जो क्षमता है उसके अनुरूप हम आपके लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में सहयोग करेंगे। हम आपकी सेवा में अपनी जान और माल देने से भी नहीं हिचकिचाएंगे।
    इन पत्रों के उत्तर में, जिनकी संख्या बारह हज़ार से भी अधिक बताई गई है, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का जवाब इस प्रकार था। बिस्मिल्ला हिर्रहमानिर्रहीम। यह पत्र है हुसैन बिन अली की ओर से कूफ़े के ईमानदार और वरिष्ठ लोगों को। मैं अपने विश्वसनीय एवं चचाज़ाद भाई मुस्लिम बिन अक़ील को तुम्हारी ओर भेज रहा हूं। मैंने उनको आदेश दिया है कि वे निकट से तुम्हारे विचारों से अवगत होकर उसकी सूचना मुझको दें। यदि कूफे के अधिकांश लोगों की इच्छा वही होगी जो तुमने अपने पत्रों में लिखी है और तुम्हारे दूतों ने जैसा कहा है वैसा ही होगा तो फिर मैं जल्द ही तुमसे आकर भेंट करूंगा। अपनी जान की सौगंध, इमाम अर्थात सच्चा मार्गदर्शक वह है जो ईश्वर की किताब के अनुसार कार्य करे, न्याय का मार्ग अपनाए, सच्चाई का अनुसरण करे और अपने अस्तित्व को ईश्वरीय आदेश के लिए समर्पित कर दे। वस्सलाम।
    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने पत्र को मुस्लिम इब्ने अक़ील को दिया ताकि वे इसे कूफे ले जाएं। इमाम ने मुस्लिम को संबोधित करते हुए कहा कि मैं तुमको कूफे के लोगों की ओर भेज रहा हूं और ईश्वर तुमको उस कार्य में सफलता प्रदान करे जो उसकी इच्छा और उनकी प्रसन्नता का कारण है। अब तुम अपनी यात्रा आरंभ करो, ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे। मैं आशा करता हूं कि मैं और तुम दोनों शहादत का उच्च स्थान प्राप्त करें।
    अपने पत्र में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कूफ़े वासियों की मांगों का उत्तर देते हुए अपने दूत को भेजने की घोषणा की और बताया कि यह प्रतिनिधि मेरा भाई है और अति विश्वसनीय है। इस पत्र में उन्होंने इमाम अर्थात वास्तविक ईश्वरीय प्रतिनिधि की परिस्थितियों का उल्लेख किया जिसका अनुसरण प्रत्येक मुसलमान के लिए आवश्यक है। उन्होंने बताया कि ईश्वर के दूत का दायित्व, ईश्वर की किताब के अनुरूप कार्य करना, न्याय स्थापित करना और अपने अस्तित्व को ईश्वर की सेवा में समर्पित करना है। इसी प्रकार से कूफ़ेवासियों की ओर से सहकारिता की पुष्टि के उद्देश्य से मुस्लिम इब्ने अक़ील को कूफ़े भेजा जाना यह दर्शाता है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को कूफ़े वालों के दावों पर विश्वास नहीं था।
    हज के अवसर पर कि जब सारी दुनिया से मुसलमान मक्के की ओर हज करने के उद्देश्य से आते हैं, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मक्का छोड़ने का निर्णय किया। ज़िलहिज महीने के आरंभ में ही इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को यह ज्ञात हो गया कि यज़ीद के आदेश पर “उमर इब्ने सअद इब्ने आस”, जो हाजियों के मुखिया का रूप धारण किये हुए एक ख़तरनाक काम करने के उद्देश्य से मक्के में प्रविष्ट हुआ है। उसे यज़ीद ने आदेश दिया था कि मक्के में जहां कहीं भी संभव हो वह इमाम हुसैन की हत्या कर दे। इसी विषय के दृष्टिगत इमाम ने मक्के के सम्मान के दृष्टिगत हज न करके उमरा किया और 8 ज़िलहिज को वे मक्के से इराक़ के लिए निकल पड़े। