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    जिस शख़्स का पेशा या पेशे की शुरुआत सफ़र हो

    जिस शख़्स का पेशा या पेशे की शुरुआत सफ़र हो
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    सवाल 638:  जिस शख़्स का सफ़र उसके पेशे की शुरुआत हो क्या वोह सफ़र में पूरी नमाज़ पढ़ेगा और उसका रोज़ा भी सही है या ये (पूरी नमाज़ पढ़ना) उस शख़्स से मख़सूस है जिसका पेशा ही यक़ीनी तौर पर सफ़र हो और, इमाम ख़ुमैनी के इस क़ौल के क्या माना हैं जिसका पेशा सफ़र हो, क्या कोई शख़्स ऐसा भी पाया जाता है जिसका पेशा सफ़र हो?

    इसलिये कि चरवाहे ड्राइवर और मल्लाह (कशती चलाने वाला) वग़ैरह का पेशा भी चराना, ड्राइविंग करना और कश्ती चलाना है, और बुनियादी तौर पर ऐसा कोई शख़्स नहीं पाया जाता जिसका इरादा सफ़र को पेशा बनाना हो?

    जवाब:  जिस शख़्स का सफ़र उसके पेशे की तमहीद हो अगर वो हर दस दिन में कम अज़ कम एक मर्तबा काम के लिये अपने काम की जगह पर जाता है तो वो वहां पूरी नमाज़ पढ़ेगा और उसका रोज़ा भी सही है और फुक़हा (रिज़वान उल्लाह अलैहिम) के क़ौल के मुताबिक़ जिसका पेशा सफ़र हो से मुराद वो शख़्स है जिसके काम का दारोमदार ही सफ़र पर हो जैसे वो मशग़ला जो आपने सवाल में ज़िक्र किये हैं।

    सवाल 639:  उन लोगों के रोज़े और नमाज़ के बारे में आपकी क्या राय है जो एक शहर में काम करने के लिये एक साल से ज़्यादा मुद्दत तक क़याम करते हैं या वो फ़ौजी जो किसी शहर में फ़ौजी ख़िदमात अंजाम देने के लिये एक या दो साल क़याम करते हैं क्या उन पर हर सफ़र के बाद दस रोज़ के ठहरने की नियत करना वाजिब है ताकि वोह रोज़ा रख सकें और पूरी नमाज़ पढ़ सकें? और अगर वोह दस रोज़ से कम ठहरने की नियत करें तो उनके रोज़े व नमाज़ का क्या हुक्म है?

    जवाब: अगर ये लोग हर दस दिन में कम अज़ कम एक जगह अपने काम की जगह की तरफ़ सफ़र करते हों तो पहले व दूसरे सफ़र के अलावा उनकी नमाज़ पूरी और रोज़ा सही होगा लेकिन पहले और दूसरे सफ़र में उनका हुक्म वही है जो बाक़ी मुसाफ़िरों का है यानी जब तक दस दिन के क़याम की नियत न करें उनकी नमाज़ क़स्र है और रोज़ा सही नहीं है।

    सवाल 640:  जंगी तैयारियों के पाइलेट जो अकसर दिनों में फ़ौजी अड़डों से उड़ते करते हैं और शरई दूरी से कहीं ज़्यादा फ़ासले तय करने के बाद वापस आते हैं उनकी नमाज़ और रोज़े का क्या हुक्म है?

    जवाबः इस सिलसिले में उनका हुक्म वही है जो ड्राइवरों, मल्लाहों और पाइलेटों का है यानी सफ़र में उनकी नमाज़ पूरी और रोज़ा सही है।

    सवाल 641: वो क़बीले जो एक या दो महीने के लिये गर्म इलाक़े से सर्द (ठंडे) इलाक़े की तरफ़ या इसका उलटा, मकान बदलते हैं लेकिन साल का बाक़ी हिस्सा अपने ही इलाक़े में गुज़ारते हैं तो क्या उनके दो वतन शुमार होंगे? और उन में से एक मक़ाम पर रिहाइश के दौरान में जो दूसरे मकान की तरफ़ सफ़र करते हैं उसमें उनकी नमाज़ का क़स्र या तमाम होने के लिहाज़ से क्या हुक्म है?

