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    चहारमहाल व बख़तियारी-4

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    चहार महाल व बख़्तियारी प्रांत में चुग़ाख़ोर, गंदमान, अलियाबाद और सोलक़ान नामक चार तालाब ने पर्यावरण और एकोटूरिज़्म की दृष्टि से इस क्षेत्र को विशेष स्थिति उपहार में दी है। ये चार तालाब जंजीर की भांति ब्रूजन नगर के दक्षिणी छोर से क्षेत्र के पश्चिम में केलार पहाड़ की लंबाई तक फैला हुए हैं और बहुत से पलायनकर्ता पक्षियों व दुर्लभ मछलियों के शरण स्थल हैं। इसी प्रकार इन मूल्यवान व बड़े तालाबों ने चहार महाल व बख़तियारी प्रांत को योरोपीय देशों, रूस और ईरान के पूर्वोत्तरी प्रांतों के पानी में रहने वाले पक्षियों के लिए फ़ार्स खाड़ी के देशों की ओर पलायन का एक मार्ग बना दिया है।अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध चुग़ाख़ोर तालाब 2300 हेक्टर से अधिक भूभाग पर फैला हुआ इस क्षेत्र के सबसे सुंदर व बड़े तालाबों में है। यह तालाब कुर्द नगर से साठ किलोमीटर की दूरी पर ब्रूजन नगर में कुर्द-ख़ूज़िस्तान को जोड़ने वाले संपर्क मार्ग पर स्थित है। चुग़ाख़ोर तालाब पर्यावरण की विविधतापूर्ण स्थिति व दुर्लभ पशुओं से संपन्न होने के कारण वर्ष 1999 से पर्यावरण संरक्षण संस्था की ओर से शिकार के लिए निषिद्ध क्षेत्र घोषित किया गया है और उस सयम से यह संरक्षित क्षेत्र है। सुंदर केलार पर्वत श्रृंखला दक्षिण पश्चिम में तालाब के निकट है जिसकी चोटी समुद्र तल से 3820 मीटर ऊंची है। इस तालाब के एक भाग पर लगभग 700 हेक्टर पर व्यापक घास का मैदान है। इस क्षेत्र की जलवायु आर्द्र और ग्रीष्म ऋतु में संतुलित व शीत ऋतु में ठंडी है इसलिए चार महाल व बख़तियारी प्रांत के ठंडे क्षेत्र में इसकी गणना होती है। चुग़ाख़ोर तालाब में 58 प्रकार की वनस्पतियां व जलचर पशु पाए जाते हैं जो पर्यावरण की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। ग्रीष्म ऋतु में इस तालाब का एक छोर पर्यटकों के लिए एक पर्यटन गांव बन जाता है। विशेष रूप से ब्रूजन से 35 किलोमीटर की दूरी पर पैग़म्बरे इस्लाम के वंश से महापुरुष हमज़ा अली का रौज़ा है जिसके दर्शन के लिए हर वर्ष हज़ारों लोग जाते हैं जिससे इस क्षेत्र का पर्यटन आकर्षण बढ़ गया है। चहार महाल व बख़तियारी प्रांत के प्राकृतिक आकर्षण केवल तालाब व सोतों तक सीमित नहीं हैं बल्कि इस प्रांत में बहने वाली नदियां भी पर्यटन आकर्षण के समान हैं जिससे इस उद्योग के विस्तार की संभावना इस प्रांत में पायी जाती है। चहार महाल व बख़तियारी प्रांत में जहां जहां भी ज़ायंदे रूद नदी बहती है वे क्षेत्र इस प्रांत के मुख्य पर्यटन आकर्षण समझे जाते हैं। ज़ायंदे रूद नदी का लगभग 40 किलोमीटर मार्ग एक दर्रे में पड़ता है जिसके दोनों ओर फलों के बाग़, चिनार, और विलो सहित नाना प्रकार के वृक्ष और कुछ क्षेत्रों में धान के खेत और हर भरे टीले हैं। यह क्षेत्र ग्रीष्म ऋतु में अपने संतुलित व सुहावने मौसम के कारण हर वर्ष हज़ारों की संख्या में स्थानीय व ग़ैर स्थानीय पर्यटकों का मेज़बान बनता है। ज़मानख़ान