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    गीलान प्रांत, हस्तकलाओं का केन्द्र

    गीलान प्रांत, हस्तकलाओं का केन्द्र
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    अधिकांश पुरातन वेत्ताओं और शोधकर्ताओ का मानना है कि मिट्टी के बर्तनों को बनाने की कला की जन्म स्थली ईरान है और यहीं से यह कला अन्य देशों में फैली और यह मानवीय उत्पादन की प्राचीन गतिविधियों में से एक है। यह भी कहा जाता है कि मिट्टी के बर्तन बनाने का उद्योग दस हज़ार वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया था। विशेषज्ञ और शोधकर्ता हस्त उद्योगों के मध्य मिट्टी के बर्तन बनाने की कला के विशेष महत्त्व को स्वीकार करते हैं। ईरानी कला की समीक्षा नामक महत्त्वपूर्ण पुस्तक के अमरीकी लेखक जान शेप्ली ने अन्य हस्त उद्योगों में मिट्टी के बर्तन बनाने के उद्योग को सबसे श्रेष्ठ हस्त उद्योग बताया है। ईरान-विशेषज्ञ जी ग्लाक जिन्होंने मिट्टी के बर्तन बनाने की कला के संबंध में शोध करने के लिए ईरान के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा की थी, उन्होंने ईरान के हस्त उद्योग की एक सैर नामक अपनी पुस्तक में गीलान के मिट्टी के बर्तन की कला की समीक्षा की है।

    वे अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि गीलान में महिलाएं मिट्टी के बर्तन बनाने और उन पर डिज़ाइनें बनाने का काम करती हैं। पुरुष गीली मिट्टी तैयार करते हैं और बर्तन तैयार होने के बाद बेचने के लिए उन्हें बाज़ार ले जाते हैं। इतिहास पूर्व गीलान के मिट्टी के बर्तनों के अवशेषों पर बने डिज़ाइन अब तक के मिट्टी के बर्तनों पर डिज़ाइनों में सबसे रोचक व सबसे आकर्षक हैं। जिस वस्तु ने इसको बेहतरीन रुप प्रदान किया है वह स्थानीय रोस कही जाने वाली मिट्टी की गुणवत्ता है जिसमें स्वयं विभिन्न रुपों में ढलने की क्षमता पायी जाती है। इसके उत्पादन हल्के होते हैं और शीघ्र रूप धारण करने वाली और प्राकृतिक चमक रखने वाली इस मिट्टी को कम तापमान पर पकाया जाता है।

    गीलान के मिट्टी के बर्तनों में ध्यान योग्य बिन्दु उसकी विविधता है। आजकल गीलान में जो मिट्टी के बर्तन बनाए जा रहे हैं उनको दो गुटों में विभाजित किया जा सकता है। पहले मिट्टी की वह चीज़ें जिन्हें लोग अपनी दिनचर्या की आवश्यकता के लिए प्रयोग करते हैं उनका उत्पादन भारी संख्या में होता है। जैसे छत बनाने के लिए खपरैल और प्रतिदिन प्रयोग होने वाले विभिन्न बर्तनों का निर्माण। दूसरे साज सज्जा के लिए बनाए जाने वाले बर्तन जिनके निर्माण के लिए अधिक आत्मबोध और योग्यता की आवश्यकता होती है।

    गीलान के मिट्टी के बर्तन बनाने की विशेषताओं में से एक उसका चमकदार व लसदार होना है। गीलान के अधिकतर मिट्टी का बर्तन बनाने वाले पालिश का प्रयोग नहीं करते ताकि अपने काम को अधिक से अधिक विशुद्ध व असली रूप में बनाएं और जहां पर पालिश या रंग का प्रयोग आवश्यक होता है वहां पर हरे रंग का लेप प्रयोग करते हैं और यह रंग गीलान की प्रकृति से बहुत अधिक मेल खाता है।

    वर्तमान समय में गीलान के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषकर आसालम, लाहीजान, रूदसर, लंगरूद, रश्त, तालिश, सूमे सरा, आस्तारा और सियाहकल में मिट्टी बर्तन बनाने की कला प्रचलित है। असालम क्षेत्र में, रो मिट्टी की बेहतरीन गुणवत्ता के कारण मिट्टी के बर्तन बनाना बहुत अधिक प्रचलित है। इस क्षेत्र में मिट्टी के बर्तन बनाना एक प्राचीन परंपरा के रूप में प्रचलित है जिसका अतीत कई हज़ार वर्ष पुराना है।

