islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. तालीम

    तालीम

    Rate this post

    बच्चे का पहला स्कूल मां की गोद होती है और मां अपने बच्चे को अच्छी तालीम देने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ती। तीन साल का बच्चा हुआ नहीं कि उसे स्कूल भेजना शुरु कर दिया जाता है। पैरेन्टस अपने बच्चे को अच्छे से अच्छे स्कूल में पढ़ाते हैं और चाहते हैं कि बच्चा बड़ा हो कर उन का नाम रौशन करे।

    वह नहीं चाहते कि उन का बच्चा किसी से पीछे रहे और इसी चाहत से वह उसे दुनियावी तालीम देने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते क्यों कि वह जानते हैं कि दुनियावी तालीम बहुत ज़रूरी है और इस में कोई भी कमी रखी तो बच्चे को बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। यहाँ में आप को एक वाक़ेआ बताना चाहता हूँ।
    एक आदमी था जिस ने अपने बच्चे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं रखी थी। उसे ख़ूब पढ़ाया और उनका बच्चा बड़ा हो कर एक नेक डॉक्टर बना। बेटे को देख कर बाप बहुत ख़ुश हुए और होते भी क्यों न, उनका बेटा जो डॉक्टर बन गया था। लोगों ने उन्हें मुबारकबाद दी। कुछ महीने बाद बाप का इंतेक़ाल हो गया, जब लोग सूरए फ़ातेहा पढ़ने लगे तो देखा उनका बेटा रोते हुए इधर-उधर देख रहा था क्यों कि उसे सूरए फ़ातेहा पढ़नी नहीं आती थी।
    मैं इस वाक़ेए से सिर्फ़ इतना कहना चाह रहा हूँ कि कहीं आप अपने बच्चे को अधूरी तालीम तो नहीं दे रहे हैं यानी आप उसे दुनियावी तालीम तो दे रहे हैं मगर दीनी तालीम? क्या यह सही है? याद रखीए अगर आप अपने बच्चे को दुनियावी तालीम के साथ दीनी तालीम देंगी तो उसे हमेशा सही और ग़लत पता होगा जैसे कि वह जानता होगा कि झूट बोलना, ग़ीबत करना, शराब पीना यह सब हराम है और मरने के बाद इसकी सख़्त सज़ाएं हैं तो बच्चा कभी भी ग़लत रास्ता नहीं चुनेगा।
    बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं कि जिन पर नमाज़ वाजिब है पर उन्हें नमाज़ आती ही नहीं है। लड़की पर नौ साल और लड़के पर पंद्रह साल पर नमाज़ वाजिब होती है इसी लिए पैरेन्टस का फ़र्ज़ है कि वह बच्चों को बालिग़ होने से पहले ही नमाज़ का पाबन्द बना दें ताकि जब उस पर नमाज़ वाजिब हो तो वह पाबन्दी से नमाज़ पढ़े। और अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो अल्लाह के यहां जाकर इसका जवाब बच्चों के साथ-साथ पैरेन्टस को भी देना होगा। हम जानते हैं कि जितनी दुनियावी तालीम ज़रूरी है उस से कहीं ज़्यादा दीनी तालीम ज़रूरी है क्यों कि दुनियावी तालीम सिर्फ़ दुनिया में काम आती है लेकिन दीनी तालीम दुनिया व आख़िरत दोनों जगह काम आती है।
    आप अपने बच्चों को पांच घंटे स्कूल भेजते हैं लकिन एक घंटा मदरसे नहीं भेज सकते आख़िर क्यों? अगर आप अपने बच्चों को दुनियावी तालीम के साथ दीनी तालीम भी बताते हैं तो बच्चा चाहे जितना बड़ा हो जाए कभी भी गुमराह नहीं होगा और उसके किए गए नेक अमल का सवाब आपको भी मिलेगा अब फैसला आप पर है कि क्या आप अपने बच्चे को अधूरी तालीम देना पसंद करेंगे?
    इल्म की तकसीम नहीं है:- यह समझना जरूरी है कि इस्लाम ने दीनी और दुनियावी इल्म की कोई तकसीम नहीं की है। हर किस्म का इल्म और हुनर और हर फन मुसलमानों को हासिल करना चाहिए। जिससे खुदा की मार्फ़त हासिल हो। आदमी को अच्छे काम करने में मदद मिले जिससे लोगों के हुकूक़ का पता चले। इस्लामी तहजीब और तमद्दुन मालूम हो और हर वह इल्म हासिल करे जिससे हलाल रोजी हासिल करने में मदद मिले। मुसलमान किसी भी तालीम के शोबे में पीछे रहे यह अल्लाह के नबी को पसंद नहीं है। आप ने मुख्तलिफ पेशे सीखने का हुक्म दिया और हौसला अफजाई फरमाई। मुख्तलिफ जबानों के सीखने पर जोर दिया।