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    जो स्वयं के लिए नापसंद करो उसे दूसरों के लिए भी पसंद न करो (1)

    जो स्वयं के लिए नापसंद करो उसे दूसरों के लिए भी पसंद न करो (1)
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    प्राचीन काल में एक नगर में एक बीमार व्यक्ति रहता था। अपनी बीमारी के कारण वह बहुत ही कमज़ोर हो चुका था। वह जो कुछ भी खाता-पीता था वह उसके बदन को नहीं लगता था। खाने के बावजूद वह दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होता जा रहा था। उसके स्वास्थ्य की गिरती स्थिति को देखते हुए उसके परिजनों और मिलने वालों ने उसे किसी अनुभवी वैद्य को दिखाने की सलाह दी। बीमार व्यक्ति एक वैध के पास गया। वह वैद्य इतना अनुभवी था कि जो भी उसके पास अपने इलाज के लिए जाता वह निराश वापस नहीं आता। जो भी उसे दिखाने जाता वह ठीक होकर ही वापस आता था। यह बीमार व्यक्ति भी बहुत आशा के साथ अनुभवी वैद्य के पास गया। बीमार से वैद्य ने कहा कि मेरा मोआएना करके आप यह बताइये कि मुझको एसी कौन सी बीमारी है जिसने मेरी यह स्थिति बना दी है। वैद्य ने मरीज़ की नब्ज़ देखी तो उसे पता चला की बीमार की स्थिति बहुत ही ख़राब है और उसका बचना संभव नहीं है। वह किसी असाध्य बीमारी में ग्रस्त है और शीघ्र ही से इस संसार से चल बसेगा। वैध ने जब यह देखा कि वह बीमार की कोई सहायता नहीं कर सकता तो उसने स्वयं से कहा कि यदि मैं उसे उसकी बीमारी के बारे में बताता हूं तो इससे वह दुखी हो जाएगा तथा शीघ्र ही इस संसार से चल बसेगा इसलिए इस बारे में कुछ करना चाहिए। कुछ देर सोच-विचार करने के पश्चात उसके मन में एक विचार आया। वैद्य ने सोचा कि बीमार तो मर ही जाएगा तो क्यों न उससे यह कहूं कि वह स्वतंत्र रहे और जो चाहे करे तथा जो कुछ भी चाहे खाए-पीए तथा बिल्कुल भी परहेज़ न करे। इस प्रकार वह कम से कम अपने जीवन के बचे हुए समय से आनंदित हो सकता है। इन्ही बातों के दृष्टिगत वैध ने बीमार से कहा कि तुम बहुत ही पुरानी और जटिल बीमारी में ग्रस्त हो गए हो और परहेज़ न करके ही तुम इस बीमारी से मुक्ति प्राप्त कर सकते हो। तुम जो भी चीज़ खाना चाहो खाओ और जो करना चाहो करो। मेरे कहने का तातपर्य यह है कि जो तुम्हारा मन करे तुम वही करो। यदि तुम एसा नहीं करोगे तो तुम्हारी स्थिति अधिक ख़राब हो जाएगी।

    वैध की बातों को सुनकर बीमार बहुत खुश हुआ। उसने सोचा कि उसकी बीमारी अधिक ख़तरनाक नहीं है। उसने वैध के लिए ईश्वर से प्रार्थना की और उससे विदा लेकर चला गया। जिस समय वैद्य बीमार से कह रहा था कि जो चाहो करो उसी समय उसके मन में यह विचार आया कि वह नदी के किनारे जाकर बैठे और बहते हुए पानी को देखकर आनंदित हो। वह इसी उद्देश्य से जंगल की ओर गया और एक नहर के किनारे पहुंचा। नहर के किनारे एक सूफ़ी बैठा हुआ था। वह इस प्रकार से बैठा हुआ था कि उसकी पीठ बीमार व्यक्ति की ओर थी। वह अपने में खोया हुआ नहर के पानी से अपना हाथ-मुंह धो रहा था। बीमार की दृष्टि, अचानक सूफी की गरदन पर पड़ी। उसकी गरदन मोटी थी। बीमार ने मन ही मन सोचा कि उसकी इच्छा है कि वह सूफ़ी की गरदन पर एक चपत लगाए। फिर उसने स्वयं ही सोचा कि यह कैसा विचार है जो उसके मन में आया है। वास्तव में यह दिल कैसी-कैसी इच्छाएं करता है। फिर उसने सोचा कि वैद्य ने तो कहा था कि तुम्हारा मन जो भी चाहे वही करो अन्यथा तुम्हारी बीमारी बढ़ जाएगी अतः अब मेरे पास इस सन्यासी की गरदन पर एक चपत लगाने के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं है। बीमार व्यक्ति आगे बढ़ा और उसने सन्यासी की गरदन पर एक ज़ोरदार चपत लगाई। चपत की आवाज़ पूरे वातावरण में फैल गई। चपत लगते ही सूफी पलटा और बहुत ही ग़ुस्से में बीमार को बुरा-भला कहने लगा। उसने कहा कि क्या पागल हुए हो? तुमने मेरी गरदन पर चपत क्यों लगाई? सन्यासी इतना क्रोधित था कि उसकी आवाज़ से बीमार बुरी तरह से डर गया। सन्यासी, बीमार पर आक्रमण करने ही वाला था कि उसने देखा कि यह व्यक्ति तो बहुत कमज़ोर और दुबला-पतला है। यह देखकर उसने सोचा कि कहीं एसा न हो कि मेरी मार से यह मर जाए और फिर इसकी हत्या का ज़िम्मा मेरे ऊपर आ जाए। इसके कार्य से पता चलता है कि यह बीमार है। यदि बीमार न होता तो एसा काम क्यों करता? उसने ग़ुस्से में निर्बल बीमार को संबोधित करते हुए कहा कि तुम जो निर्दोषों को मारते हो तो क्या तुमको यह पता नहीं है कि अपने काम की तुमको भरपाई करनी पड़ेगी। यह सुनकर बीमार ने अपनी बीमारी और वैध की बात सन्यासी को बताई। सूफी ने हास्यास्पद ढंग से मुस्कुराते हुए कहा कि यह कैसा उपचार है जो तुमको दूसरों के साथ बुराई और अत्याचार करने के लिए प्रेरित करता है। फिर सन्यासी ने स्वयं से कहा कि यदि मैं इसकी ग़लती को अनदेखा कर दूं तो वे अपने कार्यों में और दुस्साहसी हो जाएगा तथा फिर किसी दूसरे को भी थप्पड़ लगा सकता है। उचित यह होगा कि उसको न्यायाधीश के पास ले चलूं ताकि वह हमारे बारे में अपना निर्णय सुनाए। (जारी है)