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    चहारमहाल व बख़तियारी-1

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    चहारमहाल व बख़्तियारी प्रांत में प्रचुर जल, उपजाऊ भूमि, उचित एवं मनोहर जलवायु, प्राकृतिक हिमखण्ड, झरनों, विभिन्न झीलों और सुन्दर सरोवरों की उपस्थिति तथा बलूत के घने जंगलों जैसी सुन्दर प्रकृति के कारण पर्यटकों को आकर्षित करने की बहुत क्षमता पाई जाती है। जब ईरान के पर्यटन स्थलों का उल्लेख किया जाता है तो सामान्यतः इस देश के उत्तर में स्थित इस्फ़हान, शीराज़, मशहद, यज़्द और किरमान आदि जैसे ही कुछ नगरों का नाम लिया जाता है। यह ऐसी स्थिति में है कि जब इस्फ़हान नगर से लगभग १०० किलोमीटर की दूरी पर ईरान के पर्यटन का एक अन्य ध्रुव स्थित है। चहारमहाल व बख़्तियारी प्रांत को देखने वाले कुछ पर्यटकों का मानना है कि यह प्रांत, पश्चिमी ईरान के ज़ागरूस प्रांत में एक नगीने की भांति है जो वास्तव में ईरान का नगीना है और यह ईरान की छत के नाम से प्रसिद्ध है। चहारमहाल व बख़्तियारी प्रांत का क्षेत्रफल लगभग सोलह हज़ार वर्ग किलोमीटर है। इसका उत्तरी और पूर्वी क्षेत्र इस्फ़हान प्रांत से मिलता है। यह पश्चिम तथा दक्षिण में ख़ूज़िस्तान एवं कोहकीलोये व बुयेर अहमद नामक प्रांतों से और पश्चिमोत्तर में लोरिस्तान प्रांत से मिलता है। चहारमहाल व बख़्तियारी प्रांत की जनसंख्या लगभग साढ़े आठ लाख है। इस प्रांत में सात नगर हैं तथा इसका केन्द्रीय नगर शहरे कुर्द है। यह ईरान में सर्वाधिक ऊंचाई पर बसा नगर है जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई २०२६ मीटर है।चहारमहाल व बख़्तियारी प्रांत एक पर्वतीय क्षेत्र है जिसमें अधिकतर पर्वत और ऊंचे-ऊंचे हरेभरे टीले पाए जाते हैं। इस क्षेत्र का सबसे ऊंचा बिंदु ज़र्दकूह पर्वत की चोटी है जिसकी ऊंचाई ४,५४८ मीटर है। यह चोटी सदैव ही बर्ष से ढंकी रहती है। इस प्रांत में बर्फ़ की अधिकता ही झरनों और बहुत सी स्थाई नदियों के बनने का कारण बनी है। यहां पर पाए जाने वाले बहुत अधिक जल ने विभिन्न नदियों को अस्तित्व प्रदान किया है जिनमें ज़ायंदेरूद तथा कारून जैसी बड़ी नदियों का उल्लेख किया जा सकता है। इन नदियों विशेषकर कारून नदी के माध्यम से प्रतिवर्ष ११ अरब घन मीटर पानी चहारमहाल बख़्तियारी प्रांत से इस्फ़हान तथा ख़ूज़िस्तान प्रांतों में जाता है।अपने इर्दगिर्द की विविधतापूर्ण जलवायु और इसी प्रकार यहां के समतल न होने तथा कहीं-कहीं पर बहुत ऊंचे-ऊंचे क्षेत्रों के पाए जाने के कारण चहारमहाल व बख़्तियारी प्रांत की जलवायु बहुत ही मनोरम है। इस प्रांत के एक भाग की जलवायु ठंडी है और इसी कारण इस क्षेत्र में जाड़ों के दौरान बहुत अधिक ठंड पड़ती है जबकि इसी प्रांत के दूसरे क्षेत्र की जलवायु तुलनात्मक कम ठंडी और सुहावनी है। विविध प्रकार की जलवायु तथा साल के विभिन्न मौसमों के दौरान तापमान में परिवर्तन जैसी बातों ने इस प्रांत को हराभरा, सुन्दर और आकर्षक बना दिया है और इसी कारण यहां पर मनोरम प्राकृतिक दृश्य उत्पन्न हो गए हैं। गर्मियों के मौसम में जब ईरान के कुछ दक्षिणी क्षेत्रों में मौसम बहुत गर्म और आर्दतापूर्ण होता है तो ऐसे में चहारमहाल व बख़्तियारी प्रांत की जलवायु और यहां के पर्यटन आकर्षण, प्रकृति से लगाव रखने वालों को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। इस प्रांत में भारी हिमपात ने स्की जैसे शीतकालीन खेलों के लिए उचित वातावरण उत्पन्न कर दिया है। यहां पर पड़ने वाली बर्फ इतनी अधिक होती है कि बसंत ऋतु ही नहीं बल्कि ग्रीष्मकाल के एक भाग में भी यहां पर शीतकालीन खेलों के लिए परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं। यहां पर वर्षा सामान्यतः भूमध्य सागरीय मानसूनों से होती है जो लगभग आठ महीनों तक इस क्षेत्र को प्रभावित रखते हैं। यह प्राकृतिक उपहार वर्षा के रूप में पतझड़ के आरंभ से शुरू होता है जिसका अधिकांश भाग बर्फ़ के रूप में जाड़ों में दिखाई देता है। उल्लेखनीय है कि ज़र्दकूह पर्वत की ऊंचाइयों पर बर्फ़बारी