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    चूहा और ऊंट

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    एक दिन की बात है एक जवान मोटा ताज़ा चूहा एक मैदानी क्षेत्र में घूम रहा था, इस चूहे में सबसे बड़ी कमी यह थी कि वह स्वयं को विश्व के सब चूहों से अधिक शक्तिशाली और चतुर समझता था। वह घमंड और आत्ममुग्धता में इस प्रकार ग्रस्त हो गया था कि उसे अपने आगे कोई दिखता ही नहीं था। चूहा सीटी बजाता व गुनगुनाता हुआ जा रहा था कि अचानक उसकी नज़र हरे भरे खेत में चर रहे ऊंट पर पड़ी। घमंडी चूहे ने स्वयं से कहा कि चलो इस ऊंट को चुरा लें। वह यह बात सोच सोच कर प्रसन्न हो रहा था। वह ऊंट के पास गया और उसने ऊंट की लगाम को पकड़ कर अपनी ओर खींचा। ऊंट भी खिंचा हुआ चूहे की ओर चला गया। ऊंट हरी भरी घास खाकर मस्त था और उसे इधर उधर की कोई परवाह नहीं थी, उसे तनिक भी परवाह नहीं थी कि चूहा उसके बारे में क्या सोच रहा है और उसे कहां ले जा रहा है। चूहा ऊंट को खींचे जा रहा था और ऊंट था कि खिंचा चला जा रहा था। चूहे के फ़रिश्तों को भी ख़बर नहीं थी कि ऊंट मज़ाक़ में उसकी ओर खिंचा चला आ रहा है। चूहा सोच रहा था कि उसकी भुजाओं में इतनी शक्ति है कि वह ऊंट को अपनी ओर खींच रहा है। वह घमंड में स्वयं से कह रहा था कि आज तक किसी ने मेरे जैसा चूहा देखा है जिसने इतने बड़े ऊंट को खींचा हो। मैं बहुत शक्तिशाली हूं। मैं विश्व का सबसे शक्तिशाली, सबसे चतुर और सबसे होशियार चूहा हूं।

     

     

    चूहा और ऊंट चलते चलते एक नदी के किनारे पहुंचे, चूहा इतनी बड़ी नदी और उसकी उठती हुई लहरों को देखकर हतप्रभ हो गया और सोचने कि अब कैसे इस नदी हो पार किया जाए। ऊंट चूहे के दिल में पक रही खिचड़ी को समझ गया और दिल में मुस्कुराते हुए कहने लगा कि क्यों परेशान हो? मर्द की भांति आगे बढ़ते रहो और किसी चीज़ से न डरो, तुम मेरे सरदार और मेरे नेता हो। चूहा, ऊंट की बातों से लज्जित हो रहा था उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या उत्तर दे। अंततः उसने अपने सिर को उठाया और कहा कि यह गहरी नदी है और इसकी लहरें भी ऊंची ऊंची हैं मुझे डर है कि कहीं डूब न जाऊं। ऊंट मुस्कुराया और कहने लगा कि क्या तुम इस छोटी से नहर से डर रहे हो, तुम इतने शक्तिशाली हो कि तुम एक ऊंट को खींच चुके हो, इस छोटी सी नहर में डूबने से डरते हो, अच्छा तो पहले मैं इस नदी में ऊतरता हूं और इसकी गहराई का पता लगाता हूं फिर तुम आना। ऊंट यह बात कहते ही नदी में ऊतर गया। जब ऊंट नदी में उतरा तो पानी उसके घुटनों तक था। उसने चूहे से कहा कि देखा प्यारे, देखो डर की क्या बात है? पानी तो केवल मेरे घुटने तक है? आओ नदी पार करो और किसी से न डरो।

    चूहे ने आश्चर्य से ऊंट को देखा और कहा कि कुछ पता है क्या बक रहे हो, पानी तुम्हारे घुटनों से ऊपर है, तुम जानते हो इसका क्या अर्थ है, ऊंट से आश्चर्य से पूछा, नहीं, नहीं जानता। क्या अर्थ है, चूहे ने लज्जित स्वर में कहा, चूहे के घुटने और ऊंट के घुटनों में अंतर होता है। ऊंट चूहे की बातों पर हंस पड़ा। चूहा समझ गया था कि नदी पार करना उसके बस की बात नहीं, अब उसने ऊंट के हाथ पांव जोड़ने आरंभ किए और गिड़गिड़ाकर ऊंट से नदी पार करने के लिए कहने लगा। चूहे की बात पर ऊंट का दिल पसीज गया और उसने उससे कहा कि मेरे कोहान पर बैठ जाओ। चूहा ऊंट के कोहान पर बैठ गया। रास्ते में वह चूहे को उपदेश भी देता जा रहा था। उसने उसे उपदेश दिया कि अकारण घमंडी न बनो और ऐसा काम करने की न ठानो जो तुम्हारे बस में न हो, चूहे ने लज्जित होकर अपना सिर झुका लिया।

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