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    ज़मीन पर सजदा

    ज़मीन पर सजदा
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    सजदा उन अफ़आल (कामों) में सबसे उपर है जिनसे इंसान की बंदगी और विनम्रता का पता चलता है। सजदा नमाज़ का रुक्न (स्तम्भ कि जिसके छूटने पर नमाज़ सही नहीं रहेगी चाहे भूले ही से क्यों न हो।) है, नमाज़ी के लिये हर रकअत में दो सजदे बजा लाना वाजिब हैं यह सारे मुसलमानों का ऐसा नज़रिया है जिसे सब क़ुबूल करते हैं। हालांकि उनके बीच इस बारे में मतभेद है कि किस चीज़ पर सजदा किया जाए?

    शियों का नज़रिया यह है कि जब इंसान के सामने कोई मजबूरी न हो तो सजदा केवल उन्हीं चीज़ों पर सही है जो ज़मीन का हिस्सा हों या ज़मीन से उगती हों हालांकि उनके लिये यह शर्त है कि खाई या पहनी न जाती हों, कि उन पर सजदा सही नहीं है लेकिन अहले सुन्नत कपड़े या कपड़े से बने हुए फ़र्श या ज़मीन आदि पर भी सजदे को सही बताते हैं।
    इस बारे में शियों की दलील वह हदीसें हैं कि जो अइम्मा अलैहेमुस्सलाम के हवाले से बयान हुई हैं। पैग़म्बरे इस्लाम स. और सहाबा की सीरत से भी इसी बात का पता चलता है इसलिए हेशाम बिन हेकम कहते हैं कि मैंने इमाम जाफ़र सादिक़ अ. से सवाल किया कि किस चीज़ पर सजदा हो सकता है? तो आपने फ़रमायाः

    ’السجود لا یحوز اِلاَّعلی الارض او علی ما انبتت من الارض الاماأکل أولب

    सजदा केवल ज़मीन पर या ज़मीन पर उगने वाली चीज़ों पर जाएज़ है इस शर्त के साथ कि वह खाई या पहनी न जाती हों।
    जब हेशाम ने इमाम अ. से इसकी वजह पूछी तो आपने फ़रमायाः

    لان السجود خضوع للہ عزوجل فلا ینبغی ان یکون علی ما یوکل و یلبس لان ابناء الدنیا عبید ما یأکلون و یلبسون و الساجد فی سجودہ فی عبادۃ اللہ عزوجل فلا ینبغی ان یضع جبہتہ فی سجودہ علی معبود ابناء الدنیا الذین اغتروا ب

    सजदा अल्लाह तआला के सामने विनम्रता और दीनता के लिये है इसलिए खाई या पहनी जाने वाली चीज़ों पर सजदा उचित नहीं है क्योंकि दुनिया परस्त लोग खाने और पहनने वाली चीज़ों के बंदे होते हैं और सजदा करने वाला सजदे की हालत में अल्लाह की इबादत में बिज़ी होता है इसलिए सजदे में अपनी पेशानी को ऐसी चीज़ पर रखना सही नहीं है कि जो अहले दुनिया के माबूद (उपास्य) हैं।
    अहले सुन्नत के महान फ़क़ीह व आरिफ़ अब्दुल वह्हाब शेअरानी नें इसी प्वाइंट को समझते हुए यह कहा हैः सजदा अल्लाह तआला के सामने ख़ुज़ूअ व एन्केसारी (विन्रमता व दीनता) के इज़हार का ज़रिया (माध्यम) है जिसका तरीक़ा यह है कि अपने बदन के सबसे बुलंद हिस्से यानी माथे और नाक को ज़मीन पर रख दिया जाये इसके ज़रिये इंसान का घमंड कम हो जाता है और इंसान अल्लाह तआला की बारगाह में हाज़िर होने की योग्यता पैदा कर लेता है जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम स. से रिवायत की गयी है।

    لا یدخل الجنۃ من فی قلبہ مثقال ذرۃ من کبر

    जिसके दिल में तनिक भी घमंड होगा वह जन्नत में दाखिल नहीं हो सकता है।
    हज़रत रसूले इस्लाम की मशहूर व प्रसिद्ध हदीस हैः

    جعلت لی الارض مسجداو طہورا

    मेरे लिये ज़मीन सजदागाह और पाक करने वाली बनाई गई है।
    इसमें तहूर तहूर शब्द से मुराद तयम्मुम है इससे यह साफ़ हो जाता है कि ज़मीन से मुराद पत्थर, मिट्टी और उसी जैसी दूसरी चीज़ें हैं।
    हज़रत रसूले इस्लाम स. के युग के मुसलमानों की रीति, ज़मीन पर सजदा करना ही था और वह मस्जिद की ज़मीन के फ़र्श पर सजदा किया करते थे जिस पर कंकरियां पड़ी हुई थीं और जब सूरज की सख़्त गर्मी पड़ती थी तो गर्मी की वजह से कंकरियां गर्म हो जाती थीं। वह उन कंकरियों को अपने हाथ में ले लेते थे ताकि कंकरियां ठंढ़ी हो जाएं और वह उन पर सजदा कर सकें जैसा कि एक रिवायत के अनुसार जनाबे जाबिर बिन अब्दुल्लाहे अंसारी का बयान हैः
    मैं पैग़म्बरे इस्लाम स. के साथ नमाज़े ज़ोहर पढ़ा करता था और उस वक़्त कंकरियां इतनी गर्म होती थीं कि उन पर सजदा करना सम्भव नहीं था इसलिए मैं एक मुट्ठी कंकरियां उठा लेता था और उन्हें एक हाथ से दूसरे हाथ में उलटता पलटता रहता था और जब वह ठंढ़ी हो जाती थीं तब उनके ऊपर सजदा किया करता था क्योंकि मस्जिद के ऊपर कोई छत नहीं थी इसी वजह से गर्मी की शिद्दत से मस्जिद के फ़र्श की कंकरियां गर्म हो जाती थीं इसलिए कुछ सहाबा गर्मी से बचने के लिये अपनी पेशानी या हाथों के नीचे कपड़ा रख लेते थे तो पैग़म्बरे इस्लाम स. नें उन्हे इस काम से मना किया तो उन लोगों ने आपसे गर्मी की शिद्दत और सजदे में परेशानी की शिकायत की मगर आपने उनकी शिकायत पर कोई ध्यान नहीं दिया और कपड़ों पर सजदा करने की इजाज़त नहीं दी।
    हम सब जानते हैं कि हज़रत रसूले इस्लाम स. अल्लाह की रहमत का नमूना थे और लोगों की तकलीफ़ देख कर आप दुखी हो जाते थे और उनकी मुश्किलों को हल करने में किसी संकोच से काम नहीं लेते थे जैसा कि क़ुरआने करीम में इरशाद हैः

