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    टेलीवीजन के मुख्य दर्शक बच्चे होते हैं

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    विश्व के सिनेमा जगत के इतिहास में युद्ध पर आधारित फ़िल्मों की कहानियों पर दृष्टि डालने से पता चलता है कि इस प्रकार की फ़िल्मों के इतिहास में बहुत अधिक उतार चढ़ाव नहीं है। विषय की दृष्टि से यह फ़िल्में युद्ध और उससे उत्पन्न होने वाली मानवीय त्रासदी की आलोचना करती थीं। अलबत्ता इनमें से बहुत सी फ़िल्में युद्ध के काल से विशेष होने के कारण प्राचारिक या रणकौशल संबंधी रही हैं किन्तु युद्ध के बाद ही इन दोनों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाने लगा ताकि दर्शक युद्ध के विभिन्न आयामों से अवगत हों कि युद्ध के काल में जिसके बारे में उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी या उस समय इस विषय का इतना महत्त्व ही नहीं होगा जो वर्षों के बाद सामने आया।
    बाद में आने वाली पीढ़ी पर युद्ध के प्रभाव और इस विषय पर विशेष रूप से ध्यान देना, उन महत्त्वपूर्ण विषयों में है जिस पर सामन्य रूप से फ़िल्म निर्देशक या लेखक ध्यान देते हैं और उनका प्रयास होता है कि अपनी फ़िल्मों को युद्ध की पीढ़ी और युद्ध के बाद की पीढ़ी जैसे दो महत्त्वपूर्ण विषयों पर केन्द्रित करके दोनों पीढ़ियों के लिए अपनी फ़िल्मों या पुस्तकों को देखने व पढ़ने योग्य बनाएं। फ़्लश बैक या अतीत की कहानी को वर्तमान कहानी से जोड़ने जैसी शैलियों से लाभ उठाना, वास्तव में इस बात को दर्शाता है कि फ़िल्म निर्माताओं ने अतीत की पीढ़ी को वर्तमान पीढ़ी के साथ करने और एक दूसरे के मध्य गहरी पहचान उत्पन्न करने का बहुत प्रयास किया। अहमद रज़ा दरवीश जैसे फ़िल्म निर्माताओं ने पवित्र प्रतिरक्षा के संबंध में अपनी कुछ फ़िल्मों में यही प्रयास किया और स्वयं उनके कथानुसार उन्होंने एक औसत आयु वाले व्यक्ति की युद्ध की कहानी को युवा पीढ़ी के सामने पेश किया।
    दरवेश का जन्म वर्ष 1961 में तेहरान में हुआ था और उन्होंने Architecture and Graphic के विषय में शिक्षा में एमए किया और युद्ध के काल में मोर्चे पर फ़ोटो ग्राफ़िंग करते थे। उसी काल में उन्होंने एक टीवी सीरियल का निर्देशन किया और युद्ध की समाप्ति के बाद पूर्ण रूप से सिनेता जगत का भाग हो गये। उन्होंने अपनी पहली लंबी फ़िल्म आख़ेरीन परवाज़ बनाई। इसी प्रकार उन्होंने कानी मांगा जैसी कुछ कहानियों की पटकथा भी लिखी है कि युद्ध के विषय में बनने वाली सबसे अधिक बिकने वाली ईरानी फ़िल्मों में है।
    दरवेश उन निर्माताओं में हैं जिन्हें युद्ध के कमान्डरों को दिखाने में बहुत अधिक रुचि है और उन्होंने कीमिया और सरज़मीने ख़ुर्शीद नामक फ़िल्मों का निर्माण करके दर्शा दिया कि पवित्र प्रतिरक्षा काल के आठ वर्षों के दौरान घटने वाली घटनाओं में सद्दाम के सैनिकों द्वारा आबादान के परिवेष्टन और ख़ुर्रम शहर की स्वतंत्रता के दौरान घटने वाली घटनाएं उनके लिए सबसे आकर्षक थीं। अलबत्ता उन्होंने मुत्तवलिदे माहे मेहर जैसी फ़िल्मों का निर्देशन भी किया है जिसमें विश्वविद्यालय के छात्र समाज में पायी जाने वाले विभिन्न रुझहानों और राजनैतिक घटनाओं का चित्रण किया गया है।
    फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में आख़ेरीन परवाज़ नामक फ़िल्म दरवीश का पहला अनुभव थी । इस फ़िल्म में ईरान – इराक़ युद्ध के दौरान जासूसी और अपहरण की घटनाओं को नये आयामों से पेश किया गया है। दरवीश ने इस फ़िल्म में मोर्चे और सैन्य छावनियों के कम ही दृश्य पेश किए किन्तु उन्होंने फ़िल्म की कहानी के दौरान इस ऐतिहासिक चरण का चित्रण किया है।
    इबलीस नामक फ़िल्म वह फ़िल्म है जो निर्देशक की पहले की फ़िल्म से सीधे रूप से जुड़ी हुई है। इस फ़िल्म की कहानी हवाई अड्डे के एक कर्मी के इर्द गिर्द घूमती है जो एक जासूसी संगठन का सदस्य है और संगठन उससे अप्रसन्न हो जाता है। हवाई जहाज़ में विस्फोट और इस घटना में उसकी पत्नी और बच्चों के मारे जाने ने उसे अंदर से झिंझोड़ कर रख दिया । यह पूरी फ़िल्म जासूसी और अपहरण की शैलियों के इर्द गिर्द घूमती रहती है। इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि एक व्यक्ति कैसे जासूसी संगठन के हाथों का खिलौना बनता है और किस प्रकार जासूसी संगठन उसका शोषण करते हैं और बाद में किस प्रकार जासूसी का आरोप लगने के बाद उसका व्यक्तित्व विघटित होता है। जासूसों की सहायता से देश की सीमाओं पर शत्रुओं का आक्रमण और जासूसों का शत्रुओं का साथ देना, इस रोचक फ़िल्म में बहुत बेहतरीन ढंग से बयान किया गया है।
    अहमद दरवीश की प्रसिद्ध व फ़िल्म जगत में अपना लोहा मनवाने वाली फ़िल्म का नाम कीमिया है जिसका निर्देशन अहमद रज़ा दरवीश ने वर्ष 1994 में किया था। यह फ़िल्म युद्ध के दुष्परिणामों के इर्द गिर्द घूमती है। ईरान के आबादान और ख़ुर्रम शहर पर शत्रुओं के सैनिकों के आक्रमण से फ़िल्म आरंभ होती है किन्तु फ़िल्म देखते ही देखते रणक्षेत्र से निकलकर दूसरी कहानी के इर्द गिर्द घूमने लगती है कि दर्शकों को परिवर्तन का पता ही नहीं चलता। वास्तव में इस फ़िल्म की कहानी एक ऐसे नवजात के इर्द गिर्द घूमती है जिसने अभी अभी संसार में क़दम रखा है तोप के गोलों की वर्षा और गोलियों की गड़गड़ाहट में संसार में क़दम रखते ही उसकी मां का साया उसके सिर से उठ जाता है और एक महिला डाकटर उसे बचाती है और उसे गोद ले लेती है। बच्ची का पिता इराक़ियों की जेल से स्वतंत्र होने के बाद अपनी बच्ची की तलाश में निकलता है और अंततः वह उसे मिल जाती है किन्तु महिला डाक्टर यह सोच कर किस प्रकार वह बच्ची को उसके पिता के हवाले करेगी, भयभीत हो जाती है क्योंकि उसे बच्ची से दिली लगाव हो गया था और वह उसे टूटकर चाहती थी। फ़िल्म के अंत में बच्ची और महिला डाक्टर के मध्य पाये जाने वाले अथाह प्रेम और स्नेह को देखकर पिता बच्ची को महिला डाक्टर के पास छोड़ने पर तैयार हो जाता है क्योंकि वह यह समझ गया था कि वह उस बच्ची को इतना प्यार नहीं दे पायेगा जितना महिला डाक्टर से उसे मिल रहा है। यद्यपि फ़िल्म पिता के इसी फ़ैसले पर समाप्त हो जाती है किन्तु पूरी फ़िल्म पिता और महिला डाक्टर के मध्य होने वाली चर्चा के इर्द गिर्द घूमती रहती है। कीमिया नामक फ़िल्म में सभी भूमिका निभाने वालों ने अपनी भूमिकाओं को बहुत ही अच्छे ढंग से निभाया या यूं कहा जाए कि सभी ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया।