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इराक़ के लिए निकलने से पहले बनी हाशिम के लोगों और उन शीयों के बीच एक भाषण दिया जो मक्के में उनसे आकर मिले थे। इस भाषण का एक भाग इस प्रकार हैः- सारी प्रशंसा ईश्वर की है। ईश्वर जो चाहेगा वही होगा। ईश्वर के अतरिक्त किसी अन्य शक्ति का शासन नहीं है सिवाए यह कि ईश्वर की इच्छा से हो। ईश्वर का सलाम हो उसके दूत पर। हम उसी में प्रसन्न हैं जिसपर ईश्वर सहमत है। समस्याओं और परीक्षा के मुक़ाबले में हम धैर्य और प्रतिरोध का सहारा लेते हैं और वह हमको धैर्य करने वालों का बदला देगा। पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के बीच कभी अलगाव नहीं होगा और वे स्वर्ग में उनसे मिलेंगे। इसका कारण यह है कि वे पैग़म्बरे इस्लाम की प्रसन्नता का कारण हैं और ईश्वर की सरकार के गठन का कार्य उन्हीं के माध्यम से पूरा होगा। सचेत हो जाओ कि तुममे से जो भी हमारे मार्ग में ईश्वर से भेंट के लिए अपनी जान देने हेतु तैयार है उसे चलने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। मैं इन्शालल्लाह कल अपनी यात्रा आरंभ करूंगा।
    इस प्रकार हम देखते हैं कि इमाम अपने साथियों को समझाते-बुझाते हैं और उनका शुद्धिकरण करते रहते हैं ताकि केवल वे ही लोग उनके साथ आएं जिनमें सांसारिक मायामोह न पाया जाता हो। इमाम हुसैन ने मक्के से यात्रा आरंभ करते समय ही अपने भाषण में स्पष्ट शब्दों में अपनी शहादत की बात कही थी और साथियों के लिए भी यह बात स्पष्ट कर दी थी ताकि यदि वे भी इसी प्रकार का बलिदान देने के लिए तैयार हैं और क़ुरआन के मार्ग मे अपनी जान न्योछावर करना चाहते हैं, तो उनको यात्रा के लिए तैयार हो जाना चाहिए।
    जिस समय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इराक़ की यात्रा की घोषणा की तो कुछ लोगों ने इस का विरोध किया। उन्होंने इमाम को यह प्रस्ताव दिया कि वे इस मार्ग पर न जाएं और अपना विचार त्याग दें। इस संबन्ध में इमाम के हितैषियों और चाहने वालों का तर्क यह था कि कूफ़ेवालों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को उनकी इराक़ यात्रा से विचलित करने की यह प्रक्रिया उनकी मदीना यात्रा से ही आरंभ हो चुकी थी जो उनके करबला पहुंचने तक जारी रही। इब्ने अब्बास और इब्ने ज़ुबैर इस बात पर बल दे रहे थे कि इमाम हुसैन मक्के में ही ठहर जाएं। इमाम ने यह बात स्वीकार नहीं की और अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर के उत्तर में कहा कि मैं चाहे मक्के में रहूं या फिर किसी अन्य स्थान पर सरकारी कारिंदे मेरा पीछा नहीं छोड़ेगे और सरकार के साथ मेरा मतभेद समाप्त होने वाला नहीं है यह बाक़ी रहेगा। इसका कारण यह है कि वे लोग मुझसे उस चीज़ की मांग कर रहे हैं जिसे मैं किसी भी स्थिति में पूरा नहीं करूंगा और मैं उनसे जिस बात को कह रहा हूं वे उसे नहीं मानेंगे।
