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    ज़ाते ख़ुदा की हक़ीक़त सबसे पौशीदा है

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    हमारा अक़ीदह है कि इसके बावुजूद कि यह दुनिया अल्लाह के वुजूद के आसार से भरी हुई है फ़िर भी उसकी ज़ात की हक़ीक़त किसी पर रौशन नही है और न ही कोई उसकी ज़ात की हक़ीक़त को समझ सकता है, क्योँ कि उसकी ज़ात हर लिहाज़ से बेनिहायत और हमारी ज़ात हर लिहाज़ से महदूद है लिहाज़ा हम उस की ज़ात का इहाता नही कर सकते“अला इन्नहु बिकुल्लि शैइन मुहीतु ” यानी जान लो कि उस का हर चीज़ पर इहाता है। या यह आयत कि “व अल्लाहु मिन वराइहिम मुहीतु ”[35]यानी अल्लाह उन सब पर इहाता रखता है।

    पैग़म्बरे इस्लाम (स.)की एक मशहूर व माअरूफ़ हदीस में मिलता है कि “मा अबदनाका हक़्क़ा इबादतिक व मा अरफ़नाका हक़्क़ा मअरिफ़तिक” यानी न हम ने हक़्क़े इबादत अदा किया और न हक़्क़े माअरेफ़त लेकिन इसका मतलब यह नही है जिस तरह हम उसकी ज़ाते पाक के इल्मे तफ़्सीली से महरूम है इसी तरह इजमाली इल्म व माअरेफ़ते से भी महरूम हैं और बाबे मअरेफ़तु अल्लाह में सिर्फ़ उन अलफ़ाज़ पर क़िनाअत करते हैं जिनका हमारे लिए कोई मफ़हूम नही है। यह मारिफ़तु अल्लाह का वह बाब है जो हमारे नज़दीक क़ाबिले क़बूल नही है और न ही हम इसके मोतक़िद हैं। क्योँ कि क़ुरआन और दूसरी आसमानी किताबे अल्लाह की माअरेफ़त के लिए ही तो नाज़िल हुई है।

    इस मोज़ू के लिए बहुत सी मिसाले बयान की जा सकती हैं जैसे हम रूह की हक़ीक़त से वाक़िफ़ नही हैं लेकिन रूह के वुजूद के बारे में हमें इजमाली इल्म है और हम उसके आसार का मुशाहेदा करते हैं।

    इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि “ कुल्ला मा मय्यज़तमुहु बिअवहामिकुम फ़ी अदक़्क़ि मुआनीहि मख़लूक़ुन मसनूउन मिस्लुकुम मरदूदुन इलैकुम”यानी तुम अपनी फ़िक्र व वहम में जिस चीज़ को भी उसके दक़ीक़तरीन मअना में तसव्वुर करोगे वह मख़लूक़ और तुम्हारे पैदा की हुई चीज़ है,जो तुम्हारी ही मिस्ल है और वह तुम्हारी ही तरफ़ पलटा दी जायेगी।

    अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने मअरिफ़तु अल्लाह की बारीक व दक़ीक़ राह को बहुत सादा व ज़ेबा तबीर के ज़रिये बयान फ़रमाया है “लम युतलिइ अल्लाहु सुबहानहु अल उक़ूला अला तहदीदे सिफ़तिहि व लम यहजुबहा अमवाज़ा मअरिफ़तिहि ”यानी अल्लाह ने अक़्लों को अपनी ज़ात की हक़ीक़त से आगाह नही किया है लेकिन इसके बावुजूद जरूरी माअरिफ़त से महरूम भी नही किया है।