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    जन्नतुल बक़ीअ कि तबाही -2

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    यानी इस किताब के लिखने वाले ‘‘उलमा’’ की निगाह में बक़ीअ में जनाबे उसमान,शोहदाए ओहद और हज़रत हमज़ा की क़ब्रों के अलावा कोई और ज़्यारत गाह नहीं है जबकि तारीख़े इस्लाम को पढ़ने वाला एक मामूली तालिबे इल्म भी यह बात बख़ूबी जानता है कि इस क़ब्रिस्तान में आसमाने इल्म व इरफ़ान के ऐसे आफ़ताब व माहताब दफ़न हैं जिनके नूर से आज तक कायनात मुनव्वर व रौशन है।

    अब ऐसे वक़्त में जबकि वहाबी मीडिया यह कोशिश कर रही है कि जन्नतुल बक़ीअ में मदफ़ून, यज़दगाने इस्लाम के नाम को भी मिटाया जाये, ज़रूरी है कि तमाम मुसलमानों की खि़दमत में मज़लूमों का तज़केरा किया जाये ताकि दुश्मन आनी साजि़श में कामियाब न होने पाये, नीज़ यह भी वाज़ेह हो जाये कि इस्लाम की वह कौन सी मायानाज़ इफ़तिख़ार हस्तियाँ हैं जिनके मज़ार को वहाबियों की कम अक़ली व कज रवी ने वीरान कर दिया है लेकिन इस गुफ़त्गू से क़ब्ल एक बात क़ाबिले जि़क्र है कि यह क़ब्रिस्तान पहले एक बाग़ था, अरबी ज़बान में इस जगह का नाम ‘‘अलबक़ीअ अलग़रक़द’’ है, बक़ीअ यानी मुख़तलिफ़ दरख़्तों का बाग़ और ग़रक़द एक मख़सूस कि़स्म के दरख़्त का नाम है चूंकि इस बाग़ में एक तरह के दरख़्त ज़्यादा थे इस वजह से इसे बक़ीअ ग़रक़द कहते थे, इस बाग़ में चारों तरफ़ लोगों के घर थे जिनमें से एक घर जनाब अबुतालिब के फ़रज़न्दे अक़ील का भी था जिसे ‘‘दारे अक़ील’’ कहते थे, बाद में जब लोगों ने अपने मरहूमीन को इस बाग़ में अपने घरों के अन्दर दफ़न करना शुरू किया तो ‘‘दारे अक़ील’’ पैग़म्बरे इस्लाम स॰ के ख़ानदान का क़ब्रिस्तान बना और मक़बरा ‘‘बनी हाशिम’’ कहलाया। रफ़ता रफ़ता पूरे बाग़ से दरख़्त कटते गये और क़ब्रिस्तान बनता गया।

    मक़बरा-ए-बनी हाशिम, जो एक शख़्सी मिलकियत है, उसी में आइम्मा अतहार अ॰ के मज़ार थे जिनको वहाबियों ने मुन्हदिम कर दिया है। अफ़सोस तो उस वक़्त होता है जब इस तारीख़ी हक़ीक़त के मुक़ाबले में इन्हेदामे बक़ीअ के बाद सऊदी अरब से छपने वाले रिसाले‘‘उम्मुल क़ुरा’’ (शुमारा जमादीउस्सानिया 1345 हि0) में इस ज़ालिमाना फि़रके़ के मुफ़ती व क़ाज़ी ‘‘इब्ने वलीद’’ का यह बयान नज़रों से गुज़रता है कि ‘‘बक़ीअ मौक़ूफ़ा है और क़ब्रों पर बनी हुई इमारतें क़ब्रिस्तान की ज़मीन से इस्तेफ़ादा करने से रोकती हैं।’’

    न जाने किस शरीअत ने साहिबाने मिलकियत की ज़मीन में बेजा दख़ालत और उसे मौक़ूफ़ा क़रार देने का हक़ इस ज़र ख़रीद मुफ़ती को दे दिया।

    इस मुक़द्दस क़ब्रिस्तान में दफ़न होने वाले इस्लाम के बड़े रेहनुमा के तज़करे से पहले यह बता देना ज़रूरी है कि बक़ीअ का एहतेराम फ़रीक़ैन के नज़दीक साबित है और सब कल्मा पढ़ने वाले इस का एहतेराम करते हैं, इस सिलसिले में फ़क़त एक रिवायत काफ़ी है‘‘उम्मे क़ैस बिन्त महसन का बयान है कि एक दफ़ा में पैग़म्बर स॰ के हमराह बक़ीअ पहुँची तो आप स॰ ने फ़रमाया: इस क़ब्रिस्तान से सत्तर हज़ार अफ़राद महशूर होंगे जो हिसाब व किताब के बग़ैर जन्नत में जायेंगे, नीज़ उनके चेहरे चैधवी रात के चाँद के तरह चमक दमक रहे होंगे।’’

    ऐसे फ़ज़ीलत वाले क़ब्रिस्तान में आलमे इस्लाम की ऐसी अज़ीमुशान शख़सियतें आराम कर रही है जिनकी अज़मत व मंजि़लत को तमाम मुसलमान, मुत्तफ़ेक़ा तौर पर क़ुबूल करते हैं। आइये देखें कि वे शख़सियतें कौन हैः