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    तयम्मुम की तीसरी सूरत

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    (677) अगर किसी इंसान को पानी इस्तेमाल करने से अपनी जान पर बन जाने या बदन में कोई ऐब या मर्ज़ पैदा होने या मौजूदा मर्ज़ के बढ़ जाने या शदीद हो जाने या इलाज मुआलेजा में दुशवारी पैदा होने का ख़ौफ़ हो तो उसे चाहिए कि तयम्मुम करे। लेकिन अगर पानी के नुक़्सान को किसी तरीक़े से दूर कर सकता हो, मसलन यह कि पानी को गरम करने से नुक़्सान दूर हो सकता हो, तो पानी गरम कर के वज़ु करे और अगर ग़ुस्ल ज़रूरी हो तो ग़ुस्ल करे।

    (678) ज़रूरी नहीं कि किसी इंसान को यक़ीन ही हो कि पानी उसके लिए नुक़्सान दे है। बल्कि अगर नुक़्सान का एहतेमाल भी हो और यह एहतेमाल आम लोगों की नज़रों में सही हो और इस एहतेमाल की वजह से वह ख़ौफ़ ज़दा हो जाये तो तयम्मुम करना ज़रूरी है।

    (679) अगर कोई इंसान आँखों के दर्द में मुबतला हो और उसके लिए पानी नुक़्सान दे हो तो ज़रूरी है कि तयम्मुम करे।

    (680) अगर कोई इंसान नुक़्सान के यक़ीन या ख़ौफ़ की वजह से तयम्मुम करे और उसे नमाज़ से पहले इस बात का पता चल जाये कि पानी उस के लिए नुक़्सानदेह नही है तो उसका तयम्मुम बातिल है और इस बात का पता नमाज़ के बाद चले तो वुज़ू या ग़ुस्ल कर के दोबारा नमाज़ पढ़ना ज़रूरी है।

    (681) अगर किसी को यक़ीन हो कि पानी उसके लिए नुक़्सान दे नही है और वह ग़ुस्ल या वुज़ू कर ले और बाद में उसे पता चले कि पानी उसके लिए नुक़्सान दे था तो उस का वुज़ू और ग़ुस्ल दोनों बातिल हैं।

    तयम्मुम की चौथी सूरत

    (682) अगर किसी इंसान को यह ख़ौफ़ हो कि पानी से वुज़ू या ग़ुस्ल कर लेने के बाद वह प्यास की वज़ह से बेताब हो जायेगा तो ज़रूरी है कि तयम्मुम करे और इस वजह से तयम्मुम के जायज़ होने की तीन सूरतें हैं।

    (1) अगर पानी वुज़ू या ग़ुस्ल करने में ख़र्च कर देने की वजह से इस बात का अंदेशा हो कि उसे फ़ौरी तौर पर या बाद में ऐसी प्यास लगेगी जो उसकी हलाकत या बामारी का सबब बनेगी या जिस का बर्दाश्त करना उसके लिए सख़्त तकलीफ़ का बाइस होगा।

    (2) उसे ख़ौफ़ हो कि जिन लोगों की हिफ़ाज़त करना उस पर बाज़िब है वह कहीं प्यास से हलाक या बीमार न हो जाये।

    (3) अपने अलावा किसी दूसरे की ख़ातिर चाहे वह इंसान हो या हैवान, डरता हो और उसकी हलाकत या बीमारी या बेताबी उसे गरां गुज़रती हो चाहे मोहतरम नुफ़ूस में से हो या ग़ैर मोहतरम नुफ़ूस में से, इन तीनों सूरतों के अलावा किसी और सूरत में पानी होते हुए तयम्मुम करना जायज़ नही है।

    (683) अगर किसी इंसान के पास उस पाक पानी के अलावा जो वुज़ू या ग़ुस्ल के लिए हो, इतना नजिस पानी भी हो जितने की उसे पीने के लिए ज़रूरत हो, तो ज़रूरी है कि पाक पानी पीने के लिए रख ले और तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़े। लेकिन अगर पानी उसके साथियों के पीने के लिए दरकार हो तो वह पाक पानी से वुज़ू या ग़ुस्ल कर सकता है,चाहे उसके साथी प्यास बुझाने के लिए नजिस पानी पीने पर ही मज़बूर हों। बल्कि अगर वह लोग उस पानी के नजिस होने के बारे में न जानते हों या इसी तरह निज़ासत से परहेज़ न करते हों तो लाज़िम है कि पाक पानी को वुज़ू या ग़ुस्ल के लिए सर्फ़ करे, और इसी तरह अगर पानी अपने किसी जानवर या ना बालिग़ बच्चे को पिलाना चाहे तब भी ज़रूरी है कि उन्हें वह नजिस पानी पिलाये और पाक पानी से वुज़ू या ग़ुस्ल करे।

