islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. चालाक लोमड़ी

    चालाक लोमड़ी

    Rate this post

    किसी समय एक गिद्ध और एक लोमड़ी में मित्रता हो गई। एक दिन लोमड़ी ने, जो लोगों को बहुत अधिक यातनाएं देती थी और बड़ी धूर्त थी, गिद्ध से कहा कि हे मेरे मित्र! तुम सदैव आसमान में उड़ते रहते हो और बादलों के अतिरिक्त किसी चीज़ को नहीं देखते। आओ मेरी पीठ पर बैठ जाओ ताकि मैं तुम्हें जंगल की सैर कराऊं। यह बसंत का मौसम है, पेड़ हरे-भरे हैं और फूल खिले हुए हैं। गिद्ध ने उसकी बात मान ली और लोमड़ी की पीठ पर बैठ गया। लोमड़ी बड़ी फुर्ती के साथ पेड़ों के बीच दौड़ने लगी। वह ऐसे स्थानों से गुज़र रही थी जहां पेड़ घने थे जिसके कारण गिद्ध के पर पेड़ों की शाखाओं से रगड़ खा कर उखड़ते जा रहे थे किंतु लोमड़ी दौड़ती ही जा रही थी। सबसे पहले गिद्ध के दोनों पंखों के बाल झड़ गए और फिर उसके सीने के पर भी गिर गए यहां तक कि उसके शरीर पर एक भी पर बाक़ी नहीं बचा। बिना परों के गिद्ध को देख कर लोमड़ी को हंसी आ गई और वह उसका मज़ाक़ उड़ाने लगी। अपने बिना पर वाले पंखों से गिद्ध न तो उड़ सकता था और न ही शिकार कर सकता था। लोमड़ी कभी कभी अपना बचा खुचा खाना उसे दे देती थी और कभी भी भूल जाती थी जिसके कारण गिद्ध को कई कई दिन तक भूखा रहना पड़ता था और वह चिड़ियों के घोंसलों में उनके बच्चों को ढूंढ कर खाने पर विवश हो जाता था। गिद्ध काफ़ी समय तक इसी स्थिति में रहा, यहां तककि उसके शरीर पर नए पर निकल आए और उसके दोनों पंख मज़बूत हो गए। वह पुनः उड़ान भरने लगा और पहले ही की भांति दक्षता से शिकार करने लगा। एक दिन उसने लोमड़ी से कहा। क्या तुमने कभी आकाश से धरती पर देखने के बारे में सोचा है? ऊपर से देखने पर यह धरती, नीचे की तुलना में काफ़ी सुंदर दिखाई देती है। यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हें ऊपर ले जा सकता हूं। लोमड़ी ने उसकी बात स्वीकार कर ली। गिद्ध ने लोमड़ी को अपने पंजों में पकड़ा और आकाश की ओर उड़ान भरने लगा। उसने पूछा कि यहां से धरती कैसी दिखाई देती है? लोमड़ी ने कहा कि बहुत बड़ी है। गिद्ध और ऊपर उड़ने लगा और थोड़ी देर बाद उसने पुनः पूछा। यहां से तुम्हें धरती कैसी दिखाई देती है? लोमड़ी ने कहा कि अब धरती मुझे एक नगर जितनी बड़ी दिखाई दे रही है। गिद्ध ने अधिक ऊपर की ओर उड़ान भरी और तीसरी बार पूछा। अब बताओ कि यहां से धरती कैसी दिखाई दे रही है? लोमड़ी ने कहा कि अब धरती एक तरबूज़ जितनी दिखाई दे रही है। गिद्ध ने कहा कि ठीक है, तो अब नीचे जाओ! उसने अपने पंजों को खोल दिया और लोमड़ी को छोड़ दिया ताकि वह उस ऊंचाई से नीचे गिर जाए। लोमड़ी नीचे गिरने लगी और तेज़ हवा के कारण उसके शरीर के बाल झड़ने लगे। गिद्ध ने कहाः यह मेरे बालों के बदले में। नीचे गिरते-गिरते लोमड़ी ने ईश्वर से प्रार्थना की कि प्रभुवर! मुझे एक नर्म वस्तु या चमड़े के वस्त्र पर गिरा दे। ईश्वर ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। एक किसान, नाश्ता करने के लिए बैठा हुआ था उसने