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    चहारमहाल व बखतियारी-3

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    चहार महाल व बख्तियारी प्रांत अद्वितीय प्राकृतिक आकर्षणों के साथ ज़ाग्रोस पर्वत माला के मध्य ऊंचाई पर स्थित है। फ्रांसीसी पर्यटक हेनरी रेने डालमानी ने अपनी किताब “खुरासान से बख्तियारी तक के यात्रावृतांत” में चहार महाल व बख्तियारी प्रांत का वर्णन इस प्रकार किया है” यह बहुत ही सुन्दर एवं हरा- भरा प्रांत है, इसमें पानी से भरी नदियां, घने जंगल और बड़ी- बड़ी चारागाहें हैं ऊंचे- ऊंचे पर्वत, गहरे दर्रों, बड़ी ऊंचाई पर स्थित भव्य मार्गों, रास्तों, चट्टानों, और विशालकाय प्राकृतिक हिमखंडों आदि से बहुत ही मनमोहक एवं मनोरम दृश्य उत्पन्न हो गया है। बसंत के मौसम में पहाड़ के आंचल लाल रंग के फूलों से इस प्रकार ढ़क जाते हैं कि गाढ़े भूरे रंग की चट्टानें अग्नि के समान प्रतीत होती हैं। यद्यपि फ्रांसीसी पर्यटक डालमानी ने लगभग एक शताब्दी पूर्व चहार महाल व बख्तियारी प्रांत की यात्रा की थी परंतु आज भी इस प्रांत की प्राकृतिक सुन्दरता वैसे ही है जैसे वर्षों पहले थी और इसे देखने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता है। इस प्रांत के हर क्षेत्र में ऊंची- नीची पहाड़ियां, हरी- भरी ढ़लानें, रमणीय दृश्य, सुन्दर सोते और पानी से भरी नदियां हैं। इन चीज़ों के अस्तित्व से जो मनोहर दृश्य उत्पन्न हो जाता है उसका उल्लेख शब्दों में नहीं किया जा सकता। चहार महाल व बख्तियारी प्रांत के केन्द्रीय नगर, शहरे कुर्द के ७३ किलोमीटर पश्चिम में ज़र्दकूह नामक गगनभेदी पर्वत स्थित है। इस पर्वत माला का नाम ज़ाग्रोस है जिसका एक पहाड़ ज़र्दकूह भी है। यह पर्वत माला ईरान के पश्चिमोत्तर से दक्षिणपूर्व तक १६०० किलोमीटर लम्बी है। इस पर्वत माला में ईरान की कुछ ऊंची चोटियां हैं जैसे देना नाम की प्रसिद्ध चोटी जिसकी ऊंचाई ४४०९ मीटर है। इसी प्रकार ज़र्दकूह की चोटी है जिसकी ऊंचाई ४२२१ मीटर है जबकि एक अन्य चोटी उश्तोरान्कूह है जिसकी ऊंचाई ४१५० मीटर है। ज़र्दकूह सीमित क्षेत्र दो पहाड़ों शाह शहीदान और कूहरंग पर आधारित है और इनमें से हर एक के नाम का अपना एक विशेष कारण है। मुख्य पहाड़ या ज़र्दकूह बख्तियारी, १९वीं ईसवी शताब्दी के अंत तक ऐसा क्षेत्र था जिस तक पहुंचा नहीं जा सकता था और प्रायः विदेशी पर्यटक उस के अंदर नहीं जा पाते थे। आज जबकि चहार महाल व बख्तियारी प्रांत में प्रवेश और ज़र्दकूह की ऊंचाई पर जाने के लिए किसी प्रकार की सीमा नहीं है फिर भी इस क्षेत्र का बड़ा भाग अभी भी अछूता है। पर्वतारोही ज़र्दकूह में हर क़दम रखता है तो ऐसा प्रतीत होता है मानो प्राकृतिक हिमखंडों, विभिन्न सोतों और छोटी- बड़ी झीलों में पैर रख रहा है तथा इस क्षेत्र में सासानी और हख़ामनेशी काल के दुर्गों के अस्तित्व से इस क्षेत्र की सुन्दरता और अधिक हो गयी है। ज़र्दकूह