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    चहारमहाल व बख़तियारी-2

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    चार महाल व बख़तियारी प्रांत में बख़तियारी क़बीला अपनी विशेष जीवन शैली व रीति रिवाजों के कारण इस क्षेत्र के अद्वितीय आकर्षणों में गिना जाता है और इस क़बीले की जीवन शैली देशी व विदेशी पर्यटकों के लिए सदैव रूचि का विषय रही है। बख़तियारी क़बीला लुर जाति की एक शाखा है और पलायन करने वाले बंजारा क़बीलों में सबसे बड़े क़बीलों में इसकी गणना होती है। इस क़बीले की दो मुख्य शाखा हफ़्त लंग और चहार लंग हैं और यह इतना बड़ा क़बीला है कि चहार महाल व बख़तियारी, इस्फ़हान, लुरिस्तान, और ख़ुज़िस्तान प्रांतों के एक एक भाग में फैला हुआ है। चहार महाल व बख़तियारी प्रांत में बंजारों की आबादी दो लाख से अधिक है और ये लोग प्रांत के ठंडे क्षेत्र में अपने पूर्वजों की भांति विशेष पारंपरिक जीवन शैली में रहते हैं। चहार महाल व बख़तियारी प्रांत के बंजारों के पलायन की शैली दो प्रकार की है। एक वर्ग ऐसा है जो पलायन के समय प्रांत के भीतर ही पलायन करता है जबकि दूसरा वर्ग पलायन के मौसम में पड़ोस के प्रांतों में पलायन करता है। बख़तियारी बंजारा जाति का जो वर्ग प्रांत के भीतर पलायन करता है वह अर्ध उष्णकटिबंधी व उसके आस पास के क्षेत्रों में निवास करता है और पलायन के मौसम में प्रांत के भीतर पहाड़ी क्षेत्र में रहता है जबकि बख़तियारी बंजारा जाति का प्रांत के बाहर पलायन करने वाला वर्ग पतझड़ ऋतु में ठंडे मैदानों व ऊंचे क्षेत्रों से पड़ोस के प्रांतों के गर्म व निचले भूभाग की ओर पलायन करते हैं। बख़तियारी बंजारे पलायन के समय बहुत कम मात्रा में आवश्यक वस्तुओं को अपने साथ रखते हैं ज़ाग्रोस पर्वत श्रंख्ला के संकीर्ण दर्रों से गुज़रते हुए ख़ूज़िस्तान के समतल मैदानों में अपने तंबु लगाते हैं। बख़तियारी बंजारे सैकड़ों वर्ष पुराने संकीर्ण मार्ग को पार करने के लिए घोड़े, गधे और ख़च्चरों को प्रयोग करते हैं। बंजारे अपनी आजीविका पशुपालन, खेती, और हस्तकला उद्योगों जैसे आंतरिक उत्पादों और पारंपरिक आर्थिक शैली द्वारा प्राप्त करते हैं। बंजारा जीवन में पशु की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि क़बायली व्यवस्था में जीवन को जारी रखना पशुओं की संख्या व प्रकार पर निर्भर होता है और पशु बंजारा परिवार की स्थिति का मुख्य स्रोत व संपत्ति होने के साथ साथ परिवार की सामाजिक स्थिति को दर्शाते हैं। यूं तो बंजारा जीवन दिखने में सादा लगता है किन्तु बहुत कठिनाइयों से भरा हुआ है। बंजारा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए प्रकृति के साथ सदैव संघर्षरत रहते हैं। बंजारा समाज में सीमित संभावनाओं के कारण इस संघर्ष का भविष्य अज्ञात तथा भय व आशा के साथ है। ऐसे वातावरण में जीवन बिताने के लिए लोगों के बीच आपसी सहयोग एक आवश्यक तत्व है। बख़तियारी क़बीले के बीच यह सहयोग व समरस्ता अनेक रूप में सामने आता है और इसकी जड़ उनके इतिहास में निहित है। क़बायली जीवन में मुख्य सहयोग की पृष्ठभूमि उत्पादक गतिविधियां विशेष रूप से पशुपालन है। बख़तारी क़बीले के बीच सहयोग अनेक रूप में दिखाई देता है। जैसे जिस समय पशु कम दूध देते हैं और उसकी मात्रा घी या पनीर के लिए पर्याप्त नहीं होती उस समय जिन परिवारों के पास कम पशु होते हैं वे अपने अपने पशुओं के दूध किसी एक परिवार को देने पर सहमत हो जाते हैं ताकि उसकी आवश्यकता पूरी हो जाए। बख़तियारी क़बीला इसी प्रकार ऊन उतारने में एक दूसरे की सहायता करते हैं। जिस समय बंजारे ठंडे क्षेत्र की ओर पलायन करते हैं वही भेड़ से ऊन उतारने का उचित समय होता है। उस समय बख़तियारी ऊन उतारने में एक दूसरे का साथ देते हैं।