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    ख़ून की विजय – 7

    ख़ून की विजय – 7
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    नवीं मोहर्रम सन 61 हिजरी क़मरी का दिन था जो तासूआ के नाम से जाना जाता है। इस दिन दोपहर हो चुकी थी और सूरज धीरे धीरे ढल रहा था। ख़ूंख़ार शत्रु ने कर्बला के मरुस्थल में अपनी गतिविधियां तेज़ कर दी थी और ऐसा लग रहा था कि किसी भी पल जंग हो सकती है। अचानक यज़ीदी सेनापति उमर बिन साद ने अपने दरिंदे सिपाहियों को हमले का आदेश दिया। घोड़ों की टापों की भयानक आवाज़ से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिवार की महिलाएं और बच्चे घबरा रहे थे। हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा घबराई हुयीं अपने भाई इमाम हुसैन के पास पहुंचीं ताकि स्थिति से अवगत हो सकें।
    इस्लामी इतिहासकार तबरी की किताब तारीख़े तबरी में अबू मिख़नफ़ के हवाले से इस घटना का यूं उल्लेख किया गया हैः इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ख़ैमे के सामने सिर झुकाए बैठे हुए थे कि उनकी बहन ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा उनके पास पहुंचीं और कहाः हे भाई! क्या आप आने वाली आवाज़ों को सुन रहे हैं? इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहाः मेरी बहन! ईश्वर की कृपा हो आप पर। धैर्य रखिए!
    उस समय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने भाई हज़रत अब्बास को संबोधित करते हुए कहाः हे अब्बास! मेरी जान तुम पर न्योछावर हो। शत्रुओं के पास जाओ और उनसे पूछो कि क्यों हमारी ओर बढ़ रहे हैं? हज़रत अब्बास कि जिन्हें देख कर शत्रु को पसीने छूट जाते थे, उनके पास गए और समझ गए कि वे या तो इमाम हुसैन से यज़ीद के आज्ञापालन का वचन लेना चाहते हैं या उन्हें और उनके साथियों को शहीद करना चाहते हैं। हज़रत अब्बास अपने भाई के पास लौटे और उन्हें शत्रु के इरादे से अवगत कराया। उसी समय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने भाई अब्बास से कहाः उनकी ओर पलट कर जाओ और संभव हो तो उन्हें लौटा दो और जंग को कल तक टलवा दो ताकि हम आज की रात अपने ईश्वर की उपासना में बिताएं, उससे प्रार्थना करें और क्षमा मांगें कि वह जानता है कि मुझे नमाज़ पढ़ना और उसकी किताब की तिलावत करना तथा अधिक क्षमा मांगना बहुत प्रिय है।
    इस प्रकार आशूरा की पूर्व रात्रि इतिहास में ईश्वर की प्रार्थना व वंदना की प्रसिद्ध रातों का हिस्सा बन गयी। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इस रात की मोहलत ली ताकि एक व्यवहारिक उदाहरण द्वारा अपने आंदोलन की प्रवृत्ति को चित्रित कर सकें और सबको बता दें कि इस महाआंदोलन का उद्देश्य धर्म और वास्तविक बंदगी को जीवित करना है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को जिस बात की चिंता थी वह लोगों की धर्म की आत्मा तथा ईश्वर की वास्तविक बंदगी से दूरी थी। लोग विदित रूप से नमाज़ पढ़ते, रोज़ा रखते और पवित्र क़ुरआन की तिलावत करते थे किन्तु वास्तव में उनके मन में इस्लाम कमी खोखली शिक्षाएं थीं जिसे यज़ीद और यज़ीदियों ने प्रचलित किया था कि ऐसे इस्लाम में अत्याचार से संघर्ष, न्याय की स्थापना, भलाई का आदेश देना और बुराई से रोकने जैसे संस्कार का कोई स्थान नहीं था।