    गीलान प्रांत में जंगल और वृक्षों की अधिकता के कारण विभिन्न प्रकार की लकड़ियां बहुत ही सरलता से मिल जाती हैं और इस प्रांत में हाथ से बनी विभिन्न प्रकार की अतिसुन्दर चीज़ों को देखा जा सकता है। लकड़ियों को सुन्दर ढंग से तराशना, उस पर बड़ी सूक्ष्मता से विभिन्न प्रकार की डिज़ाइनें बनाना और लड़कियों को विभिन्न सुन्दर रूपों में ढालना जिसे ख़र्राती और नाज़ुककारी कहा जाता है, इस क्षेत्र में प्रचलित कलाओं में से है।

    ख़र्राती लकड़ी पर होने वाली उस सुन्दर कला को कहते हैं जिसमें लकड़ी को रंदे पर रखा जाता है और उसकी परिधि पर रखकर लकड़ी को मनचाही सुन्दर आकृतियों में ढाला जाता है। ख़र्राती से बनने वाली वस्तुओं में गुलदान, शकरदान, चाकलेट के डिब्बे, सूखे मेवे रखने के डिब्बे, एशट्रे, हुक़्क़ा और छड़ी इत्यादि का नाम लिया जा सकता है।

    नाज़ुककारी उस कला को कहते हैं जिसमें आरी, छोटे रंदे, रेती, छेनी और बसुले जैसे यंत्रों से लकड़ी के बहुत पतले एवं छोटे छोटे टुकड़ों पर सूक्ष्म डिज़ाइनें बनाई जाती है और उसके बाद पत्तर की भांति लकड़ी से बने बर्तनों पर चिपका दिया जाता है। चिपकाए गये टुकड़ों को दबाया जाता है और इस प्रकार वे एक सुन्दर रूप धारण कर लेते हैं। नाज़ुककारी कला द्वारा बनाई गयी वस्तुओं में चाकलेट के डिब्बे, एशट्रे, फ़ोटो फ़्रेम इत्यादि का नाम लिया जा सकता है। यद्यपि लकड़ी के हस्तकला से बनी हुई वस्तुएं उतनी सीमित नहीं है जितना आपको बताया गया है। लकड़ी पर मोअर्रक़ भी बहुत ही सुन्दर लकड़ी की कला है जो विशेष रूप से रश्त नगर में प्रचलित है।

    नमदा भी गीलान प्रांत में प्रचलित प्राचीन हस्त उद्योगों में से एक है। यह उद्योग प्राचीन काल से अब तक गीलान प्राप्त में प्रचलित रहा है इस प्रकार से कि नमदा वर्तमान समय में यहां का एक स्थानीय उद्योग समझा जाता है।

    दबाए गये रेशम या ऊन से तैयार होने वाले नमदे को विभिन्न कार्यों जैसे ज़मीन पर बिछ़ाने, कपड़ों, टोपी इत्यादि में प्रयोग किया जाता है। अन्य क्षेत्रों की तुलना में गीलान में सबसे अधिक नमदे का प्रयोग किया जाता है। नमदे पर गीलान की जनता के ध्यान देने और रुचि का महत्त्वपूर्ण कारण, नमी से इसका प्रभावित न होना है। नमी से प्रभावित न होने की विशेषता नमदे के आरंभिक पदार्थ अर्थात रेशम से उत्पन्न होती हैं। गीलान में निरंतर नमी और वर्षा के कारण इस प्रांत के निवासी विशेषकर ग्रामवासी अन्य क्षेत्रों की तुलना में ज़मीन पर बिछाने और कपड़ों के लिए नमदा बहुत अधिक प्रयोग करते हैं। गीलान प्रांत के ग्रामवासी, जंगलों में रहने वाले और पशुपालक ठंडक और वर्षा से बचने के लिए नमदे से रेनकोट की भांति एक विशेष प्रकार का वस्त्र बनाते हैं जिसे स्थानीय भाषा में बालापोशी कहा जाता है। गीलान के कुछ क्षेत्रों में यही बालापूशी, दोशी के नाम से भी प्रसिद्ध है।