    जवाब:  अगर वोह हमेशा गर्म से सर्द (ठंडे) इलाक़े और सर्द (ठंडे) से गर्म इलाके़ की तरफ़ मकान बदलने का इरादा रखते हों ताकि अपने साल के कुछ दिन एक जगह गुज़ारें और कुछ दिन दूसरी जगह गुज़ारें और उन्होंने दोनों जगहों को अपनी ज़िन्दगी के लिये इख़तियार कर रखा हो तो दोनों जगह उनके लिये वतन शुमार होंगी और दोनों पर वतन का हुक्म लगेगा और अगर दोनों वतनों के दर्मियान का फ़ासला शरई दूरी के बराबर हो तो एक वतन से दूसरे वतन की तरफ़ सफ़र के रास्ते में उनका हुक्म वही है जो तमाम मुसाफ़िरों का है।

    सवाल 642:  मैं एक शहर में सरकारी मुलाज़िम हूं और मेरी सरविस की जगह और घर के दर्मियान तक़रीबन 53 किमी0 का फ़ासला है और रोज़ाना इस दूरी को अपनी सरविस की जगह पहुंचने के लिये तय करता हूं पस अगर किसी काम से में इस शहर में कुछ रातें ठहरने का इरादा कर लूं तो में अपनी नमाज़ कैसे पढ़ूंगा क्या मुझ पर पूरी नमाज़ पढ़ना वाजिब है या नहीं,मिसाल के तौर पर अगर में जुमे को अपने रिश्तेदारों से मुलाक़ात के लिये समनान जाऊं तो क्या मुझे पूरी नमाज़ पढ़ना होगी या नहीं?

    जवाब:  अगर आपका सफ़र आपकी इस सरविस के लिये नहीं है जिसके लिये आप रोज़ाना जाते हैं तो आप पर सरविस वाले सफ़र का हुक्म नहीं लगेगा लेकिन अगर सफ़र खुद उसी सरविस के लिये हो लेकिन इसके दाएरे में दूसरे काम, जैसे रिश्तेदारों और दोस्तों से मुलाक़ात वग़ैरह तो भी अंजाम दें और कुछ औक़ात (कभी-कभी) वहां पर एक रात या कुछ रातें ठहर जायें तो काम के लिये सफ़र का हुक्म इन कामों की वजह से नहीं बदलेगा बल्कि आपको पूरी नमाज़ पढ़नी होगी और रोज़ा रखना होगा।

    सवाल 643:  अगर सरविस की जगह पर कि जिसके लिये मैंने सफ़र किया है ऑफ़िस टाइम के बाद अपने काम अंजाम दूं मसलन सुबह सात बजे से दो बजे तक ऑफ़िस के काम अंजाम दूं और दो बजे के बाद अपने दूसरे काम अंजाम दूं तो मेरी नमाज़ और रोज़े का क्या हुक्म है?

    जवाबः ऑफ़िस वाले काम को अंजाम देने के बाद अपने काम को अंजान देना काम के लिये सफ़र करने के हुक्म को तबदील नहीं करता ।

    सवाल 644:  उन सिपाहियों के रोज़ा नमाज़ का क्या हुक्म है जो ये जानते हों कि वोह दस दिन से ज़्यादा एक जगह क़याम करेंगे, लेकिन उनका इख़तियार खु़द उनके हाथ में नहीं है? उम्मीद है इमाम ख़ुमैनी का फ़त्वा भी बयान फ़रमायेंगे?

    जवाब:  बयान किये गऐ सवाल में अगर उन्हें दस दिन या उससे ज़्यादा एक जगह रहने का इतमिनान हो तो उन पर पूरी नमाज़ पढ़ना और रोज़ा रखना वाजिब है और यही फ़त्वा इमाम खुमैनी का भी है।

    सवाल 645:  उन सिपाहियों के रोज़े और नमाज़ का क्या हुक्म है जो फ़ौज या पासदाराने इन्क़ेलाब में शामिल हैं और जो दस दिन से ज़्यादा सरहदी इलाक़ों में रहते हैं? बराये महरबानी इमाम ख़ुमैनी का फ़त्वा भी बयान फ़रमायें?