    सरज़मीने ख़ुर्शीद अहमद रज़ा की एक अन्य फ़िल्म है जिसमें ईरान पर सद्दाम के सैनिकों के आक्रमण के एक अन्य आयाम को दिखाया गया है। सद्दाम के सैनिकों द्वारा ख़ुर्रम शहर के परिवेष्टन की घटना और घायलों को बचाने के लिए ईरानी सेना के जांबाज़ कमान्डर शहीद जहान आरा द्वारा किये गये कारनामों को इस फ़िल्म में बड़े ही अच्छे ढंग से दिखाया गया है। छह लोग परिस्थितियों से विवश होकर एक साथ एकत्रित होते हैं और नगर से भाग खड़े होते हैं। फ़िल्म युद्ध का वास्तविक चित्र पेश करती है यद्यपि इस फ़िल्म में जनसंहार और हृदय विदारक घटनाओं का भी चित्रण किया गया है किन्तु जीवन और अपनों से प्रेम व स्नेह से भरे दृश्य दर्शकों की आंखें भिगा देते हैं। आलोचक इस फ़िल्म के बारे में लिखते हैं कि सरज़मीने ख़ुर्शीद इससे पहले कि युद्ध पर आधारित और पवित्र रक्षा पर बनी फ़िल्म हो, जीवन की प्रशंसा और उसकी रक्षा के संबंध में बनी एक मानवीय फ़िल्म है। संकटमयी परिस्थितियां मनुष्य को जीवन को अधिक से अधिक मूल्यवान बनाने में सहायता करती हैं। फ़िल्म के अंत में एक बच्चे को बचाना वास्तव में अपनों से प्रेम व सहृदयता के माध्यम से मनुष्य की रक्षा करना है और यही प्रेम व स्नेह युद्ध की विषम परिस्थितियों में हर हथियार से अधिक उपयोगी होता है।
    दोएल नामक फ़िल्म का निर्माण वर्ष 2003 में हुआ और यह पवित्र रक्षा के क्षेत्र में सबसे ख़र्चीली फ़िल्म है। इस फ़िल्म में यद्यपि युद्ध के इतिहास के कुछ दृश्यों को दिखाया गया है किन्तु यह फ़िल्म अपने भीतर लोभ व लालच से घृणा पर आधारित वैश्विक संदेश लिए हुए है। इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि ईरान के दक्षिणी नगर का ज़ीनाल नामक एक व्यक्ति जब जेल से स्वतंत्र होता है और अपने क़बीले में वापस आता है तो उस पर विश्वासघात और जासूसी का आरोप लगता है और क़बीले वाले उसे आते जाते इसका ताना देते हैं, जासूसी का आरोप झेलने वाले और उस पर आरोप लगाने वालों के मध्य टकराव, युद्ध के उस संवेदनशील चरण की पुनरावृत्ति का कारण बन जाता है जब उसे गिरफ़्तार किया गया था।
    इस फ़िल्म में अतीत को बहुत ही आकर्षक रूप में पेश किया गया है और वह वर्तमान कहानी का पूरक है। फ़िल्म के निर्देशक ने क़बीले के भीतर के मामलोंपर ध्यान केन्द्रित करके कुछ भावनात्मक संबंधों का चित्रण किया और युद्ध पर आधारित फ़िल्म में नयी जान फूंकने का प्रयास किया ताकि इस प्रकार से वह अपनी फ़िल्म को यादगार बनाने के लक्ष्य को प्राप्त कर लें किन्तु यही नया दृष्टिकोण इस प्रकार से क़बीले के भीतरी मामलों में खो जाता है कि युद्ध के संदर्भ में विचारों को रेखांकित करने के बजाए आशिंक विषयों और महत्त्वहीन घटनाओं का वर्णन ही रह जाता है। यह बात स्पष्ट रूप से कही जा