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    जो स्वयं के लिए नापसंद करो उसे दूसरों के लिए भी नापसंद करो

    जो स्वयं के लिए नापसंद करो उसे दूसरों के लिए भी नापसंद करो
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    पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि एक दुर्बल व कमज़ोर व्यक्ति चिकित्सक के पास गया। चिकित्सक ने उसकी नाड़ी (नब्ज़) पकड़ी और समझ गया कि उसे असाध्य बीमारी है और शीघ्र ही वह मर जाएगा। चिकित्सक ने रोगी को रोग न बताने की सोचते हुए उससे कहाः तुम्हें तो एक पुराना रोग है जो केवल परहेज़ न करने से ठीक हो जाएगा। जो मन करे खाओ जो मन चाहे करो। संक्षेप में यह कि अपने मन की बात सुनो। यदि ऐसा नहीं करोगे तो स्थिति और बिगड़ जाएगी। रोगी प्रसन्न हो गया और चिकित्सक को दुआएं देकर चला गया। उसने मार्ग में एक नहर के किनारे एक सूफ़ी व्यक्ति को देखा। उसके मन में आया कि सूफ़ी की गर्दन पर एक थप्पड़ मारे। तुरंत चिकित्सक के परामर्श के अनुसार उसने अपने मन की बात सुनी और उस व्यक्ति की गर्दन पर एक थप्पड़ मारा। सूफ़ी, रोगी व्यक्ति के इस व्यवहार से क्रोधित हो गया और उसे बुरा भला कहने लगा और चाहा कि रोगी को मारे मगर जब उसकी दुर्बलता व कमज़ोरी को देखा तो डर गया कि कहीं मर गया तो इसका ख़ून मेरी गर्दन पर आएगा। यह सोचकर उसने क्रोध भरे स्वर में कहाः क्या कोई रोगी ऐसा कृत्य करता है? अपने कृत्य के अंजाम से नहीं डरते? रोगी व्यक्ति ने सारी बात उसे बता दी। सूफ़ी व्यक्ति ने मखौल भरी मुद्रा में कहाः यह कैसा उपचार है जो तुम्हें दूसरों के साथ बुराई व अत्याचार के लिए प्रेरित करता है? उसके बाद सूफ़ी सोचने लगा कि यदि इस रोगी को क्षमा कर दूं तो इसका दुस्साहस और बढ़ जाएगा और फिर किसी और की गर्दन पर थप्पड़ मारेगा। इसलिए बेहतर होगा कि न्यायधीश के पास ले जाउं ताकि वह इस मामले में न्याय करे।

    न्यायधीश ने उनके बीच फ़ैसला करते हुए कहाः इस प्रकार के मामले में प्रतिशोध लिया जाता है। इसलिए मेरा आदेश यह है कि रोगी से बदला लिया जाए। न्यायधीश ने सूफ़ी को संबोधित करते हुए कहाः हे सूफ़ी! तुम भी इस रोगी व्यक्ति की गर्दन पर उतनी ही तेज़ थप्पड़ मार सकते हो जितनी तेज़ इसने तुम्हारी गर्दन पर मारा है। सूफ़ी ने कहाः न्यायधीश महोदय! यह व्यक्ति रोगी और कमज़ोर है और संभव है कि एक ही थप्पड़ खाने से मर जाएगा तब उस स्थिति में मुझ से बदला लिया जाएगा और मुझे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा। न्यायधीश सोच में पड़ गया और समझ गया कि सूफ़ी सही कह रहा है कि रोगी व्यक्ति संभव है एक ही थप्पड़ में मर जाए। थप्पड़ खाने के परिणाम में मौत है। उस समय सूफ़ी से बदला लेने के लिए एक और न्यायिक कार्यवाही करनी पड़ेगी और मात्र एक थप्पड़े के चक्कर में दो व्यक्तियों की जान चली जाएगी। न्यायशीध ने फिर कुछ देर सोचा और कहाः ठीक है बदला छोड़ देते हैं। इस रोगी व्यक्ति को तुम्हें पैसे देने चाहिए। इसके बाद न्यायधीश ने रोगी व्यक्ति को संबोधित करते हुए कहाः सच बताओ तुम्हारे पास कितने पैसे हैं? रोगी व्यक्ति ने कहाः छह दिरहम हैं। न्यायधीश ने कहाः तो तीन दिरहम अपने पास रखो और तीन दिरहम सूफ़ी को दे दो।

