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    जन्नतुल बक़ीअ कि तबाही -1

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    इन्सानियत के क़ाफले ने हर ज़माने में इस बात का नज़ारा किया है कि मज़लूम के सर को तन से अलग कर देने के बाद भी ज़ालिमों को चैन नहीं मिलता बल्कि उनकी सारी कोशिश यह होती है कि दुनिया से मज़लूम और मज़लूमियत का जि़क्र भी ख़त्म हो जाये, इस कोशिश में कभी वारिसों को ज़ुल्म का निशाना बनाया जाता है तो कभी मज़लूमियत का चर्चा करने वालों को सताया जाता है मगर अपने नापाक इरादों को पुरा करने के लिये आख़री कोश्शि के तौर पर मज़लूम की निशानी यानी क़ब्र की निशानी भी मिटा दिया जाता है, ताकि न अलामत बाक़ी रहेगी और न ही ज़माना ज़ुल्मो सितम को याद करेगा। यह सिलसिला हमेशा से जारी है, मगर जिस शानो शौकत से इस ज़ालिमाना रविश को इखि़्तयार किया गया है उसी शिद्दत से मज़लूमियत में निखार पैदा होता गया और फिर मज़ालिम के सिलसिले की यह आख़री कड़ी ही ज़ालिम के ताबूत की आख़री कील साबित हुई है जिसके बाद ज़ुल्म व ज़ालिम दोनों ही फ़ना हो गये, इसकी जीती जागती मिसाल कि़बला है जहाँ कई बार ज़ालिम बादशाहों ने सय्युदश्शोहदा हज़रत इमाम हुसैन के मज़ार को तबाह करना चाहा मगर आज भी इस अज़ीम बारगाह की अज़मत बाक़ी है जब कि इस स्याहकारी के जि़म्मेदार का नाम तक सफ़ह-ए हस्ती से पूरी तरह मिट चुका है।

     

     

    लेकिन अफ़सोस! बीती हुई सदी में 44 हिजरी 8 शव्वालुलमुकर्रम को आले सऊद ने बनी उमय्या व बनी अब्बास के क़दम से क़दम मिलाते हुए ख़ानदाने नबुव्वत व इसमत के लाल व गोहर की क़ब्रों को वीरान करके अपनी दुश्मनी का सबूत दिया जो सदियों से उसके सीनों में थी। आज आले मुहम्मद की क़ब्रें बे छत व दीवार हैं जबकि उनके सदके़ में मिलने वाली नेमतों से ये यहूदी नुमा सऊदी अपने महलों में मज़े उड़ा रहे हैं। इस चोरी के बाद सीना ज़ोरी का यह आलम है कि चंद ज़मीर व क़लम फ़रोश मुफ़ती अपने बे बुनियाद फ़त्वों की असास इन झूटी रिवायात को क़रार देते हैं जो बनी उमय्या और शाम के टकसाल में बनी,बिकी और ख़रीदी गई हैं ‘‘हसबोना किताबल्लाह’’ की दावेदार क़ौम आज क़ुरआन के खुले अहकाम को छोड़ कर अपनी काली करतूतों का जवाज़ नक़ली हदीसों के आग़ोश में तलाश कर रही है।

    सितम बालाये सितम ये कि उनके मुक़द्दस मज़ारों को तोड़ने के बाद अब इस ममलेकत से छपने वाली किताबों में, बक़ीअ में दफ़न उन बुज़ुर्गाने इस्लाम के नाम का भी जि़क्र नहीं होता, मुबादा कोई यह न पूछ ले कि फिर उनके रौज़े कहाँ गये।

    सऊदी अरब में वज़ारते इस्लामीः

    उमूर औक़ाफ़ व दावत व इर्शाद की जानिब से हुज्जाजे किराम के लिये छपने और उनके दरमियान मुफ़्त तक़सीम होने वाले किताबचे ‘‘रहनुमाए हज व उमरा व ज़्यारते मस्जिदे नबवी’’ (मुसन्निफ़: मुतअद्दि उलमाए किराम, उर्दू तर्जुमा शेख़ मुहम्मद लुक़मान सलफ़ी 1419हि0) की इबारत मुलाहज़ा होः

    ‘‘अहले बक़ीअः हज़रत उसमान, शोहदाए ओहद और हज़रत हमज़ा रज़ी अल्लाहु अन्हुम की क़ब्रों की ज़्यारत भी मसनून है… मदीना मुनव्वर में कोई दूसरी जगह या मस्जिद नहीं है कि जिसकी ज़्यारत जाइज़ हो इसलिये अपने आपको तकलीफ़ में न डालो और न ही कोई ऐसा काम करो जिसका कोई अज्र न मिले बल्कि उलटा गुनाह का ख़तरा है।’’