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    ग़ीबत चुगली

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    हमारे घरों में अक्सर झगड़े और फ़साद की एक वजह होती है। वो वजह इतनी हम लोगों में जड़ पा चुकी है कि हमें खुद इसके वजूद का एहसास तक नहीं होता..
    वो है ग़ीबत…यह वो चीज़ है जिसको हम सोचने बैठें तो हमें पता नहीं चलता के कहाँ से शुरू हुई….
    ग़ीबत हम लोग आजकल में ऐसे कर रहे होते हैं जैसे यह कोई बात ही न हो, जबकि अगर हम उसकी गहरायी में जायेंगे तो इसमें हमें फ़साद की सारी जड़ें नज़र आयेंगी।

    इसकी सब से ज़्यादा आदत औरतों में पाई जाती है, कुछ औरतों में तो यह आदत इतनी ज़्यादा हो चुकी है कि उन्हें पता तक नहीं चलता वो ग़ीबत और चुग़ल खौरी कर रही हैं।
    लेकिन ज़्यादा तर लोगों को यह तक पता नहीं होगा कि ग़ीबत है क्या,….अक्सर औरतें जब एक साथ बैठती हैं तो किसी न किसी की बुराई कर रही होती हैं, या वो किसी का ज़िक्र इस अंदाज़ में कर रही होती हैं कि अगर वो शख़्स सुन ले तो उसे बुरा लगे।
    उन्हें इस की इतनी आदत पड़ चुकी होती है कि उन को यह समझ में आता ही नहीं कि वो क्या कर रही हैं…इसी तरह जिस तरह एक झूट का आदी शख्स बिना किसी इरादे के झूट बोल जाता है, उसी तरह औरतों में ग़ीबत की आदत पाई जाती है। जहाँ चार औरतें बैठीं, अगर उन में से एक उठ कर चली गयी तो उसकी बुराई शुरू हो जाती है।
    एक बार हज़रत मुहम्मद (स.) ने सहाबा से पूछा कि तुम जानते हो ग़ीबत क्या होती है? ग़ीबत वो होती है कि तुम अपने भाई का इस अंदाज़ में ज़िक्र करो जिसे वो पसंद नहीं करता।
    पूछा गया: और अगर वो बात उस में पाई जाती हो, तो आपने फ़रमाया कि अगर वो बात जो तुमने कही है वो उसमे पाई जाती हो तो, अगर वो बात उस में पाई जाती है तो ग़ीबत है, अगर वो बात उस में मोजूद नहीं है तो तुमने उस पर बोहतान लगाया है।
    तो इस से हमें पता चलता है कि ग़ीबत कहते हैं ऐसी बुराई को जो किसी के अन्दर पाई जाई और उसको उसके पीठ पीछे कोई बयान करें वोह ही ग़ीबत कहलाती है, यानि किसी के बारे में कोई ऐसी बात कही जाए, जिस को सुन कर उसे बुरी लगे। और उसे दुख पहुंचे।
    अगर यही बात उस के सामने ना की जायह तो यह ग़ीबत कहलाएगी, और अगर उसकी मोजूदगी में की जाएगी तो उसका नाम दिल आज़ारी है। (दिल को चोंट पहुंचाना है)
    कुछ लोग यह समझते हैं कि ग़ीबत करना बुरी बात नहीं है क्यों कि उन का कहना है कि यह बात तो हम उसके मुह पे भी कह सकते हैं, तो इस से वोह यह नहीं समझते कि वो एक ग़लती और कर रहे होते हैं, यानी अब उसके मुह पे करके उसके दिल को तकलीफ़ भी पहुंचाएंगे। एक तो ग़ीबत की जो ख़ुद बहुत बड़ा गुनाह है और फिर उसके मुँह पे कह कर उसके दिल को तकलीफ़ भी पहुंचाई जो कि एक और बड़ा गुनाह अंजाम दिया।
    हज़रात मुहम्मद (स.) ने इसके बारे में नसीहत फरमाई:-
    “चुनाचे ग़ीबत के नतीजे में एक और बुराई पैदा होती है, वो दुख पहुंचाने का मफ़हूम अपने अन्दर रखती है, यानी चुग़ल खौरी।