    जवाब:  अगर वो दस दिन या उससे ज़्यादा एक जगह ठहरने का इरादा रखते हों या वे जानते हों कि दस दिन या उससे ज़्यादा वहां रहना होगा तो वहां पर उनकी नमाज़ पूरी होगी और उन्हें रोज़ा भी रखना होगा और इमाम खुमैनी का फ़त्वा भी यही है।

    सवाल 646:  इमाम ख़ुमैनी की तौज़ीहुल मसाइल (फ़तवों की किताब) के बाब ”नामज़े मुसाफ़िर“”सातवीं शर्त“ में आया है: ड्राइवर पर वाजिब है कि पहले सफ़र के बाद पूरी नमाज़ पढ़े, लेकिन पहले सफ़र के बाद पूरी नमाज़ पढ़े, लेकिन पहले सफ़र में उस की नामज़ क़स्र है चाहे सफ़र तवील ही क्यों न हो, तो क्या पहले सफ़र से मुराद वतन से चलना और लौट कर वापस आना है या नहीं बल्कि अपनी मन्ज़िल तक पहुंच जाने से पहला सफ़र पूरा हो जायेगा?

    जवाब: अगर उसका आना जाना उर्फ़े आम में एक सफ़र शुमार होती है जेसे उस्ताद जो पढ़ाने के लिये अपने वतन से किसी शहर की तरफ़ जाता है और फिर शाम को या अगले दिन अपने घर वापस आ जाता है तो इस सूरत में उसका आने जाने को पहला सफ़र शुमार किया जायेगा और अगर उर्फ़ आम में एक सफ़र शुमार न किया जाये जैसे ड्राइवर जो सामान उठाने के लिये एक मन्ज़िल की तरफ़ सफ़र करता है और फिर वहां से मुसाफ़िरों को सवार करने या दूसरा सामान उठाने के लिये सफ़र करता है और उसके बाद अपने वतन की तरफ़ पलट आता है तो इस सूरत में अपनी मन्ज़िल तक पहुंच कर उसका पहला सफ़र पूरा हो जायेगा।

    सवाल 647:  वो शख़्स जिसका मुसतक़िल पेशा ड्राइविंग न हो बल्कि थोड़े टाइम के लिये ड्राइविंग की ज़िम्मेदारी उसे सौंपी गयी हो जैसे छावनियों वग़ैरह में फ़ौजियों पर मोटर गाड़ी चलाने की ज़िम्मेदारी आइद कर दी जाती है क्या ऐसा शख़्स मुसाफ़िर के हुक्म में है या इस पर पूरी नमाज़ पढ़ना रोज़े रखना वाजिब है?

    जवाब: अगर उर्फे़ आम में गाड़ी की ड्राइविंग को इस मुद्दत में उनका पेशा समझा जाये तो इस मुद्दत में उनका वही हुक्म है जो तमाम ड्राइवरों का है।

    सवाल 648:  जब किसी ड्राइवर की गाड़ी में कोई नुक़्स हो जाये और वोह उसके पुर्ज़े और सामान लेने के लिये दूसरे शहर जाये तो क्या इस तरह के सफ़र में वोह पूरी नमाज़ पढ़ेगा या क़स्र, जबकि उस सफ़र में उसकी गाड़ी उसके साथ नहीं है?

    जवाब: अगर उस सफ़र में उसका काम ड्राइविंग न हो और उर्फे़ आम में भी उसके सफ़र को काम वाला सफ़र शुमार न किया जाये तो उसका हुक्म वही है, जो तमाम मुसाफ़िरों का है।

    तलाबा (स्टुडेन्टस) का हुक्म

    सवाल 649:  यूनिवर्सिटियों के उन तलाबा (स्टुडेन्टस) का क्या हुक्म है जो हफ़्ते में कम अज़ कम दो दिन इल्म को हासिल करने के लिये सफ़र करते हैं या उन मुलाज़िमों का क्या हुक्म है जो हर हफ़्ते अपने काम के लिये सफ़र करते हैं?  इस बात का ख़याल रहे कि वोह हर हफ़्ते सफ़र करते हैं लेकिन कभी यूनिवर्सिटी या काम की जगह में छुट्टी हो जाने की वजह से वोह एक महीने तक अपने असली वतन में रहते हैं और उस एक माह की मुद्दत में सफ़र नहीं करते तो जब वे एक महीने के बाद फिर से सफ़र शुरु करेंगे तो क्या उस से पहले सफ़र में उनकी नमाज़ कायदे के मुताबिक़ क़स्र होगी और उसके बाद वोह पूरी नमाज़ पढ़ेंगे?