नामक प्राचीन पुल ने भी इस क्षेत्र के आकर्षण में चार चांद लगा दिए हैं। ऐतिहासिक ज़मानख़ान पुल 22 मीटर लंबा और 13 मीटर ऊंचा है जो सामान नगर के निकट ज़ायंदे रूद नदी पर बना है। सबसे पहले सासानी काल में इस स्थान पर पुल निर्माण का विचार सामने आया था किन्तु वर्तमान पुल ज़मानख़ान के आदेश पर एक चट्टान के ऊपर बना। ज़मानख़ान क़श्क़ाई क़बीलों में से एक क़बीले का सरदार था और उस समय यह क़बीला इस क्षेत्र तक पलायन करता था। इस पुल की अनेक बार मरम्मत की गयी है। चहार महाल व बख़तियारी प्रांत का एक अन्य प्राकृतिक आकर्षण प्राकृतिक गुफाए हैं जो प्रकृति के प्रेमियों के लिए क्षेत्र की ओर सम्मोहित करने वाले की छटा बिखेरती हैं। चार महाल व बख़तियारी प्रांत की गुफाओं का पता लगाने वाली समिति के आधार पर अब तक इस प्रांत में सत्तर गुफाओं का पता लग चुका है। पीरग़ार और सराब नामक गुफाएं इस प्रांत की सबसे स्वच्छ व महत्वपूर्ण गुफाएं हैं। पीरग़ार गुफा अपने ऐतिहासिक शिलालेख के लिए प्रसिद्ध है। एक अत्यंत स्वच्छ व आनंददायक पर्यटन स्थल के रूप में यह गुफा फ़ारसान नगर से 6 किलोमीटर और कुर्द के दक्षिण पश्चिम में 38 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस पर्यटन स्थल से मिले हुए एक पत्थर के टीले पर ख़ुसरोख़ान सरदार ज़फ़र बख़तियारी के आदेश पर नस्तालीक़ लीपि के तीन शिलालेख हैं। इन शिलालेखों पर बख़तियारी क़बीलों की इस्फ़हान व तेहरान पर चढ़ाई और बख़तियारी सरदारों की छोटे अत्याचारी काल से छुटकारा दिलाने तथा संविधान क्रान्ति में मोहम्मद अली शाह के पतन में भूमिका का उल्लेख किया गया है। पीरग़ार गुफा के निकट पत्थर के शिलालेखों के पास इतना बड़ा सोता है जिससे एक सेकेंड में 3 घन मीटर पानी उबलता है। यद्यपि अभी तक विशेषज्ञ गुफा की लंबाई और इसके अस्तित्व में आने के संबंध में बहुत अधिक तथ्य नहीं जुटा सके हैं किन्तु पर्यटन की दृष्टि से एक अति सुंदर स्थल होने के कारण छुट्टियों के दिनों में प्रकृति के प्रेमी इस सुंदर गुफा का दर्शन करने आते हैं। चार महाल व बख़तियारी प्रांत में अपेक्षाकृत वर्षा अधिक होती है जिसके परिणाम में यहां के वातावरण में अधिक आर्द्रता पायी जाती है और यही पुरातन अवशेषों के अधिक ख़राब होने का कारण है। इसके साथ ही इस क्षेत्र में कला व वास्तुकला के बहुत से अवशेष मौजूद हैं जो बड़ी सरलता से पर्यटकों के ध्यान को अपनी ओर खींच लेते हैं। अब तक इस प्रांत में 460 ऐतिहासिक अवशेषों व इमारतों का पता लग चुका हैं जिनमें से 17 ईरान के राष्ट्रीय पुरातन विभाग में पंजीकृत हो चुके हैं। इन अवशेषों व इमारतों में धार्मिक स्थल, ऐतिहासिक पुल, उकेर कर बनाए गए शिलालेख, पुरानी इमारतें, प्राचीन दुर्ग, और अन्य अवशेष इस प्रांत में लंबे समय से जीवन बिता रहे लोगों की गाथा सुनाते हैं। पुरातनविदों की ओर से की गयी खुदाई से चहार महाल व बख़तियारी प्रांत के कुछ क्षेत्रों में ईसापूर्व सभ्यता के अस्तित्व का पता चला है। इन अवशेषों में कुर्द नगर के पांच किलोमीटर दक्षिण में गुरकानी तप्पे नामक टीला भी है जो इस क्षेत्र में छह सहस्त्राब्दी ईसापूर्व