    तयम्मुम की पाँचवीं सूरत

    (684) अगर किसी इंसान का बदन या लिबास नजिस हो और उसके पास बस इतना ही पानी हो कि अगर उससे वुज़ू या ग़ुस्ल करे तो बदन या लिबास धोने के लिए न बचता हो, तो ज़रूरी है कि उस पानी से बदन या लिबास धोये और तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़े। लेकिन अगर उसके पास कोई चीज़ ऐसी न हो जिस पर तयम्मुम करे सके, तो ज़रूरी है कि पानी वुज़ू या ग़ुस्ल के लिए इस्तेमाल करे और नजिस बदन या लिबास के साथ नमाज़ पढ़े।

    तयम्मुम की छटी सूरत

    (685) अगर किसी इंसान के पास ऐसे पानी या बरतन के अलावा, (जिसका इस्तेमाल करना हराम हो) कोई और पानी या बरतन न हो। मसलन जो पानी या बरतन उसके पास हो वह ग़स्बी हो और उसके अलावा उसके पास दूसरा कोई पानी या बरतन न हो तो उसे चाहिए कि वुज़ू और ग़ुस्ल के बजाये तयम्मुम करे।

    तयम्मुम की सातवीं सूरत

    (686) अगर नमाज़ का वक़्त इतना कम रह गया हो कि वुज़ू या ग़ुस्ल करने पर सारी नमाज़ या उसका कुछ हिस्सा वक़्त के बाद पढ़े जाने का इमकान हो, तो इस सूरत में तयम्मुम करना ज़रूरी है।

    (687) अगर कोई इंसान जान बूझ कर नमाज़ में इतनी देर करे कि वुज़ू या ग़ुस्ल का वक़्त बाक़ी न रहे तो वह गुनाह का मुर्तकिब होगा, लेकिन तयम्मुम के साथ उसकी नमाज़ सही है। अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस नमाज़ की क़ज़ा भी बजा लाये।

    (688) अगर किसी को शक हो कि अगर वुज़ू या ग़ुस्ल किया गया तो नमाज़ का वक़्त बाक़ी रहेगा या नहीं, तो ज़रूरी है कि वह तयम्मुम करे।

    (689) अगर किसी इंसान ने वक़्त की तंगी की वज़ह से तयम्मुम किया हो और नमाज़ के बाद वुज़ू कर सकने के बावुज़ूद न किया हो, और जो पानी उसके पास हो वह बर्बाद हो गया हो, और इस सूरत में उसका फ़रीज़ा तयम्मुम हो, तो ज़रूरी है कि आइंदा नमाज़ों के लिए दोबारा तयम्मुम करे चाहे वह तयम्मुम जो उस ने किया था बातिल न हुआ हो।

    (690) अगर किसी इंसान के पास पानी हो, लेकिन वह वक़्त की तंगी के वजह से तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़ने लगे और नमाज़ के दौरान जो पानी उसके पास था वह ज़ाय हो जाये और अगर उसका फ़रीज़ा तयम्मुम हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि बाद की नमाज़ों के लिए दोबारा तयम्मुम करे।

    (691) अगर किसी के पास इतना वक़्त हो कि वह वुज़ू या ग़ुस्ल कर के नमाज़ को उस के मुस्तहब अफ़आ़ल जैसे, इक़ामत और क़ुनूत, के बग़ैर पढ़ सकता हो तो ज़रूरी है कि ग़ुस्ल या वुज़ू करे और नमाज़ को उसके मुस्तहब अफ़आ़ल के बग़ैर पढ़े। बल्कि अगर सूराह पढ़ने के लिए भी वक़्त न बचता हो तो ज़रूरी है कि ग़ुस्ल या वुज़ू करे और हम्द के बाद कोई सूरह पढ़े बग़ैर नमाज़ पढ़े।