इसी प्रकार बख़तियारी बंजारे कृषि में बुआई और फ़सल काटने के समय भी एक दूसरे के साथ सहयोग करते हैं। बख़तियारी बंजारे लुरी बोली में बात करते हैं। लुरी बोली ईरानी भाषाओं की एक शाखा है और दरी फ़ारसी से बहुत मिलती है किन्तु साथ ही उससे भिन्न भी है। बख़तियारी लोग बड़े वीर होते हैं और पलायन के समय उन्हें अधिकांश समय जंगलों व पर्वतों में बिताना पड़ता है जिसके कारण वे जंगली पशुओं के आक्रमण का निशाना बनते हैं या प्राकृतिक तत्वों से प्रभावित होते हैं। मार्ग में एक पशु सबसे आगे आगे चलता है और उसके पीछे बाक़ी पशु और उन पशुओं के पीछे क़बायली लोग अपने सामान के साथ साथ चलते हैं। बख़तियारी क़बीला विवाह व परिवार के गठन को बहुत महत्व देता है। क़बायली जीवन की आवश्यकताओं में से एक पारिवारिक संबंधों में सुदृढ़ता भी है जो मुख्यतः वैवाहिक जीवन की छत्रछाया में प्राप्त होती है। इसलिए विवाह एक आम रीति है जो हर जगह मौजूद है। परिवार के सभी सदस्य मां बात को महत्व देते हैं किन्तु पिता को विशेष महत्व देते हैं। पिता की अनुपस्थिति में मां परिवार के संचालन का दायित्व निभाती है। बख़तियारी क़बीले में तलाक़ को बहुत बुरा समझते हैं इसलिए इस क़बीले में तलाक़ की दर न के बराबर है। शायद यही कारण है कि बख़तियारी क़बीला विवाह को विशेष महत्व देता है और विवाह समारोह को क़बीले के सभी व्यक्तियों की उपस्थिति में बहुत ही हर्षोल्लास के साथ आयोजित करता है। बख़तियारी क़बीले में विवाह समारोह को स्थानीय वादकों की उपस्थिति, लकड़ी से खेले जाने वाला विशेष खेल चूब बाज़ी और घुड़ सवारी विशेष वैभव प्रदान करते हैं।बख़तियारी क़बीले में परिवार के सदस्यों के बीच लिंग व आयु के दृष्टिगत काम बांटे जाते हैं। कुछ काम केवल महिलाओं से तो कुछ केवल पुरुषों के लिए विशेष होते हैं। बच्चों की देखभाल, पानी और ईंधन लाना, खाना पकाना, भेड़-बकरियों की देखभाल, गाय भैंस का दूध दुहना, दुग्ध उत्पाद बनाना और गलीम और छोटे क़ालीन जैसे हाथ से बिने जाने वाली वस्तुएं बनाना महिलाओं का काम है। पशुओं को चराने के लिए ले जाना, हल चलाना व खेती के दूसरे काम, उत्पाद बेचने या सामग्री मुहैया करने के लिए दूसरे नगर की यात्रा, स्थानीय विक्रेताओं के साथ लेन देन के मामले या दूसरे मामलों में निर्णय लेना पुरुषों से विशेष काम है। अलबत्ता पुरुषों को पलायन के समय सबसे महत्वपूर्ण व कठिन कार्य करना पड़ता है। क्योंकि उन्हें संकीर्ण पहाड़ी मार्गों सा उफनती नदियों से गुज़रने के लिए बड़ी महारत से परिवार के सदस्यों व पशुओं को मार्गदर्शन करना होता है ताकि वे सुरक्षित गंतव्य तक पहुंच जाएं। बख़तियारी क़बीला आतिथ्य सत्कार के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है और उनका मानना है कि अतिथि ईश्वर की ओर से भेजा जाता है और उससे घर में विभूति आती है। वे परदेसी मेहमान को बहुत महत्व देते हुए उनकी बहुत सेवा करते हैं। बख़तियारी क्षेत्र का शायद ही कोई मैदानी व पहाड़ी क्षेत्र बचा हो जहां इस क्षेत्र के वीर व साहसी लोगों के क़दम न पड़े हों और ऐसा हज़ारों वर्षों से हो रहा है। पूरे विश्वास से यह बात कही जा सकती है कि सभी बख़तियारी घुड़ सवारी जानते हैं और हर व्यक्ति तेज़ दौड़ने वाले घोड़े का स्वामी बनना चाहता है। विवाह समारोह और दूसरे उत्सवों में बख़तियारी क़बीले के लोग अपनी घोड़ सवारी की कला पेश करते हैं।अब जबकि आप बख़तियारी बंजारों के जीवन के बारे में संक्षेप में परिचित हो चुके हैं बेहतर होगा आपको यह भी बताते चलें कि पलायन के समय बख़तियारी बंजारे मुख्य रूप से काले तंबु में निवास करते हैं किन्तु जिनके पास घर हैं वे गांवों में घरों में रहते हैं। काले तंबू को बंजारा महिलाएं बकरी के बाल से बुनती हैं। बकरी के बाल तंबु के भीतर वर्षा के पानी को आने से रोकते हैं। तंबु प्रायः एक पुरुष व महिला के आपसी सहयोग से थोड़े ही समय में लग जाता है। तंबुओं में बंजारा जीवन के लिए आवश्यक सभी वस्तुएं व सामग्री मौजूद होती हैं।