की ऊंचाईयों पर पत्थर के बने बड़े-२ शेरों को देखा जा सकता है जो समय बीतने के बावजूद पहाड़ की ढ़लान पर अब भी मौजूद हैं और ये पत्थर के बने शेर बख्तियारी बंजारों की वीरता की गाथा सुनाते हैं। ज़र्दकूह की ऊंचाई पर चढ़ते समस कहीं कहीं पर एसे पत्थर भी दिखाई देते हैं जिन पर ऊकेर कर चित्रकारी की गयी है और उन्हें क़ब्रिस्तान को सुसज्जित या चिन्हित करने के लिए लगाया गया है और शेरों की बड़ी-२ मूर्तियां बड़े लोगों की क़ब्रों की सूचक हैं। ज़र्दकूह के किनारे एक सुन्दर गांव चेलगेर्द है जो चहार महाल व बख्तियारी प्रांत का एक सुन्दर क्षेत्र है और जाड़े के मौसम में स्की एवं दूसरे खेलों के लिए बहुत ही उपयुक्त स्थल है। इस क्षेत्र में अधिक हिमपात प्रायः नवंबर-दिसंबर में आरंभ होता है और कभी उसके बाद, महीनों तक हिमपात होता है। इस आधार पर आर्थिक और सामाजिक विकास की योजना में चेलगेर्द गांव को एक महत्वपूर्ण पर्यटन ध्रुव के रूप में देखा जाता है। चेलगेर्द की इस्की पोस्ट ज़ाग्रोस पर्वत के आंचल में स्थित इस्की पोस्टों में से एक प्रसिद्ध इस्की पोस्ट है। यह इस्की पोस्ट लगभग ८०० मीटर लम्बी है तथा इसकी ढ़लान २० अंश है और इसमें तीन अलग- अलग भाग हैं। परिवारों, महिलाओं और पुरूषों के लिए। चूंकि क्षेत्र में जाड़े का मौसम लम्बा होता है इसलिए वर्ष में अधिक समय तक इसका लाभ उठाया जाता है। प्राकृतिक हिमखंडों, विभिन्न झीलों, सुन्दर तालाबों, जिसमें विभिन्न प्रकार के जीव- जन्तु रहते हैं, और ज़र्दकूह के पश्चिम में बलूत के हरे- भरे व घने जंगलों को देखकर प्रत्येक दर्शक मंत्रमुग्ध रह जाता है और वह इस क्षेत्र की प्रशंसा करने पर बाध्य हो जाता है। बहुत से पर्यटकों ने इस सुन्दर क्षेत्र की सैर की है और उसकी भूरी-२ प्रशंसा की है। १९वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में जिन थोड़े से विदेशी पर्यटकों ने चहार महाल व बख्तियारी प्रांत के अपरिचित व अछूते क्षेत्र की यात्रा की और इसके लिए उन्होंने सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय की, उनमें से एक श्रीमती Isabella bishop थीं जो इस क्षेत्र की सुन्दरता पर वशीभूत हो उठी थीं और तीन महीनों तक उन्होंने ज़र्दकूह के विभिन्न क्षेत्रों की सैर की। उन्होंने अपने देश ब्रिटेन लौटने के बाद “ईरान और कुर्दिस्तान यात्रा”नामक पुस्तक लिखी। ज़र्दकूह पर्वत के आंचल में २० से अधिक नदियां सदैव बहती रहती हैं और इस पर्वत शृंखला में १६ चोटियां हैं जो ३५०० मीटर ऊंची हैं। इन बातों के दृष्टिगत पर्वतारोहण, प्रकृति में भ्रमण व सैर सपाटा और विश्राम करने के लिए यह बहुत ही उपयुक्त स्थल है। जब वसंतु ऋतु आ जाती है तो चहार महाल व बख्तियारी प्रांत की सुन्दर प्रकृति एवं गगनभेदी पर्वतों पर ऐसा रमणीय एवं मनोरम दृश्य उत्पन्न हो जाता है जो हर दर्शक को वशीभूत कर देता है। इस क्षेत्र की अछूती प्रकृति, गर्मी और ठंडी के दिनों में अधिकांश बख्तियारी