    जवाब: इल्म को हासिल करने के लिये सफ़र करने वालों की नमाज़ क़स्र है और उनके लिये सफ़र में रोज़ा रखना सही नहीं है चाहे उनका सफ़र हफ़तावार (हफ़ते में एक बार हो) हो या रोज़ाना लेकिन जो शख़्स काम के लिये सफ़र करता है चाहे वोह मुस्तक़िल काम करता हो या किसी ऑफ़िस में, अगर वोह दस दिन में कम से कम एक मर्तबा अपने काम करने की जगह और अपने वतन या अपनी रहने की जगह के दर्मियान आना जाना करता हो तो तीसरे सफ़र और उसके बाद वोह पूरी नमाज़ पढ़ेगा और उसका रोज़ा रखना भी सही होगा और जब वोह काम वाले दो सफ़रों के दर्मियान अपने वतन में या किसी और जगह पर दस दिन का क़याम करे तो उन दस दिनों के बाद काम के लिये किये जाने वाले वहले सफ़र में नमाज़ क़स्र पढ़ेगा और रोज़ा नहीं रखागा।

    सवाल 650:  में रफ़सनजान के क़रीब स्कूल में टीचर हूं लेकिन यूनिवर्सिटी में दाख़ला हो जाने की वजह से उसमें अपना तालीमी सिलसिला जारी रखने पर भी मजबूर हूं, लिहाज़ा हफ़ते के पहले तीन दिन करमान में अपनी तालीम में मशग़ूल होता हूं और बाक़ी दिन अपने शहर में अपनी डयूटी अंजाम देता हूं, मेरी नमाज़ और रोज़ों का क्या हुक्म है क्या मुझ पर तालिबे इल्म वाला हुक्म लागू होगा?

    जवाब:  अगर आप तालीम हासिल कर रहे हैं तो आपकी नमाज़ पूरी है और रोज़ा भी सही है।

    सवाल 651: अगर दीनी तालिबे इल्म ये नियत करे कि वोह तबलीग़ को अपना मशग़ला (काम) बनायेगा तो ज़िक्र किये गऐ मसअले के मुताबिक़ वोह सफ़र में पूरी नमाज़ पढ़ सकता है और रोज़ा भी रख सकता है? और अगर उस शख़्स का सफ़रे तबलीग़, हिदायत और अम्र बिल मारूफ़ व नहि अनिल मुनकर के लिये न हो बल्कि किसी और काम के लिये सफ़र करे तो उसके रोज़े नमाज़ का क्या हुक्म है?

    जवाब:  अगर तबलीग़ व हिदायत और अम्र बिल मारूफ़ व नहि अनिल मुनकर को उर्फ़े आम में इस को काम कहा जाता हो तो इन चीज़ों के लिये उसके सफ़र का हुक्म वही है जो रोज़गार के लिये तमाम सफ़र करने वालों का है और अगर कभी इनके अलावा किसी और इरादे के लिये सफ़र करे तो दूसरे तमाम मुसाफ़िरों की तरह नमाज़ क़स्र पढ़े और उसका रोज़ा सही नहीं है।

    सवाल 652: जो लोग ग़ैर मोअय्यन वक़्त के लिये सफ़र करते हैं जैसे हौज़ाएइलमिया के तालिबे इल्म या हुकूमत के वोह मुलाज़ेमीन जो किसी शहर में ग़ैर मोअय्यन मुद्दत के लिये मोअय्यन किये जाते हैं उनके रोज़े और नमाज़ का क्या हुक्म है?

    जवाब: क्लास करने और सरविस करने की जगह पर वतन का हुक्म नहीं लगता मगर यह कि क्लास या सरविस की जगह पर उनका क़याम इतना तवील हो कि अब वोह जगह उर्फ़ी तौर पर उनका वतन शुमार होने लगे।

    सवाल 653:  अगर दीनी तालिबे इल्म उस शहर में रहता है जो इसका वतन नहीं है और वहां दस रोज़ ठहरने की नियत करने से पहले वो जानता था या ये इरादा रखता था कि शहर से बाहर वाली मस्जिद में हर हफ़्ते जायेगा। क्या वोह दस दिन के ठहरने की नियत कर सकता है?

    जवाब:  ठहरने के इरादे के दौरान छः या सात घंटे शरई मसाफ़त से कम बाहर जाने का इरादा हो तो इससे ठहरने के इरादे पर कोई नुक़सान नहीं,और जिस जगह जाने का इरादा है वो ठहरने की जगह में दाख़िल है, उसकी पहचान उर्फे़ आम से लगाई जायेगी।