    आशूर की पूर्व रात्रि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके निष्ठावान साथियों की ईश्वर के स्मरण की अंतिम रात थी। इतिहास में आशूर की पूर्व रात्रि का इस प्रकार उल्लेख मिलता हैः रात आ पहुंची और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने आशूर की पूर्व रात्रि को उपासना तथा ईश्वर से क्षमा-याचना में बिताया और इस रात उनके साथी ईश्वर की उपासना में इस सीमा तक लीन थे कि बड़े बड़े आत्मज्ञानी इसका वर्णन कर पाने में अक्षम हैं।
    आशूर की पूर्व रात्रि के वर्णन में मिलता है कि इस रात इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने साथियों को अपने ख़ैमे में बुलाया और उन्हें इख़्तियार दे दिया कि चाहे वे साथ रहें या चले जाएं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बात समाप्त होने के बाद उनके साथियों ने निष्ठा व वफ़ादारी का ऐसा दृष्य पेश किया जो इतिहास के पन्ने में अमर हो गया।
    आशूर की पूर्व रात्रि को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने एक भाषण में अपने साथियों व संबंधियों से कहाः हे प्रभुवर! तेरा आभार व्यक्त करता हूं कि तूने अंतिम ईश्वरीय दूत के द्वारा हमें सम्मान दिया, क़ुरआन तथा धर्मशास्त्र की शिक्षा दी। सत्य की बात सुनने वाले और देखने वाले कान और आंख दिए तथा जागरुक मन दिए। प्रभुवर! हमे आभार व्यक्त करने वालों में शामिल कर।
    इस बात में संदेह नहीं कि मुझे अपने साथियों से अधिक कोई निष्ठावान साथी नज़र नहीं आता और इनसे बेहतर मैं किसी को नहीं जानता और अपने परिजनों से अधिक सदाचारी व दयालु मैंने नहीं देखा। ईश्वर तुम्हें मेरी सहायता करने का पारितोषिक दे। जान लो कि मुझे इन कूफ़े वालों से किसी सहायता की कोई उम्मीद नहीं है। मैं तुम्हारे सिर से अपने आज्ञापालन की प्रतिबद्धता उठाए लेता हूं और तुम्हें अनुमति देता हूं कि रात के अंधेरे को ख़तरे की जगह से दूर निकलने के लिए प्रयोग करते हुए निकल जाओ। नगरों व गावों में बिखर जाओ यहां तक कि ईश्वर अपनी सहायता पहुंचाए और तुम्हें मुक्ति मिले। ये लोग मेरी जान के पीछे हैं। इन्हें तुमसे कोई लेना देना नहीं है।
    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बात ख़त्म होने के बाद उनके साथी एक एक करके उठे और उन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के प्रति अपने हर प्रकार के समर्थन पर बल देते हुए उनके आज्ञापालन पर अपनी वचनबद्धता का विश्वास दिलाया। इस बीच सबसे पहले हज़रत अब्बास उठे और उन्होंने कहाः छोड़ कर चलें जायें? हम ऐसा क्यों करें? इसलिए कि आपके बाद कुछ दिन और जी लें कदापि नहीं! ईश्वर हमें वह दिन न दिखाए।
    हज़रत अब्बास की बात ख़त्म होने के बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिवार के दूसरे सदस्यों और साथियों ने भी हज़रत अब्बास की तरह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का साथ देने का आग्रह दोहराया।
    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथियों में सबसे पहले मुस्लिम बिन औसजा खड़े हुए और उन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सेवा में कहाः “हम किस बहाने से आपको छोड़ दें। ईश्वर की सौगंध हम उस समय तक आपसे अलग नहीं होंगे जब तक कि अपनी बरछी शत्रु के दिल में तोड़ न दें। जब तक तलवार का दस्ता मेरे हाथ में है, आपके शत्रुओं का वध करुंगा और जब लड़ने के लिए हथियार न होगा तो उनसे पत्थर से लड़ूंगा। ईश्वर की सौगंध आपकी सहायता से पीछे नहीं हटूंगा यहां तक कि ईश्वर जान ले कि हमने आपका वैसा सम्मान किया जैसा पैग़म्बरे इस्लाम के निकट आपका सम्मान था। ईश्वर की सौगंध यदि हमें सत्तर बार मारा जाए और पुनः सत्तर बार जीवित किया जाए तब भी आपका साथ नहीं छोड़ेंगे।”