    रोगी व्यक्ति जिस समय न्यायधीश की बातें सुन रहा था उसी समय उसकी नज़र न्यायशीध के गर्दन के पिछले भाग पर पड़ी जो सूफ़ी की गर्दन से अधिक मोटी तगड़ी थी। उसने सोचा कि इस न्यायधीश की गर्दन पर थप्पड़ मारने में बहुत मज़ा आएगा। मेरा मन कितना चाह रहा है कि इसकी गर्दन पर थप्पड़ मारूं। यदि ऐ न करूं तो मेरी बीमारी और बढ़ जाएगी। यह सोच कर रोगी ने एक चाल चली। उसने न्यायधीश से कहाः न्यायधीश महोदय! आपसे कान में कुछ कहना चाहता हूं अपनी गर्दन झुकाइये। जैसे ही न्यायधीश ने गर्दन झुकाई वैसे ही रोगी ने न्यायधीश के गर्दन पर एक थप्पड़ मारा। रोगी व्यक्ति ने न्यायधीश की गर्दन पर थप्पड़ मारने के पश्चात कहाः न्यायधीश महोदय! पूरे छह के छह दिरहम दिए दे रहा हूं। मुझे कुछ नहीं चाहिए। तीन दिरम सूफ़ी को दे रहा हूं और तीन दिरहम आपको मारने के बदले में। न्यायधीश को रोगी की यह बात सुनकर बहुत ग़ुस्सा आया और उसने घूर कर उसे देखा। सूफ़ी ने न्यायधीश को संबोधित करते हुए कहाः हे न्यायधीश ये थप्पड़ आपकी राय का परिणाम है। क्यों जो चीज़ स्वंय के लिए नापसंद थी उसे दूसरों के लिए पसंद किया? इस फ़ैसले का परिणाम देखा? धिक्कार हो आप पर ऐसे निर्णय के लिए। प्रतीक्षा कीजिए अपने निर्णयों का परिणाम स्वयं देखिएगा। सूफ़ी ने कहाः अब जबकि वह आपको तीन दिरहम दे रहा है तो नाराज़ हो रहे हैं जबकि स्वयं आपने यह राशि क्षतिपूर्ति की क़ीमत रखी है। क्या आपने यह नहीं सुना है कि दूसरों के लिए कुआं खोदने वाला पहले स्वयं उसमें गिरता है? न्यायधीश सूफ़ी की बात पर सोचने लगा और फिर उसने रोगी व्यक्ति को देखा जो निर्जीव शरीर की भांति लग रहा था। न्यायधीश ने सूफ़ी को संबोधित करते हुए कहाः बेहतर है इसे क्षमा कर देते हैं और छोड़ देते हैं। तुमने स्वयं यह बात कही कि यदि उससे बदला लेंगे तो संभव है मर जाए। इसलिए क्या कर सकते हैं, यह रोगी है और इसे किसी प्रकार का दंड देने का कोई फ़ायदा नहीं है। इस प्रकार रोगी व्यक्ति जो अपनी मनमानी करना चाह रहा था, ख़तरे से बच गया और समझ गया कि अपनी इच्छानुसार हर काम का परिणाम संभव हैं जान चली जाने के रूप में सामने आए।

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    बुरी संगत के व्यक्ति पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव के संबंध में कहावत हैः पेसरे नूह बा बदान बेनशिस्त। ख़ानदाने नबुव्वतश गुम शुद

