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    तयम्मुम की दूसरी सूरत:

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    (672) अगर कोई इंसान बुढ़ापे या कमज़ोरी की वज़ह से या चोर डाकू और जानवर वग़ैरा के ख़ौफ़ से या कुवें से पानी निकालने के वसाइल मयस्सर न होने की वहज से पानी हासिल न कर सकता हो तो उसे चाहिए कि तयम्मुम करे। और अगर पानी मुहिय्या करने या उसे इस्तेमाल करने में उसे इतनी तकलीफ़ उठानी पड़े जो नाक़ाबिले बरदाश्त हो, तो इस सूरत में भी यही हुक्म है। लेकिन आख़री सूरत में अगर तयम्मुम न करे और वुज़ू करे तो उस का वुज़ू सही होगा।

    (673) अगर कुवें से पानी निकालने के लिए डोल और रस्सी वग़ैरा ज़रूरी हों और वह इंसान उन्हें ख़रीदने या किराये पर लेने के लिए मज़बूर हो तो चाहे उनकी क़ीमत आम भाव से कई गुना ज़्यादा ही क्यों न हो, उसे चाहिए कि उन्हें हासिल करे। और अगर पानी अपनी असली क़ीमत से महंगा बेचा जा रहा हो तो उसके लिए भी यही हुक्म है। लेकिन अगर उन चीज़ों के हासिल करने पर इतना ख़र्च होता हो कि उस की जेब इज़ाज़त न देती हो तो फिर उन चीज़ों का हासिल करना वाजिब नहीं है।

    (674) अगर कोई इंसान मज़बूर हो कि पानी हासिल करने के लिए क़र्ज़ ले तो क़र्ज़ लेना ज़रूरी है। लेकिन जिस इंसान को इल्म हो या गुमान हो कि वह अपने क़र्ज़े की अदायगी नही कर सकता, उस के लिए क़र्ज़ लेना वाजिब नही है।

    (675) अगर कुवाँ खोदने में कोई कठिनाई न हो तो ऐसे इंसान को चाहिए कि पानी हासिल  करने के लिए कुवाँ खोदे।

    (676) अगर कोई इंसान बग़ैर एहसान रखे कुछ पानी दे तो उसे क़ुबूल कर लेना चाहिए।