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    ग़ुस्ल के अहकाम

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    सवालः एक आदमी शरीअत के ह़ुक्म से जाहिल होने के कारण एक समय तक

    ग़ुस्ल की तरतीब का पालन नहीं करता था तो उसके लिए उस

    समय के नमाज़ और रोज़े का क्या ह़ुक्म है?
    जवाबः अगर ग़ुस्ल को इस तरह़ अंजाम दिया है कि शरीअत

    के हिसाब से ग़लत है तो उन नमाज़ों को दोबारा पढ़ना ज़रूरी है

    जो उसने ह़दसे अकबर (वह निजासत जिसके कारण ग़ुस्ल

    वाजिब होता है) की हालत में पढ़ी हैं लेकिन अगर उसको

    ग़ुस्ल के सही होने का विश्वास था तो रोज़ो को दोबारा

    रखना ज़रूरी नहीं है।