    गीलान प्रांत के अन्य हस्त उद्योगों में रेशम, ऊन और धागे से बुनी हुई वस्तुओं का नाम लिया जा सकता है। गीलान प्रांत की रेशम, ऊन और धागे से बनी हुई वस्तुओं की सुन्दरता, सूक्ष्मता और रंगों का मेल आश्चर्यजनक होता है। हाथ से बुनी हुई इन अद्वितीय वस्तुओं के बनाने में ईरानी कलाकार महिलाओं की मुख्य भूमिका होती है। विभिन्न प्रकार की ज़रदोज़ी व कढ़ाई एमब्रोड्री जिसे स्थानीय भाषा में रूदूज़ी कहा जाता है और रश्त नगर में प्रचलित कुरोशिये से बनाई जाने वाली डिज़ाइनें भी जिसे क़ुल्लाबदूज़ी कहा जाता है, बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं। यह हस्तकला अतीत में रश्त नगर में प्रचलित थी और बहुत से स्थानीय लोग इस कार्य में व्यस्त रहते थे किन्तु वर्तमान समय में इसमें पहले जैसी बात नहीं रही।

    गीलान प्रांत के सुन्दर हस्त उद्योग को जिन स्थानों पर देखा जा सकता है उन में से एक गीलान का बाज़ार है। गीलान के कुछ बाज़ार स्थाई हैं तो कुछ साप्ताहिक और कुछ मौसम के अनुसार लगते हैं जबकि कुछ विशेष अवसरों पर। इनमें से हर बाज़ार के अपने विशेष रीति रिवाज हैं और यह रीतिरिवाज धार्मिक और सांस्कृतिक आस्थाओं से मिलकर बने होते हैं। यह बाज़ार क्षेत्र के विभिन्न स्थानों, गांवों और नगरों में शनिवार से शुक्रवार तक लगाए जाते हैं और इन बाज़ारों में स्थानीय लोगों के विभिन्न उत्पादों को पेश किया जाता है और इससे बाज़ारों की चहल पहल और आकर्षण और अधिक बढ़ जाता है।

    जिस वस्तु ने गीलान के बाज़ार को ईरान के केन्द्रीय बाज़ारों से भिन्न किया है, वस्तुओं की विविधता और वे उत्पाद हैं जिन्हें स्वयं ग्रामवासियों ने अपने हाथों से बनाया है और उन्हें बहुत ही उचित मूल्य पर बेचने के लिए रखा जाता है। गीलान प्रांत के स्थानीय बाज़ारों में बेची जाने वाली सब्ज़ियों में बोई जाने वाली सब्जियां, स्वंय उगने वाली सब्ज़ियां, विभिन्न प्रकार के रसीले फल, ज़ैतून, बाक़ला, लौकी, मछली, चावल, स्थानीय लुंगी जिसे चादरे शब कहा जाता है, ऊंनी मोज़े, दही, स्थानीय मट्ठा और विभिन्न प्रकार की स्थानीय लोहे की बनी हुई चीज़ों का नाम लिया जा सकता है।

    इन बाज़ारों में मासूले का क़ालीन बाज़ार, रूदबार का ज़ैतून और रश्त और अंज़ली का मछली बाज़ार बहुत अधिक प्रसिद्ध है और हर यात्री एक बार इस बाज़ार में ख़रीदारी के लिए अवश्य जाता है।

    बाज़ारे इमाम ज़ादे आस्तारा, बाज़ारे आस्ताने अशरफ़िया, इमाम ज़ादे इब्राहीम, इमाम ज़ादे हाशिम व शाहे शहीदान इस क्षेत्र के तीर्थस्थलीय बाज़ारों में गिने जाते हैं। वर्ष के विशेष अवसरों पर यह बाज़ार लगते हैं और इन दिनों यहां पर बहुत चहल पहल रहती है।

    लोगों की बढ़ती मांग के कारण साप्ताहिक बाज़ारों में ख़ूब धूम रहती है और साप्ताहिक बाज़ारों में बेची जाने वाली वस्तुएं हर वर्ग की आवश्यताओं के अनुसार होती है। गीलान प्रांत के स्थानीय बाज़ारों में स्थानीय महिलाओं की भूमिका बहुत अधिक होती है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। महिलाएं, पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर बाज़ार में सामान बेचती हैं और सब्ज़ियां, हाथ से बुनी हुई वस्तुएं, मुर्ग़ी, मुर्ग़ी के अंडे, दूध, दही जैसी वस्तुएं इन बाज़ारों में बेची जाती हैं। साप्ताहिक बाज़ार हर सप्ताह एक क्षेत्र में लगते हैं जैसे शनिवार को बंदर अंज़ली, रविवार को सूमे सरा, सोमवार को ख़ुश्कीजार में यह बाज़ार लगते हैं।