बंजारों के रहने का स्थल है। मनुष्य यहां ऐसी भूमि पर क़दम रखता है जिसकी समस्त चीज़ें हज़ारों वर्षों से अपने प्राकृतिक स्वरूप में सुरक्षित हैं। इस प्रांत में जगह- जगह पर सुन्दर मैदानों में घंटी की भांति लटके हुए टयूलिप के पुष्प दिखाई देते हैं। इनमें से एक मैदान ज़र्दकूह के आंचल में स्थित है जिसके वातावरण की तरूणाई ने वहां के पुष्पों को विश्व स्तर की ख्याति प्रदान कर दी है। ज़र्दकूह का यह आंचल दर्शनीय एवं सैर सपाटे के लिए बहुत उपयुक्त स्थल है तथा ईरान के पंजीकृत २० राष्ट्रीय धरोहरों में से एक है और ईरान के पर्यावरण संगठन की ओर से उसकी सुरक्षा की जा रही है। “दश्ते लालेहा वाजगून” नामक मैदान का क्षेत्रफल लगभग ३६०० हेक्टेयर है और यह कोहेरंग उपनगर के “बनु इस्तकी” गांव के समीप स्थित है तथा यह ट्यूलिप के लाल- पीले पुष्पों की चादर से ढ़का है। इस मरुस्थल की स्वच्छ, सुन्दर एवं निर्मल हवा और मूल्यवान वनस्पतियों की हरियाली हर देखने वाले को सम्मोहित कर लेती है। ट्यूलिप के पौधे के उगने का समय, जो स्थानीय भाषा में “अश्के मरियम” के नाम से भी प्रसिद्ध है, प्रायः मार्च महीना होता है और टयूलिप के फूल फूलने का समय अप्रैल से मई तक होता है। यह सुन्दर पुष्प अधिक समय तक नहीं रह पाते। इसलिए प्रतिवर्ष बसंत के मौसम में ईरान के कोने- कोने से हज़ारों पर्यटक दश्ते लालेहाये वाजगून को देखने के लिए वहां जाते हैं। दीमेह नाम का सोता इसी नाम के गावं के समीप स्थित है और इस सोते ने क्षेत्र के प्राकृतिक आकर्षणों में वृद्धि कर दी है। विशेषज्ञों के अनुसार दीमेह सोते का पानी विश्व में विशुद्ध पेयजलों में से एक है और दांत की बीमारियों तथा गुर्दे के रोगों की रोकथाम में यह पानी उपचारिक विशेषता व गुण रखता है। वास्तव में “दीमेह” सोता कूहरंग सुरंग से पहले ज़ाइन्दे रूद नदी का स्रोत है। दीमेह सोता बग़ल के कई सोतों का एक समूह है जिससे विस्तृत मैदान के मध्य बहुत ही सुन्दर व लुभावना दृश्य उत्पन्न हो गया है। सोते के चारों ओर ऊंचे- ऊंचे बलूत के वृक्षों,पर्वतों और उसके पास उपजाऊ भूमियों व मैदानों ने क्षेत्र में पर्यटन के लिए बहुत ही आकर्षण उत्पन्न कर दिया है। दीमेह सोते के समीप पर्यटकों के विश्राम के लिए उपयुक्त स्थान भी हैं। दीमेह सोते के निकट खनिज पानी का एक कारखाना है जिसके पानी को ईरान में प्रयोग किया जाता है और उसे विदेशों में निर्यात भी किया जाता है। अलबत्ता खनिज पानी के कई कारखाने निर्माणाधीन भी हैं और तय यह है कि खनिज पानी के सबसे बड़े कारखाने का निर्माण इस क्षेत्र में होगा। दीमे सोते को पुरातन महत्व भी प्राप्त है। सोते के आस- पास ईंट और मिट्टी के बर्तन जैसी सांस्कृतिक चीज़ों के मिलने से इस बात की पुष्टि होती है। चहार महाल व बख्तियारी प्रांत के सांस्कृतिक धरोहर संस्था के प्रमुख के कथनानुसार दीमेह सोता अश्कानी काल से संबंधित एक एतिहासिक इमारत के अवशेष के निकट स्थित है।