कुछ मीटर तक होती है और ३५०० मीटर से अधिक की ऊंचाई सामान्यतः बर्फ़ से ढंकी रहती है। इसी विषय ने स्की जैसे खेलों के लिए यहां पर भूमि प्रशस्त कर दी है। स्की का संबन्ध पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों विशेषक क़बाएली लोगों के जीवन से बहुत ही गहरा है। चहारमहाल व बख़्तियारी प्रांत मे पाए जाने वाले बहुत अधिक पानी के दृष्टिगत यह स्थान चारे की पैदावार के लिए बहुत उपयुक्त है। यही कारण है कि यहां के बहुत बड़े क्षेत्र में हरी-भरी चरागाहें पाई जाती हैं। यहां के वनों में बलूत, बादाम तथा अन्य प्रकार के पेड़ों के साथ ही कई प्रकार के जंगली वृक्ष भी पाए जाते हैं। इस प्रांत में नाना प्रकार की वनस्पतियां उगती हैं जिन्हें स्थानीय लोग तथा बाहर से आने वाले विभिन्न प्रकार के उपचारों के लिए प्रयोग करते हैं। पहाड़ी वातावरण, हरीभरी चरागाहों, घने जंगलों, विभिन्न झीलों और झरनों की उपस्थिति ने चहारमहाल व बख़्तियारी प्रांत को भांति-भांति के पशु-पक्षियों के जीवन व्यतीत करने के लिए बहुत ही उपयुक्त एवं उचित स्थल बना दिया है। इस प्रांत के शिकार स्थलों में विभिन्न प्रकार के पशु एवं पक्षी पाए जाते हैं जिनमें मेढ़े, पहाड़ी बकरे, चीते, भूरे रंग के भालू, जंगली सुअर और बहुत से पक्षियों का नाम लिया जा सकता है। इस ऐतिहासिक क्षेत्र में प्राचीनकाल की बहुत सी यादगारें बाक़ी रह गई हैं। इस क्षेत्र में पाए जाने वाले प्राचीन अवशेष, इस बात के सूचक हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन सभ्यता के जन्मस्थलों में रहा है जिसकी प्राचीनता ४००० वर्ष ईसापूर्व की ओर जाती है। ईलामियों और अशकानियों के काल में यह क्षेत्र सत्ता संचालन के महत्वपूर्ण केन्द्रों में माना जाता था। चहारमहाल व बख़्तियारी प्रांत में पाए जाने वाले शिलालेख विगत में इस प्रांत के व्यापारिक एवं रणनीतिक महत्व की ओर संकेत करते हैं किंतु नवी शताब्दी हिजरी से यह अलग-थलग पड़ता गया।चहार महाल व बख़्तियारी प्रांत, ईरान के दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों अर्थात इस्फ़हान एवं ख़ूज़िस्तान जैसे औद्योगिक ध्रुवों के बीच में स्थित है। इस्फ़हान ऐतिहासिक और समृद्ध नगर है जिसे वर्तमान समय में ईरान का औद्योगिक और पर्यटन केन्द्र माना जाता है दूसरी ओर ख़ूज़िस्तान प्रांत भी काले सोने की खदान अर्थात तेल का केन्द्र है।प्राचीन काल से ही चहारमहाल व बख़तियारी प्रांत के लोगो का सपर्क, अपनी जीवन शैली और अपनी “कूचनशीनी” अर्थात बंजारों की अर्थव्यवस्था के कारण इन दोनो क्षेत्रों से रहा है। प्राचीनकाल से ही ख़ूज़िस्तान प्रांत का एक भाग बख़्तियारियों का शीताकालीन पड़ाव क्षेत्र रहा है और जब ख़ूज़िस्तान प्रांत में तेल की खोज की गई और वहां पर तेल का पता चला तो उसी समय से तेल उद्योग के लिए यहीं के लोगों ने श्रमबल के रूप में कार्य किया है। जैसाकि नाम से पता चलता है कि चहारमहाल व बख़्तियारी दो भागों में बंटा हुआ है। चहारमहाल जहां पर शहरी और ग्रामीण दोनों प्रकार की आबादी पाई जाती है लार, केयार, मीज़दिज तथा गंदुमान जैसे क्षेत्रों पर आधारित है। बख़्तियारी पर्वतीय क्षेत्र है जो पलायन करने वाली जाति बख़्तियारी का निवास स्थल है। पिछली एक शताब्दी के दौरान यहां पर होने वाले परिवर्तनों, सामाजिक बदलाव तथा राजनैतिक परिवर्तनों आदि की समीक्षा चहारमहाल व बख़्तियारी क़बीले के परिप्रेक्ष्ध में ही की जानी चाहिए। बख़्तियारी क़बीले का संबन्ध लोर जाति के एक भाग से है जिसे लोरे बोज़ोर्ग के नाम से जाना जाता है। “लोर” शब्द का अर्थ होता है ऊंचाई पर स्थित वृक्षों से भरी धरती। आज भी बख़्तियारी और लोरिस्तान प्रांतों में टीलों तथा पेड़ों से छिपे क्षेत्रों को लोर ही कहा जाता है। बख्तियारी बंजारों की संस्कृति पशुपालन पर आधारित है जो साधारण होते हुए भी जटिल है। यही कारण है कि उनकी कुछ विशेषताएं, वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल नहीं हैं। हालांकि क्षेत्र के सांस्कृतिक विकास में बंजारों की कुछ परंपराओं की प्रभावी भूमिका है।