    इस से हमें यह भी पता चलता है कि ग़ीबत करना तो बुरी बात है लेकिन अगर कोई किसी को ग़ीबत करते सुने और वो उस शख्स तक पहुंचा दे, जिसके बारे में की गयी हो, तो उस चुग़ल-खोर की मिसाल ऐसी है जैसे कोई किसी की तरफ़ तीर फेंके और वो तीर निशाने पे न लगा हो और उसके क़दमों में गिर जायह, और आपने जा कर वो तीर उठा कर उसके सीने में घोंप दिया हो, मतलब यह कि आपने उस तीर अंदाज़ का मक़सद पूरा कर दिया।
    तो इस से साबित होता है कि किसी की दिल आज़ारी करना मना है। किसी को दुख़ देना मना है, किसी के गुनाहों पे नज़र रखना मना है,
    गुनाहों से हया की तालीम दी गयी है,
    यह वो गन्दी आदत है जिसने पूरी दुनिया को अपनी लपेट में ले रखा है, हमें चाहिए ख़ुद को इस गन्दी आदत से आज़ाद करें। जो हर दूसरे घर में फ़साद की वजह बनी हुई है।
    इसी तरह अक्सर हम दो आपस में लड़ने वालों के बीच बहस के वक़्त यह जुमले भी सुनते हैं, कि मैं क्यूं झूट बोलूं? मेरी सच बोलने की आदत है मैंने सच्ची बात मुँह पे कह दी, क्यू कि मैं बहुत साफ़ कहने वाला हूँ, तो ऐसे “साफ़ कहने वाले” इन्सान पर अल्लाह के रसूल (स.) ने लानत भेजी है। और फ़रमाया है “अल्लाह का अज़ाब इसको पकड़ेगा।
    तो इस से यह भी पता चलता है कि सच का मतलब हर गिज़ यह नहीं कि जो बात किसी के दिल को दुखाए इंसान बॉस बने वो उस के मुँह पे मार दे।
    ठीक इसी तरह, कुछ लोग यह भी कहते हैं कि हम ने तो सिर्फ़ बात सुनी है, हमने ग़ीबत नहीं की और न ही बुराई की। तो ऐसे लोग यह भी जान लें कि जिसने किसी की ग़ीबत सुनी और उसे मना नहीं किया तो वो उस में उसका बराबर का शरीक है।
    इसी तरह इस में जुस्तुजू (तलाश) की एक क़िस्म और पाई जाती है। कुछ लोगों को बिला वजह तलाश करने की आदत होती है कि फलां क्या कर रहा है, क्या नहीं कर रहा, कहाँ जा रहा है कहाँ नहीं..ऐसे लोग एक वक़्त में इस नोबत तक पहुंच जाते हैं कि वो किसी में बुराई न होते हुए भी उस में बुराई ढूंने में लगे रहते हैं। और यह फिर से बोहतान (इलज़ाम) लगाने की वजह बन जाती है।
    इस के बारे में हज़रत मुहम्मद (स.) ने फ़रमाया: यह वो लोग हैं, जो जुबान से ईमान लाये हैं, मगर इन के दिल में ईमान दाखिल नहीं हुआ, तुम मुसलमानों की ग़ीबत न किया करो और उनके ऐब और उनकी कमज़ोरियों का पीछा न किया करो, उनकी तलाश में न लगे रहो, क्यूं कि जो शख्स उनकी कमज़ोरियों का पीछा करेगा तो अल्लाह ताला उसके अपने ऐब और  गुनाह ज़ाहिर करदेगा कि वो अपने ही घर में रुसवा हो जायेगा।
    एक जगह हज़रत मुहम्मद (स.) ने यहाँ तक फ़रमाया कि ग़ीबत ज़िना से भी बुरी हरकत है, सहाबा (र.) ने अर्ज़ किया वो कैसे? आपने फ़रमाया: आदमी ज़िना करता है और फिर तौबा कर लेता है, अल्लाह उसकी तौबा क़बूल फ़रमा लेता है (अगर सच्चे दिल से तौबा की हो और उस की तरफ़ दोबारा न पलटने का वादा करे), लेकिन ग़ीबत करने वाले को माफ़ नहीं करता जब तक वो न माफ़ करे जिसकी ग़ीबत की गई हो।
    इसी तरह उन लोगों के लिए जो बाराबर ग़ीबत करते हैं उनका कफ़्फ़ारा उसी सूरत में है कि वो शख्स उन्हें माफ़ कर दे जिसकी ग़ीबत की गई है फिर अल्लाह भी उसे अपनी रेहमत के साय में माफ़ कर देता है।
    इस हदीस से पता चलता है कि ज़ाहिरी तौर से यह छोटी सा गुनाह भी हमें कितना बड़ा नुक़सान पहुंचा सकता है।
    मुझे उम्मीद है कि मेरे पढ़ने वाले यह पढ़ कर ज़रूर अपने अन्दर कुछ तबदीली लाना चाहेंगे। और पूरी कोशिश करेंगे कि इस तरह के गुनाहों से बचे रहें।