    इस कहावत का संबंध ईश्वरीय दूत हज़रत नूह की पैग़म्बरी के काल से है। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम लोगों को एकेश्वरवाद की ओर वर्षों बुलाते रहे किन्तु बहुत कम ही लोग उन पर ईमान लाए। नास्तिक विभिन्न बहानों से हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को यातनाए देते थे। एक दिन ईश्वर ने हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को वही की एक बड़ी नाव बनाएं। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने लकड़ी व अन्य आवश्यक सामग्रियां मुहैया कीं और एक सूखे स्थान पर नाव का निर्माण आरंभ कर दिया। जिस स्थान पर हज़रत नूह नाव का निर्माण कर रहे थे उस स्थान से दूर दूर तक पानी और समुद्र का नामो निशान भी न था। सूखे स्थान पर नाव का निर्माण करने के कारण हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के शत्रु उन्हें और अधिक यातनाएं देने लगे। हज़रत नूह लोगों से कहतेः ईश्वर पर ईमान ले आओ वरना बुरे कर्मों के कारण तुम पर शीघ्र ही ईश्वर का प्रकोप आने वाला है और तुम सबका सर्वनाश हो जाएगा। मुझे नाव पर हर प्राणी का एक जोड़ा सवार करने का दायित्व सौंपा गया है। प्राणियों के अतिरिक्त अपने थोड़े से अनुयाइयों को नाव में स्थान दूंगा क्योंकि शीघ्र ही हर स्थान पर पानी भर जाएगा और केवल वही लोग बचेंगे जो मेरी नाव पर सवार होंगे। नास्तिक व अनपढ़ लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था कि इस सूखी ज़मीन पर वर्षा और बाढ़ आएगी इसलिए वे हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को पागल समझते थे। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के अनुयाइयों में कुछ उनके संबंधी भी थे किन्तु उनका बेटा उन पर विश्वास नहीं रखता था। वह भी दूसरे नास्तिकों की भांति यहां तक कि उनसे बढ़ कर अपने पिता अर्थात हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की बातों का मखौल उड़ाता था। अंततः वादे का निर्धारित दिन आ पहुंचा। उस सूखी ज़मीन पर तेज़ वर्षा होने लगी। लगातार कई दिन रात वर्षा होती रही। यहां तक कि धीरे धीरे घरों व मार्गों में पानी भरता गया। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने विभिन्न प्रकार के प्राणियों तथा अपने अनुयाइयों को नाव पर सवार होने का आदेश दिया। वर्षा रुकने का नाम नहीं ले रही थी। इसी प्रकार कई दिन और होती रही यहां तकि पूरी ज़मीन नदी की भांति जलमग्न हो गयी। कुछ लोग डूबने के भय से अपने घरों की छत पर चढ़ गए तो कछ पहाड़ों व टीलों की ओर चले गए। पानी का स्तर बढ़ता ही जा रहा था। यहां तक कि बहुत से लोग डूब कर मर गए। वर्षा मूसलाधार जारी थी। हज़रत नूह की नाव अब पानी के ऊपर तैर रही थी। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम विशाल नाव के डेक पर खड़े होकर डूबने वालों को देख रहे थे कि उनकी दृष्टि अपने बेटे पर पड़ी जो टीले पर चढ़ रहा था ताकि डूबने से बच जाए। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम जानते थे कि उसका प्रयास निरर्थक है और शीघ्र ही सभी डूब जाएंगे। इसलिए उन्होंने ईश्वर से अपने पुत्र को बचाने की प्रार्थना की किन्तु ईश्वर ने उत्तर दिया कि अब वह तुम्हारा बेटा नहीं है क्योंकि वह दुराचारी है।

    वास्तविकता भी यही थी कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का बेटा नास्तिकों की संगत में रहने के कारण अपने पिता की बात को नहीं सुनता था बल्कि उनका मखौल उड़ाता था। उसे अंतिम क्षण यह समझ में आया कि उसने ग़लती की है किन्तु अब पछताने का कोई फ़ायदा न था क्योंकि मुक्ति देने वाली नाव हर पल दूर होती जा रही थी। उस दिन के बाद से जब भी किसी को बुरे लोगों की संगत से दूर रहने की नसीहत की जाती है तो हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के बेटे की कहानी उसे बतायी जाती है और इस कहावत को पेश किया जाता हैः पेसरे नूह बाबदान बेनशिस्तै।