    करबला जाते समय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम द्वारा दिये गए महत्वपूर्ण भाषणों में से एक वह है जो उन्होंने कवि फ़रज़दक़ से भेंट के समय दिया था। जिस समय इमाम हुसैन मक्के से इराक़ जा रहे थे, रास्ते में उनकी भेंट फ़रज़दक़ से हुई जो हज करने के उद्देशय से कूफ़े से मक्के की ओर जा रहे थे। फ़रज़दक़ से उनकी भेंट मक्के के बाहर हुई। इमाम हुसैन को विपरीत दिशा की ओर तेज़ी से जाते देखकर फ़रज़दक़ ने उनसे पूछा कि हे पैग़म्बर की संतान आप कहां जा रहे हैं? फ़रज़दक़ को यह तो ज्ञात हो चुका था कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, हज के संस्कार पूरे करने से पहले ही अपनी यात्रा पर निकले हैं। फ़रज़दक़ के जवाब में इमाम हुसैन ने कहा कि यदि मैं जल्दी न करता तो मुझको गिरफ़्तार कर लिया जाता। फ़रज़दक़ का मौन, मक्के की स्थिति और इमाम के निर्णय को समझने का परिचायक है। इमाम ने पूछा कि कूफे वाले किस प्रकार के लोग हैं? इसके उत्तर में फ़रज़दक़ ने कहा कि लोगों के हृदय तो आपके साथ हैं किंतु उनकी तलवारें आपके विरूद्ध हैं।
    फ़रज़दक़ के वाक्य से कूफे वालों के व्यक्तित्व की कमज़ोरी, वचनों पर बाक़ी न रहना और कूफ़े की स्थिति तथा कूफ़े वासियों की पहचान स्पष्ट है। इमाम हुसैन कुछ देर शांत रहते हैं फिर कहते हैं कि ईश्वर जो चाहता है वही करता है। हमारा ईश्वर नित नए कार्य करता है। यदि हम जो चाहते हैं ईश्वर की इच्छा भी वही हो तो फिर हमें उसकी अनुकंपाओं पर उसका धन्य कहना चाहिए और वह हमारा सहायक होगा। किंतु यदि हमारी इच्छाओं और ईश्वर की इच्छा में दूरी हो और हम अपनी इच्छाओं को प्राप्त न कर सकें तो जिसकी भावना सत्य और जिसकी शैली ईश्वरीय भय होगी वह वास्तविकता से दूर नहीं होगा।
    इन वाक्यों से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम यह बताना चाहते हैं कि सत्य के मार्ग में सफलता और विफलता, विजय व पराजय समान हैं। इस दृष्टिकोण को अपनाने वाला आशा, आंतरिक शांति, घटनाओं के समय उचित नीति निर्धारक और घटनाओं से भलिभांति रूप से गुज़रने जैसी विशेषताओं का स्वामी होता है। इस प्रकार की विचारधारा में कटुता मिठास में और दुख, सुख में परिवर्तित हो जाते हैं। फ़रज़द को संबोधित करते हुए इमाम हुसैन ने जो बातें कहीं उनमें से कुछ अन्य इस इस प्रकार हैं। हे फ़रज़दक़! यह बनी उमय्या ऐसे लोग हैं जो शैतान का सहयोगब करते हैं और कृपालु ईश्वर का अनुसरण नहीं करते। उन्होंने धरती पर भ्रष्टाचार को प्रचलित कर रखा है और ईश्वरीय आदेशों का उल्लंघन किया है। वे शराब पीते हैं। उन्होंने वंचितों और निर्धनों की संपत्ति को अपना समझ रखा है। एस में मेरा यह दायित्व बनता है कि मैं ईश्वर के मार्ग में आगे बढ़कर संघर्ष करूं। फ़रज़दक़ इमाम हुसैन से अलग होते हैं और इमाम का कारवां, कूफ़े की ओर बढ़ने लगता है।
    रास्ते में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को कूफ़े में अपने दूत मुस्लिम की शहादत की सूचना मिलती है। कूफ़े के निकट हुर के सैनिक इमाम हुसैन और उनके साथियों का रास्ता रोकते हैं। इस प्रकार इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कूफ़े की यात्रा को रोकने पर विवश होते हैं और करबला का रूख़ करते हैं।
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