islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. दफ़्न के अहकाम

    दफ़्न के अहकाम

    Rate this post

    620. मैयित को ज़मीन में इस तरह दफ़्न करना वाजिब है कि उसकी बू बाहर न आये और दरिन्दे उसका बदन बाहर न निकाल सकें। अगर ख़तरा हो कि दरिन्दें बदन को निकाले ले जायेंगे तो क़ब्र को ईंटो से पक्का कर देना चाहिए।

    621. अगर मैयित को दफ़्न करना मुमकिन न हो तो उसे किसी कमरे या ताबूत में रखा जा सकता है।

    622. मैयित को क़ब्र में दाहिनी करवट से इस तरह लिटाना चाहिए कि उसका सामने का हिस्सा क़िबला रुख़ हो।

    623. अगर कोई इंसान पानी के जहाज़ में मर जाये और उसकी मैयित के खराब होने का ख़तरा न हो और उसे जहाज़ में रखने में भी कोई रुकावट न हो तो खुश्की में पहुँच कर उसे ज़मीन में दफ़्न करना चाहिए। अगर यह मुमकिन न हो तो ग़ुस्ल, हनूत, कफ़न और नमाज़ के बाद उसे एक चटाई में लपेट कर और चटाई का मुँह बंद करके उसे समुन्द्र में डाल देना चाहिए। या कोई भारी चीज़ उसके पैरों में बाँध कर उसे पानी में छोड़ देना चाहिए। जहाँ तक मुमकिन हो उसे ऐसी जगह डालना चाहिए जहाँ वह फ़ौरन जानवरों का लुक़मा न बन सके।

    624. अगर दुश्मन के ज़रिये क़ब्र खोदे जाने और मैयित को बाहर निकाल कर उसके नाक, कान या दूसरे अंग काटे जाने का ख़तरा हो तो इस सूरत में अगर मुमकिन हो तो मसला न. 623 में बयान किये गये तरीक़े के मुताबिक़ मैयित को समुन्द्र में डाल देना चाहिए।

    625. अगर मैयित को समुन्द्र में डालना या उसकी क़ब्र को पक्का करना ज़रूरी हो तो उसके ख़र्च को मैयित के अस्ल माल से ले सकते हैं।

    626. अगर कोई काफ़िर औरत मर जाये और उसके पेट में मरा हुआ बच्चा हो और उस बच्चे का बाप कोई मुसलमान हो तो उस औरत को क़ब्र में बाईं करवट से किबले की तरफ़ पीठ करके, इस तरह लिटाना चाहिए कि बच्चे का मुँह क़िबले की तरफ़ हो जाये। अगर पेट में मौजूद बच्चे के बदन में अभी जान न पड़ी हो तब भी एहतियाते मुस्तहब की बिना पर यही हुक्म है।

    627. मुसलमानों को काफ़िरों के क़ब्रिस्तान में और काफ़िरों को मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़्न करना जायज़ नही है।

    628. मुसलमान को ऐसी जगह पर दफ़्न करना जायज़ नही है जहाँ पर उसकी बेहुरमती होती हो जैसे कूड़ा व गंदगी फेंके जानी वाली जगह।

    629. मैयित को गस्बी व ऐसी ज़मीन में दफ़्न करना जायज़ नही है जो किसी दूसरे काम के लिए वक़्व की गई हो, जैसे मस्जिद वग़ैरा के लिए वक़्फ़ की गई ज़मीन।

    630. किसी मैयित की क़ब्र खोद कर उसमें दूसरे मुर्दे को दफ़्न करना जायज़ नही है, लेकिन अगर क़ब्र इतनी पुरानी हो गई हो कि पहली मैयित का निशान बाक़ी न रहा हो तो दफ़्न कर सकते हैं।

    631. मैयित के बदन से जो हिस्से जुदा हो गये हों, चाहे वह उसके बाल, नाख़ुन या दाँत ही हों, उन्हें उसके साथ दफ़्न कर देना चाहिए। अगर मैयित से जुदा हुए हिस्से मैयित को दफ़्न करने के बाद मिलें तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उन्हें किसी दूसरी जगह दफ़्न कर देना चाहिए। जो नाख़ुन या दाँत इंसान की ज़िंदगी में उससे जुदा हो जायें, उन्हें दफ़्न करना मुस्तहब है।

    632. अगर कोई इंसान कुवें में डूब कर मर जाये और उसे बाहर निकालना मुमकिन न हो तो उस कुवें का मुँह बंद करके उसे ही उसकी क़ब्र क़रार देना चाहिए।

    633. अगर कोई बच्चा माँ के पेट में मर जाये और उसका पेट में रहना माँ की ज़िंदगी के लिए खतरनाक हो तो उसे सबसे आसान तरीक़े से बाहर निकाल लेना चाहिए। अगर बच्चे को बाहर निकालने के लिए उसके टुकड़े टुकड़े करने पर मजबूर हों तो ऐसा करने में भी कोई हरज नही है। अगर उस औरत का शौहर अहले फ़न हो तो वह बच्चे को बाहर निकाले और अगर यह मुमकिन न हो तो कोई अहले फ़न औरत बच्चे को बाहर निकाले और अगर यह भी मुमकिन न हो तो कोई ऐसा महरम मर्द निकाले जो अहले फ़न हो और अगर यह भी मुमकिन न हो तो अहले फ़न नामहरम मर्द यह काम करे और अगर यह भी मुमकिन न हो तो फिर वह इंसान भी बच्चे को बाहर निकाल सकता है जो अहले फ़न न हो।

    634. अगर माँ मर जाये और बच्चा उसके पेट में ज़िन्दा हो (अगरचे बच्चे के ज़िन्दा रहने की उम्मीद न भी हो तब भी) तो ज़रूरी है कि हर उस जगह को चाक किया जाये जो बच्चे की सलामती के लिए बेहतर हो और बच्चे को बाहर निकालने के बाद उस जगह को टाँके लगा देने चाहिए।