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    चाय के बगानों की नगरी लाहीजान

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    लाहीजान, गीलान ही नहीं अपितु पूरे ईरान के सुंदरतम नगरों में से एक है। भौगोलिक दृष्टि से यह नगर पर्वतांचल में स्थित है जिसमें मिट्टी के टीले और चाय के बगान भरे पड़े हैं। इस नगर के घरों की वास्तुकला ने भी नगर को एक विशेष सौंदर्य प्रदान कर दिया है। यहां के घर बंगलों की भांति बने हुए जिनकी छतें खपरैल की और सफ़ेद रंग से रंगी हुई हैं। दूसरे शब्दों में लाहीजान में प्रकृति और नगर निर्माण के सौंदर्य एक दूसरे के पूरक हैं। जर्मन अध्ययनकर्ता श्पीगल ने अपनी पुस्तक कैस्पियन सागर के तटों पर रूसियों के आक्रमण में लाहीजान का अर्थ रेशम का नगर बताया है।

    लाहीजान का क्षेत्रफल लगभग चौदह सौ किलो मीटर है और यह अत्यंत सुंदर एवं उपजाऊ नगर है। नागरिक प्राचीनता की दृष्टि से इसका इतिहास काफ़ी पुराना है और यह गौरवपूर्ण इतिहास का स्वामी है। रश्त से पहले यही नगर गीलान प्रांत की राजधानी था। यहां तक कि सफ़वी शासनकाल में रश्त को बहुत अधिक महत्व प्राप्त होने के बावजूद लाहीजान अपने ऐतिहास गौरव एवं भौगोलिक स्थिति के कारण गीलान की राजधानी बना रहा।

    अलबत्ता लाहीजान भी गीलान प्रांत के अन्य नगरों की भांति प्राकृतिक आपदाओं, आक्रमणकारियों की लूटमार और आग लगने जैसी घटनाओं से सुरक्षित नहीं रहा। वर्ष 1307 ईसवी में ईलख़ानी शासक ओलजातियो ने इस नगर पर क़ब्ज़ा कर लिया और वर्ष 1485 में एक भीषण भूकम्प ने इस नगर को तबाह कर दिया। इसी प्रकार सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में अनेक प्राकृतिक आपदाओं ने लाहीजान में भीषण तबाही मचाई किंतु हालिया शताब्दी में इस नगर का बहुत विकास हुआ और चूंकि यह ईरान में चाय के उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है इस लिए इस नगर में और इसके निकट चाय के बड़े बड़े कारख़ाने बनाए गए हैं। इस प्रकार लाहीजान को बहुत अधिक आर्थिक महत्व प्राप्त हुआ और यह एक कृषि-औद्योगिक नगर में परिवर्तित हो गया है।

    लाहीजान में आर्द्र और वर्षा युक्त जलवायु के बावजूद इस नगर में ध्यान योग्य ऐतिहासिक अवशेष पाए जाते हैं। चहार औलिया या चहार बादशाह मस्जिद और शैख़ ज़ाहिद गीलानी का मज़ार उनमें शामिल हैं। इसके अतिरिक्त चाय के बगान तथा अन्य प्राकृतिक स्थानों के सुंदर दृश्यों के साथ ही दर्शनीय ऐतिहासिक इमारतों, प्राचीन मस्जिदों व सुंदर घरों ने इस नगर को पर्यटकों के लिए अत्यंत रोचक व दर्शनीय बना दिया है। कार्यक्रम के इस भाग में हम लाहीजान के ऐतिहासिक अवशेषों के बारे में आपको विस्तार से बताएंगे।

    चहार बादशाह मस्जिद, लाहीजान की ऐतिहासिक इमारतों में से है जिसमें गीलान के कियाई शासकों में से चार लोगों की क़ब्रें हैं। इस इमारत को वर्ष 1938 में ईरान की राष्ट्रीय धरोहरों की सूचि में शामिल किया गया। यह इमारत वास्तुकला की दृष्टि से विशिष्ट है। इसके दो मुख्य द्वार हैं और मूल इमारत आंगन के दक्षिणी छोर पर स्थित है। इमारत के उत्तरी छोर पर छः खंभों वाला एक बड़ा हॉल है। इसके खंभों पर 80 सेंटी मीटर की ऊंचाई तक टाइलों का काम किया गया है जो क़ाजारी शासनकाल से संबंधित है। मज़ार पर आठवीं शताब्दी हिजरी क़मरी से संबंधित सुंदर शिलालेख भी देखे जा सकते हैं। मुख्य प्रवेश द्वार लकड़ी के बने हुए हैं और उन पर सुंदर काम किया गया है। इस मज़ार में क़ुरआने मजीद की दो प्राचीन प्रतियां भी रखी हुई हैं जिनमें से एक कूफ़ी लीपि में है तथा उसके आरंभ व अंत के कुछ पन्ने नहीं हैं जबकि दूसरी प्रति वर्ष 883 हिजरी क़मरी से संबंधित है। चहार बादशाह इमारत के पूर्वी छोर पर एक अलग कमरा बना हुआ है जिसमें संगे मरमर की बनी एक क़ब्र है और उस पर लकड़ी की जाली लगी हुई है। एक अन्य शासक का मज़ार चौकोर रूप में बना हुआ है और उसकी छत समतल एवं लकड़ी की है। मज़ार के बीच में लकड़ी की ज़रीह बनी हुई है। दो अन्य शासकों के मज़ार भी निकट ही स्थित हैं और एक आयताकार कमरे में दो क़ब्रें स्थित हैं जिनके ऊपर लकड़ी की जाली लगी हुई है। दोनों क़ब्रें आगे पीछे स्थित हैं और उन पर रखी हुई जाली पर मुनब्बत का सुंदर काम किया गया है तथा कूफ़ी लीपि में उसके चारों ओर लकड़ी के शिलालेख हैं। इस कमरे के दक्षिणी छोर पर भी मुनब्बत कारी की गई है तथा कई शिलालेख वहां भी देखे जा सकते हैं। मज़ार के किनारे स्थित कमरे को इस समय मस्जिद के रूप में प्रयोग किया जाता है।

    आठवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के शैख़ ज़ाहिद गीलानी का मज़ार भी लाहीजान की ऐतिहासिक इमारतों में से एक है जो नगर से तीन किलो मीटर दूर स्थित है। शैख़ ज़ाहिद गीलानी के नाम से प्रख्यात ताजुद्दीन इब्राहीम कुर्दी संजानी का जन्म वर्ष 1218 में और मृत्यु वर्ष 1301 ईसवी में हुई। वे ईरान के प्रख्यात सूफ़ियों में से एक थे। उनका पैतृक नगर ख़ुरासान प्रांत का संजान नगर था। शैख़ सफ़ीयुद्दीन अर्दबीली ने, जिन्होंने सफ़वी परिवार की आधार शिला रखी थी, पच्चीस वर्षों तक शैख़ ज़ाहिद गीलानी से शिक्षा प्राप्त की और उनका विवाह भी शैख़ की पुत्री से हुआ था।

    बहुत कम ही ऐसा कोई सैलानी होगा जो लाहीजान की यात्रा करे और शैतानकूह नामक प्रख्यात सुंदर झरना न देखे। शैतानकूह, लाहीजान के पूरब में स्थित एक पर्वत है। अतीत में इस क्षेत्र को शाहनिशीन कूह कहा जाता था। यहां 200 मीटर चौड़ा और 70 मीटर लंबा एक छोटा तालाब था जिसे लोग सिंचाई हेतु पानी एकत्रित करने के लिए प्रयोग करते थे। आज यह तालाब एक कृत्रिम झील में परिवर्तित हो गया है और इसके बीच एक छोटा से टापू बनाया गया है और टापू के बीच में एक सुंदर इमारत बनाई गई है। शैतानकूह से एक कृत्रिम झरना गिरता है और इसका पानी लाहीजान के हौज़ के नाम से प्रख्यात इसी झील से आता है। यह सुंदर झरना और इसके पास ही एक बड़े हौ की उपस्थिति ने बड़ा ही सुंदर एवं रमणीक दृश्य उत्पन्न कर दिया है जो प्रकृति से प्रेम करने वालों और सैलानियों को अपनी ओर खींचता है तथा इसने इस क्षेत्र को लाहीजान के सबसे सुंदर क्षेत्रों में से एक में परिवर्तित कर दिया है। इसी पर्वत से थोड़ी दूरी पर लाहीजान का चाय संग्रहालय और काशिफ़ुस्सलतनत का मज़ार स्थित है।

    चूंकि ईरान में चाय का नाम लाहीजान नगर से जुड़ा हुआ है इस लिए आवश्यक है कि आजके कार्यक्रम में हम आपको ईरानियों के बीच चाय के बारे में प्रचलित कुछ बातों से अवगत कराते चलें। इस बारे में सही सूचना नहीं है कि चाय कब व किस प्रकार ईरान में आई और कबसे यह ईरानियों के बीच प्रचलित हुई किंतु यह बात तो स्पष्ट है कि चाय के पौधे का पता पहली बार भारत और चीन में चला और यही देश चाय के सबसे प्राचीन व महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। इन दोनों देशों के साथ ईरान के प्राचीन व्यापारिक संबंधों को, चाय के ईरान में आगमन का सबसे महत्वपूर्ण कारण समझा जा सकता है। ऐतिहासिक दस्तावेज़ों से पता चलता है कि ईरान में सफ़वी शासन काल में चाय का प्रचलन हुआ जबकि इससे पूर्व ईरान में क़हवा प्रचलित था। यही कारण है कि आज भी ईरान में उन स्थानों को, जहां केवल चाय ही पिलाई जाती है, पहले ही की भांति क़हवा ख़ाना कहा जाता है।

    ईरान में चाय के बाग़ पहली बार नासिरुद्दीन शाह क़ाजार के शासन में मुहम्मद हुसैन इस्फ़हानी के हाथों लगाए गए किंतु वे अधिक प्रचलित न हो सके। यहां तक कि वर्ष 1901 में काशिफ़ुस्सलतनत के नाम से प्रख्यात मुहम्मद मीरज़ा चायकार के अथक प्रयासों से चाय के बगान का प्रचलन हुआ। काशिफ़ुस्सलतनत ने जिन्हें ईरान में ईरानी चाय के पितामह की उपाधि दी गयी है, ईरान में चाय की खेती में विस्तार के लिए बहुत अधिक प्रयास किए हैं और उनके प्रयासों के कारण ही लाहीजान में चाय के बहुत अधिक बाग़ लगाए गये। काशिफ़ुस्सलतनत की मृत्यु के बाद उनके प्रयासों की सराहना के लिए उनको ऐसे क़ब्रिस्तान में दफ़्न किया गया जिसमें चाय के बाग़ थे। आज काशिफ़ुस्सलतनत का मक़बरा सुन्दर व ऐतिहासिक नगर लाहीजान की याद दिला और उसको राष्ट्रीय धरोहर की सूची में पंजीकृत कर दियागया है।

    आपके लिए यह जानना उचित होगा कि लाहीजान के प्रसिद्ध उपहारों में वहां के कूलूचे हैं जिनका अतीत बहुत पुराना है। यहां आने वाले अधिकांश यात्री और पर्यटक कूलूचों को यहां के उपहार के रूप में अपने साथ अवश्य ले जाते हैं।