    لَقَدْ جَائَکُمْ رَسُولٌ مِّنْ أَنفُسِکُمْ عَزِیزٌ عَلَیْہِ مَا عَنِتُّمْ حَرِیصٌ عَلَیْکُمْ بِالْمُؤْمِنِینَ رَئُ وْفٌ رَحِیم

    इसलिए अगर कपड़े के ऊपर सजदा करना जाएज़ व सही होता तो हज़रत रसूले इस्लाम स. मुसलमानों की मांग को ज़रूर क़ुबूल कर लेते और उन्हे अपने कपड़ों पर सजदा करने से मना न करते। सहाबा के हवाले से बयान होने वाली दूसरी हदीसों से यह मालूम होता है कि आपनें बाद में मुसलमानों को बोरिया और चटाई पर सजदा करने की इजाज़त दे दी थी।
    कुछ दूसरी हदीसें भी हैं जिनसे मालूम होता है कि मजबूरी की हालत में कपड़े पर सजदा करना जाएज़ है उनमें कुछ रिवायतों में गर्मी की शिद्दत का उल्लेख है और मजबूरी या बाध्यता का कोई बयान नहीं है जबकि कुछ रिवायतें ऐसी हैं जिनमें यह साफ़ साफ़ मौजूद है कि कपड़े पर सजदा केवल उस वक़्त होता था जब गर्मी की शिद्दत की वजह से ज़मीन पर सजदा करना सम्भव नहीं होता था जैसा कि अनस इब्ने मालिक का बयान हैः

    کنّا اذا صلینا مع النبیؐ فلم یستطع احدنا ان یمکن جبہتہ من الارض ،طرح ثوبہ ثم سجد علیہ

    जब हम रसूले इस्लाम के साथ नमाज़ पढ़ते थे और कोई इंसान ज़मीन पर अपना माथा नहीं रख पाता था तो वह अपना कपड़ा डाल कर उसी के ऊपर सजदा कर लेता था।
    इस रिवायत के अनुसार कपड़े पर सजदा केवल उस सूरत में जाएज़ है कि जब ज़मीन पर सजदा करना सम्भव न हो।
    सारांश यह कि सजदे के बारे में अहले सुन्नत की हदीसों से यह नतीजा हासिल होता हैः
    1. शुरू में केवल पत्थर और मिट्टी के ऊपर सजदा करने की इजाज़त थी।
    2. दूसरे चरण में ज़मीन से उगने वाली चीज़ों जैसे चटाई पर भी सजदा करने की इजाज़त दे दी गयी।
    3. मजबूरी और बाध्यता की सूरत में कपड़े पर भी सजदा करना जाएज़ बताया गया है।
    इन हदीसों से जो नतीजा निकलता है वह शियों के नज़रिये को साबित करता है और उसी के अनुसार है।
    हालांकि शियों के बीच जो प्रचिलित हो गया है कि वह मट्टी की सजदागाह बना कर उसे अपने साथ रखते हैं उसकी वजह यह है कि पहले बात तो यह कि सम्भव है कि हर जगह मिट्टी, पत्थर या ऐसी चीज़ न मिल सके जिस पर सजदा करना सही है, दूसरे यह कि मिट्टी के ऊपर सजदा करना दूसरी हर चीज़ पर सजदा करने से बेहतर है, क्योंकि जैसा कि पहले भी बयान किया जा चुका है कि अल्लाह तआला के सामने विन्रमता व दीनता को प्रकट करना ही सजदे की रूह है और यह मक़सद दूसरी चीज़ों पर सजदा करने के बजाए मिट्टी पर सजदा करके बेहतर तरीक़े से हासिल हो जाता है।
    उपरोक्त दलीलों और तर्कों की रौशनी में सजदागाह पर सजदा करने को मना करने के बारे में वहाबियों की ज़ोर ज़बरदस्ती या उसे शिर्क बता देने की कोई दीनी व शरई दलील नहीं है बल्कि वास्तव में यह ख़ुद ही एक तरह की बिदअत (दीन में नई ईजाद) है, इन सब बातों के अलावा कुछ इतिहास की किताबों के अनुसार सजदा करने के लिये सूखी मिट्टी साथ रखना और उस पर सजदा करना पूर्वजों की रीति रही है जैसा की अबू बक्र बिन अबी शअबा ने फ़क़ीह मसरूख़ (62 हिजरी) के बारे में लिखा है कि वह सफ़र के दौरान मदीने की सूख़ी मिट्टी का एक टुकड़ा अपने साथ रखते थे और उसी के ऊपर सजदा करते थे।