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    ख़ून की विजय – 6

    ख़ून की विजय – 6
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    धर्म, कलात्मक दृश्यों एवं चरित्रों का प्रेरणा स्रोत है और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कलाकार को धार्मिक घटना की पुनः प्रस्तुति के लिए प्रेरित करता है। इस प्रभाव के उदाहरण को कर्बला की घटना एवं इमाम हुसैन (अ) और उनके 72 साथियों की शहादत की घटना से प्रभावित कला प्रवृत्ति में देखा जा सकता है। वह कला कि जिसे ईरान में ताज़िये कहा जाता है और मुहर्रम के आरंभिक दस दिनों में ईरान भर में प्रस्तुत किया जाता है। इस कला में यद्यपि समय के साथ परिवर्तन हुआ है लेकिन अभी भी यह ईरान व इस्लाम की मूल एवं प्राचीन कलाओं का भाग है।

    कहा जाता है कि आले बूये वंश के मुइज़्ज़ुद्दौला दैलमी राजा ने दसवीं शताब्दी ईसवी में कर्बला की त्रासदी की याद में आयोजित की जाने वाली शोक सभाओं को मान्यता देने का आदेश दिया। प्रारम्भ में यह सभाएं मातम करने वाले समूहों द्वारा धीमे धीमे चलकर एवं नौहा अर्थात शोक गीतों द्वारा कर्बला की घटना को प्रस्तुत करते थे। उसके बाद धीरे धीरे पढ़ने वालों का स्थान चरित्रों ने ले लिया कि जो इस प्रदर्शनी के प्रथम कलाकार बने। वे इमाम हुसैन (अ) के काल की वेशभूषा की भांति वेशभूषा धारण करके घटना की पुनः प्रस्तुति करते थे।

    ईरान में ताज़िये की स्थापना के महत्वपूर्ण कारणों में से एक ईरान में सफ़वी वंश की स्थापना एवं शिया पंथ को मान्यता प्राप्त होने के अतिरिक्त, ऐसे लोग थे कि जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों की प्रशंसा एवं ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन करते थे।

    इसी प्रकार, ताज़िये की प्रदर्शनी में इतनी शक्ति थी कि जो लोग राजनीतिक एवं सामाजिक कठिनाईयों तथा अत्याचार ग्रस्त परिस्थितियों में जीवन व्यतीत करते थे उनका दृष्टिकोण परिवर्तित कर दे और देखने वालों को स्वतंत्र चयन से अवगत कर दे। इसलिए कि ताज़िये का विषय अधिकांश धार्मिक कलाओं के समान, न्याय व अन्याय एवं अच्छाई व बुराई की शक्तियों में टकराव को पेश करना है।
    इमाम हुसैन (अ) और उनके परिवार का मदीने से प्रवास, कूफ़े के लोगों के समर्थन के प्रति संतुष्टि प्राप्त करने हेतु इमाम हुसैन (अ) के दूतों की हत्या एवं गिरफ़्तारी, इमाम हुसैन (अ) के दूत हज़रत मुस्लिम के दो छोटे बच्चों की क़ैद, उनके परिवार का परिवेष्टन व उन पर पानी का प्रतिबंध ताज़िये प्रदर्शनी के महत्वपूर्ण विषय हैं।
    इसी प्रकार, इमाम हुसैन (अ), अबुल फ़ज़्लिल अब्बास (अ) जनाबे क़ासिम, हज़रत अली अकबर व अली असग़र (अ) और अंततः उनके परिवार के बच्चों एवं महिलाओं को गिरफ़्तार करना और उन्हें क़ैद में डालना जैसे विषय ताज़िये की प्रदर्शनी में प्रस्तुत किए जाते हैं।

    मरसिये की भाषा का पद्य के रूप में होने एवं धार्मिक शौर्य गाथाओं के पद्य के रूप में होने के कारण कि जो उसका स्रोत है, ताज़िये की प्रदर्शनी की अधिकांश भाषा पद्य के रूप में है। लेकिन उसके शेर दक्ष कवियों द्वारा नहीं लिखे गए हैं और उनमें से अधिकतर आम भाषा से प्रभावित हैं, इसीलिए सामान्य दर्शकों के लिए उन्हें समझने में कोई कठिनाई नहीं होती है और वे दर्शकों के साथ बड़ी ही सरलता से संपर्क स्थापित कर लेते हैं।

    ताज़िये की पटकथा में कथा सुनाना, संवाद, युद्ध में आत्मपरिचय जैसी शैलियों का प्रयोग किया जाता है और हर चरित्र विशेष शेर पढ़ता है। ताज़िये के कलाकारों के लिए संगीत, साहित्य एवं कर्बला की घटना का ज्ञान और सुन्दर एवं आकर्षक आवाज़ मूल शर्तों में से है। ध्यान योग्य है कि ताज़िए का आयोजन करने वाले और इसी प्रकार देखने वाले भूमिका निभानों वालों को कदापि कलाकार नहीं कहते हैं बल्कि उन्हें शबीह ख़्वान कहते हैं, इसलिए कि आम विश्वास यह है कि ताज़िये प्रदर्शनी का आयोजन केवल कर्बला की दर्दनाक घटना की याद ताज़ा करने के लिए किया जाता है।

    ताज़िए में दृश्यों को बहुत ही सरलता एवं प्रतीकात्मक उपकरणों द्वारा पेश किया जाता है। पानी का एक बर्तन फ़ुरात नदी एवं इमाम हुसैन (अ) और उनके साथियों की प्यास का प्रतीक है, दर्पण सत्य एवं पवित्रता का प्रतीक है, दीप इमाम हुसैन (अ) के अस्तित्व और लाल झंडे तथा सफ़ैद एवं लाल परों वाले कबूतर कर्बला के शहीदों का प्रतीक हैं।

    पिछली शताब्दियों में ताज़िये के आयोजन के स्थान, बाज़ार और मुसाफ़िरख़ाने थे और धीमे धीमे विशेष पवित्र स्थलों के निर्माण विशेषकर क़ाजार काल में ताज़िये का अधिक विकास हुआ। किन्तु वर्तमान समय में इमाम बाड़े, पवित्र स्थल एवं आवागमन के सार्वजनिक स्थान हैं ताकि आम लोगों और विभिन्न वर्गों के लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर सकें।

    ताज़िये ईरान के अतिरिक्त, इराक़ और भारतीय उपमहाद्वीप में थोड़े अलग ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। इंडोनेशिया और कैरिबिया के त्रिनिदाद इलाक़े वह स्थान हैं कि जहां मोहर्रम के महीने में एक प्रकार से ताज़ियों का आयोजन किया जाता है।
    http://hindi.irib.ir/