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    दस मोहर्रम के सायंकाल को दो भाईयो की पश्चाताप 4

    दस मोहर्रम के सायंकाल को दो भाईयो की पश्चाताप 4
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    पुस्तक का नामः पश्चाताप दया की आलंग्न

    लेखकः आयतुल्ला हुसैन अंसारीयान

     

    ईश्वर दूत प्रत्येक समय मे आशा की किरन द्वारा ग़ैब की बातो से पर्दा हटने की प्रतीक्षा मे रहते थे, नई किरन से निराश नही होते थे, यहा तक के अंतिम समय मे भी पापी के अंतिम सांस को मुजरिम के साथ हिसाब नही करते  जब तक पूर्णरूप से मुजरिम जुर्म ना कर ले, ईश्वर की ओर से एक नई इनायत की प्रतीक्षा मे रहते है, क्योकि ईश्वर की विशेष इनायत सबसे छुपी है।

    ईश्वर दूत हज़रत याक़ूब ने एक विचित्र जुदाई को सहन किया, कई वर्ष बीत गए यहा तक कि आपकी आंखे सफ़ेद हो गई, किन्तु जनाबे युसुफ़ से समबंधित कोई समाचार प्राप्त नही हुआ, भेड़िये के खा लेने का समाचार सुनने के साथ साथ अपने गुमशुदा युसुफ़ की वापसी के लिए ईश्वर से आशा लगाए रहे।

    इसी प्रकार इन दोनो जंगजुओ (दोनो भाईयो) की आत्मिक क्रांति को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सेवा मे जाकर उत्तर मिला कि ईश्वर के प्राणीयो के मार्गदर्शन की आशा सही और बजा थी, बोध होता है कि ख़ून के प्यासे शत्रुओ के बीच भी हिदायत का प्रकाश चमक सकता है।

    एक ओर इन दो भाईयो की क्रांति से एक विचित्र तथा अमूल्य आशा का पैदा होना, दूसरी ओर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के दरबार से सर्वोत्त्म दया एंव कृपा की आशा, इसलामी प्रचारको के लिए बेहतरीन उदाहरण है, बस इन दोनो भाईयो की सरिश्त एंव तबीयत मे कुच्छ भी हो लेकिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बीस वर्षो से अधिक चली आ रही दुश्मनी के बावजूद अंतिम समय मे पश्चाताप करके इमाम अलैहिस्सलाम की ओर आ गए और हज़रत युसुफ़ के समान अंधकार का पर्दा चाक करते हुए प्रकट हुए।