    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने साथियों की निष्ठा व श्रद्धा भरी बातें सुनने के बाद उन्हें उनकी शहादत की सूचना दी तथा स्वर्ग और ईश्वर की ओर से अद्वितीय पारितोषित की शुभसूचना दी।
    आशूर की पूर्व रात्रि का एक भव्य दृष्य इमाम हसन अलैहिस्सलाम के बेटे हज़रत क़ासिम की इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बातचीत है। हज़रत क़ासिम ने किशोरावस्था की चौखट पर ताज़ा क़दम रखा था। उन्होंने बड़ी उत्सुकता से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से पूछाः क्या मैं भी शहीद हूंगा? इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने बड़ी विनम्रता व स्नेहमयी स्वर में पूछाः मेरे बेटे! मौत तुम्हारी दृष्टि में कैसी है? हज़रत क़ासिम ने कहाः हे चचा! मेरे निकट मौत शहद से अधिक मीठी है। हज़रत क़ासिम की वीरता एवं आध्यात्म से भरी बात सुनकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की आंखों से आंसू निकल आए और कहाः हां तुम भी कठिन क्षणों से गुज़रने के बाद शहीद होगे और इसी प्रकार मेरा बेटा अब्दुल्लाह अर्थात अली अस्ग़र भी शहीद होगा। यह सुनकर हज़रत क़ासिम ने कहाः क्या शत्रु का लश्कर ख़ैमों पर हमला करेगा? इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने हज़रत अब्दुल्लाह अर्थात हज़रत अली अस्ग़र की शहादत का वर्णन किया जिसे सुनकर हज़रत क़ासिम और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के सभी साथी रो पड़े। हज़रत अब्दुल्लाह को हज़रत अली अस्ग़र कहते हैं जो कर्बला में शहादत के समय छह महीने के थे।
    आशूर की पूर्व रात्रि को आकाश के सितारे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके निष्ठावान साथियों को अंतिम बार देख रहे थे। सभी साथी अपने प्रियतम से मिलने को उत्सुक थे किन्तु हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा एक कोने में बैठी बड़ी हसरत से अपने भाई इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को देख रही थीं। जब कर्बला की गाथा को अमर बनाने वाली यह महान महिला समझ गयी कि कल इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम शहीद कर दिए जाएंगे तो बेताब होकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पास पहुंची और कहाः काश मौत मुझे अपने दामन में ले लेती और मेरा जीवन समाप्त कर देती। आज हमारी मां फ़ातिमा ज़हरा, पिता अली और भाई हसन हमारे साथ नहीं हैं। हे पूर्वजों के उत्तराधिकारी व बचे हुए लोगों के आश्रय। क्या शत्रु आपको निर्ममता से मार डालेंगे। इस बात से मेरा कलेजा फटा जा रहा है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी बहन हज़रत ज़ैनब को गले लगाया और उन्हें ढारस बंधाते हुए कहाः हे बहन ईश्वर को याद रखो और धैर्य से स्वयं को ढारस दो।
    जी हां यह आशूर की पूर्व रात्रि की घटना का थोड़ा सा वर्णन है। यद्यपि सन 61 हिजरी के नौ मोहर्रम के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके परिजन तथा साथी शत्रु से घिरे हुए और भूखे प्यासे थे तथा महिलाएं और बच्चे बेचैन थे किन्तु आशूर की पूर्व रात्रि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों ने ईश्वर की वंदना का बेहतरीन उदाहरण पेश किया। इसी प्रकार इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथियों ने उनके प्रति अपनी वफ़ादारी व निष्ठा का ऐसा उदाहरण पेश किया जो इतिहास में कहीं और नहीं मिलता। उन्होंने अपनी उपासना से रात के अंधेरे को प्रकाशमय बना दिया और ईश्वर से मिलने के लिए स्वयं को तय्यार किया।
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