मानव जीवन का पता देता है। कुर्द नगर के उपनगरीय क्षेत्र में चार सहस्त्राब्दी ईसापूर्व चित्रकारी का शिलालेख इस प्रांत के प्राचीन इतिहास का एक भाग को स्पष्ट करता है। इस शिलालेख के निकट जो जहान बीन नामक पहाड़ की एक चिकनी चट्टान पर उकेरा गया है, पत्थर की ईंटों द्वारा चुने गए मार्ग के अवशेष हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह इस क्षेत्र में ईरान के दक्षिण पश्चिम में स्थित शूश व दश्ते ख़ूज़िस्तान की संस्कृति व सभ्यता को स्थानांतरित करने का संभवतः पहले संपर्क मार्ग का अवशेष है। इसके अतिरिक्त बाज़ुफ़्त क्षेत्र में ईलामी काल की मनुष्य की मूर्तियों सहित इस्लाम पूर्व के ऐतिहासिक अवशेष और खुदाई के दौरान मिलने वाले सामानी काल के अनेक सिक्के इस क्षेत्र में प्राचीन सभ्यता का एक दूसरा साक्ष्य है। चार महाल व बख़तियारी प्रांत के कुछ क्षेत्रों में पांचवी हिजरी के इस्लामी सिक्के मिलने के पश्चात सांस्कृतिक धरोहर के विशेषज्ञों का मानना है कि उस समय चहार महाल व बख़तियारी प्रांत में सिक्के ढाले जाते थे। यह बिन्दु भी महत्वपूर्ण है कि इस क्षेत्र की ऐतिहासिक इमारतें प्रायः इस्लामी काल और विशेष रूप से क़ाजारी काल की हैं। इनमें से कुछ इमारतें धार्मिक महत्व की हैं जैसे मस्जिदें और पैग़म्बरे इस्लाम के वंश से महापुरुषों के रौज़े हैं। इन इमारतों में सबसे प्राचीन इमारत कुर्द नगर की अताबकान मस्जिद है जो सातवीं हिजरी क़मरी की है और इसका अताबकों के काल में निर्माण किया गया है। इस क्षेत्र के अन्य ऐतिहासिक अवशेषों में दुर्ग, कुलीन वर्ग के घर, स्नानगृह और पुल हैं। इस प्रांत में बहुत से ऐतिहासिक दुर्ग हैं जिनमें से 14 दुर्ग अभी भी मौजूद हैं और इन्हीं दुर्गों में अमीर मोफ़ख़्ख़म बख़तियारी नामक दुर्ग है जो कुर्द नगर के 35 किलोमीटर दक्षिण में देज़क गांव में स्थित है। यह दुर्ग वास्तुकला, डीज़ाइन और सजावट की दृष्टि से इस प्रांत में मौजूद दुर्गों में बहुत आकर्षक है। देज़क गांव में स्थित अमीर मुफ़ख़्ख़म बख़तियारी दुर्ग दो मंज़िला है और इसके उत्तरी व दक्षिणी भाग में खंबो वाले बरामदे वास्तुकला, कला व इतिहास की दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं। यह दुर्ग बहुत सी घटनाओं का साक्षी रहा है जिनमें सबसे महत्वपूर्ण संविधान क्रांति के दौरान इसकी भूमिका रही है। यह दुर्ग सौ वर्ष पुराना है। चहार महाल व बख़तियारी प्रांत के उद्योग व हस्तकलाओं के बारे में भी आपको संक्षेप में बताने जा रहे हैं। इस प्रांत के सबसे महत्वपूर्ण हस्तकला उद्योगों में क़ालीन, नमदा, और दरी की बुनाई है जिनमें क़ालीन की बुनाई को विशेष महत्व प्राप्त है। इस क्षेत्र की बुनी क़ालीनें बख़तियारी क़ालीन के नाम से प्रसिद्ध हैं। रंग, डीज़ाइन व संरचना की दृष्टि से मौलिकता बख़तियारी क़ालीन की मुख्य विशेषताएं हैं। इस प्रांत के कुछ क्षेत्रों में ऐसे क़ालीन बुने जाते हैं जिनमें केवल ऊन व प्राकृतिक रंग का प्रयोग किया जाता है। अलबत्ता चालेशुतुर क्षेत्र के बुने क़ालीन बहुत प्रसिद्ध हैं और इसका कारण सूक्ष्म बुनाई, और असली रंग व डीज़ाइन हैं।