सकती है कि दोएल नामक फ़िल्म का जो भाग दर्शकों को याद रहता है, वह पवित्र प्रतिरक्षा के संवेदनशील चरणों और रणक्षेत्र के दृश्यों, बम धमाकों या रेलगाड़ी में धमाकों के बजाए, उस तिजोरी की घटना है जिसके पीछे कुछ लोग पड़े रहते हैं। अलबत्ता प्रयास यह होता है कि उक्त तिजोरी, रणक्षेत्र में मानवीय विशेषताओं के टकराव के प्रदर्शन का साधन बने किन्तु इसका आयाम अधिक विस्तृत हो जाता है और वह वर्तमान व अतीत दोनों की कहानी को एक साथ जोड़ देती है।
    दूसरे आयाम से फ़िल्म दोएल को वेस्टर्न फ़िल्म समझा जा सकता है क्योंकि इस फ़िल्म में ऐसे कुछ दृश्य पेश किए गये हैं जिसमें वेस्ट्रन फ़िल्म की झलक साफ़ दिखाई देती है। इस फ़िल्म में मरुस्थल, जंगल, अकेला व्यक्ति, आसपास के वातावरण से व्यक्ति का मुक़ाबला, घोड़ा, घोड़ा गाड़ी, अल्पसंख्यकों की प्रतिक्रियाएं जैसे दृश्य देखे जा सकते हैं। इस फ़िल्म का नाम भी इसी प्रकार का है। वास्तव में दोएल नामक फ़िल्म द्वंद्वयुद्ध के दृश्य को पेश करती है और फ़िल्म के हर सीन में इसकी झलक दिखाई देती है और अंत में ज़ीनाल और सिकंदर के मध्य टकराव से यह दृश्य पूरा होता है। वास्तव में यह फ़िल्म युद्ध और पवित्र प्रतिरक्षा का नया रूप पेश करती है और इस फ़िल्म में यह प्रयास किया गया है कि इस प्रकार की फ़िल्मों को आधुनिक रूप देकर नयी पीढ़ी के लिए दर्शनीय बनाया जाए। राजा व प्रजा के मध्य संपर्क, एकपक्षीय प्रेम और एक भले व्यक्ति पर जासूसी और विश्वासघात का आरोप लगाना उन दृश्यों में से है जो दोएल की कहानी को और अधिक रोचक बना देते हैं।
    दरवीश की फ़िल्मों का जनता और आलोचकों की ओर से भव्य स्वागत किया गया है और फ़ज्र अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव जैसे कार्यक्रमों में भी इसे बहुत अधिक सराहा गया है। विभिन्न फ़िल्म उत्सव में दोएल को सात Crystal Simorgh, मुत्वल्लिदे माहे मेहर को तीन क्रिस्टल सिमुर्ग़ और सरज़मीने ख़ुर्शीद को सात क्रिस्टल सिमुर्ग़, कीमिया को तीन क्रिस्टल सिमुर्ग़ प्रदान किए गये। अहमद रज़ा दरवीश ने अभी हाल में एक नई फ़िल्म बनाई जिसका नाम रोज़े रस्ताख़ीज़ है। इस फ़िल्म में आशूर की घटना और इमाम हुसैन व उनके निष्ठावान साथियों की शहादत का चित्रण किया गया है और यह ईरानी सिनेमा जगत की सबसे बड़ी फ़िल्मी परियोजना है। उन्होंने इस फ़िल्म और इस विषय के महत्त्व के बारे में लिखा कि शताब्दियां बीत जाने के बाद कर्बला की अद्वितीय घटना, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय और वैचारिक स्तर पर विभिन्न रूपों में सामने आई है। ईसा मसीह की भांति इमाम हुसैन की प्रतिध्वनि सभी को न्याय, स्नेह, प्रेम, स्वतंत्रता और मानवीय प्रतिष्ठा की शुभसूचना देती है। यद्यपि इमाम हुसैन के शोक में आंसू, इस प्रतीक से वास्तविक लगाव का चिन्ह है किन्तु मेरा मानना है कि इस प्रश्न के उत्तर का महत्त्व कि इमाम हुसैन के अमरत्व का वास्तविक रहस्य क्या है, उन पर मातम और उनका शोक मनाने के महत्त्व से कम नहीं है।
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