अपनी पूस्तीन या खाल का बना वस्त्र किनारे रख छोड़ा था और नाश्ता सामने रखा था। उसने जैसे ही देखा कि ऊपर से कोई वस्तु उसके ऊपर गिर रही है तो वह अपना वह वस्त्र और नाश्ता छोड़ कर भाग खड़ा हुआ। लोमड़ी चमड़े के उस वस्त्र पर गिरी और मरने से बच गई साथ ही उसे एक स्वादिष्ट नाश्ता भी मिल गया। नाश्ता करके और वह पूस्तीन पहन कर लोमड़ी वहां से रवाना हो गई। रास्ते में उसे शेर मिला। शेर ने उससे पूछा कि यह पूस्तीन तुम्हें कहां से मिली? उसने कहा। क्या तुम्हें नहीं पता कि मैं पूस्तीन सीती हूं। शेर को बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने लोमड़ी से कहा कि उसके लिए भी अपनी ही भांति एक पूस्तीन सी दे। लोमड़ी ने कहा कि पांच हट्टे-कट्टे हिरन लेकर आओ और एक सप्ताह तक प्रतीक्षा करो। एक सप्ताह के बाद तुम्हारी पूस्तीन तैयार होगी। शेर पांच हिरन लेकर आया जिसे लोमड़ी और उसके बाल बच्चों ने खाया। एक सप्ताह के बाद शेर ने लोमड़ी को देखा और कहा कि पूस्तीन कहां है? लोमड़ी ने कहा कि भेड़ के दो बच्चे ले कर आओ, पूस्तीन की आस्तीन बनाने के लिए उनकी आवश्यकता है। शेर ने भेड़ के दो बच्चे उसे ला कर दिए जिन्हें लोमड़ी और उसके बाल बच्चे तुरंत चट कर गए। एक दिन लोमड़ी ने सहसा ही शेर को अपने सामने देखा। शेर ने दहाड़ कर कहा। पूस्तीन कहां है? मेरा धैर्य समाप्त हो चुका है, तुरंत मुझे पूस्तीन दो अन्यथा तुम्हें फाड़ खाऊंगा। लोमड़ी ने कहा, हे जंगल के राजा, पूस्तीन मेरे घर में है, चलो में तुम्हें देती हूं। दोनों लोमड़ी की मांद की ओर बढ़े। अचानक ही लोमड़ी भाख खड़ी हुई और अपनी मांद में कूद गई किंतु शेर ने पीछे से उसकी दुम पकड़ ली और उसे अपनी ओर खींचने लगा जिसके कारण दुम टूट गई और लोमड़ी बिना दुम के ही मांद में चली गई। शेर ने कहा तुम जहां भी चली जाओ मैं तुम्हें पकड़ लूंगा क्योंकि मैं तुम्हें तुम्हारी टूटी हुई दुम से पहचान जाऊंगा। अगले दिन वह लोमड़ी अपनी मांद से बाहर आई। उसने अपनी मित्र लोमड़ियों को देखा और उन्हें स्वादिष्ट अंगूरों के एक बाग़ में लेकर आई। सारी लोमड़ियां, अंगूर के पड़ों पर चढ़ गईं और जब वे अंगूर खाने में व्यस्त हो गईं तो उसने उनकी दुमों को पेड़ से बांध दिया और जा कर बाग़ के मालिक को बुला लाई। वह एक लाठी लेकर आया और उसे देखते ही लोमड़ियों ने भागने का प्रयास किया जिसके कारण उन सभी की दुमें टूट गईं। दोपहर का समय था कि अचानक ही शेर ने लोमड़ी को देखा और दहाड़ कर कहा। अंततः तुम मेरे चंगुल में आ ही गईं टूटी दुम वाली लोमड़ी! लोमड़ी ने मुस्कुराते हुए अन्य लोमड़ियों को आवाज़ दी। जब वे आ गईं तो शेर ने देखा कि उन सबकी दुम नहीं है। उसे आश्चर्य हुआ और यह भी समझ में आ गया कि उसके साथ धोखा हुआ है। धूर्त लोमड़ी ने शेर को धोखा दे कर कई दिनों तक अपने पूरे परिवार का भोजन उससे लिया और बिना किसी श्रम के सबको खाना खिलाया। शेर ने कहा। ईश्वर की सौगंध! तेरे जैसा धूर्त कोई भी नहीं हो सकता। तभी से शेर यह सीख गया कि उसे चतुर होना चाहिए और लोमड़ी जैसे धूर्त लोगों से धोखा नहीं खाना चाहिए।