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    दस मोहर्रम के सायंकाल को दो भाईयो की पश्चाताप 7

    दस मोहर्रम के सायंकाल को दो भाईयो की पश्चाताप 7
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    पुस्तक का नामः पश्चाताप दया की आलंग्न

    लेखकः आयतुल्ला हुसैन अंसारीयान

     

    जी हा, हे इस्लाम के प्रचारको ! तुम से इस आशा की किरन को कही कोई छीन ना ले, विभिन्न स्थानो पर सामने आने वाली समस्याओ से निराश ना होना, तुम्हारे हालात हज़रत मुहम्मद सललल्लाहोअलैहेवाआलेहिवसल्लम के ज़माने से अधिक कठिन नही है।

    कहते है कि शेख मुहम्मद अब्द (अहले सुन्नत का एक प्रसिद्ध विद्वान) ने एक बैठक मे कहाः मै इस्लामी राष्ट्र की इसलाह से निराश हो चुका हूं, उसी समय एक महिला ने उत्तर दियाः ऐ शेख आपकी ज़बान पर निराशा के शब्द से मुझे अत्यधिक आश्चर्य है उस समय शेख बहुत अधिक शर्मिंदा हुए उन्होने तुरंत ही पश्चाताप किया तथा उस महिला की बात को स्वीकार किया।

    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मे अपने नाना के अलावा दूसरे सभी ईश्वर दूतो एंव धार्मिक नेताओ से अधिक आशा की किरन मौजूद थी, आप उड़ान की ऊंचाईयो तथा अस्तित्व की अमीक़ गेहराईयो पर नज़र रखते थे, आशा का संदेश इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से लीजिए, क्योकि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के संदेश से आप को साहस प्राप्त होगा।

    ऐ हमारे मोला एंव आक़ा हुसैन अलैहिस्सलाम आप पर हमारे प्राण निछावर हो जाएं यदि आप को प्रत्येक मैदान मे आवाज़ लगाई जाए तो व्यर्थ ना होगा, आप के वजूद से प्रचारको को पाठ मिलता है, आप से खोज एंव प्रयास की कसोटी सीखने को मिलती है, हमे मिस्र के बादशाह और उसके गवर्नर से कोई लेना देना नही है, आप ने क़ुरबानी और प्राणो की बाज़ी लगाने का पाठ सिखाया, केवल अपनो ही ने नही बल्कि दूसरो ने भी आप के पवित्र अस्तित्व से यह पाठ पढ़ा और सीखा है, आप की जबान से दिव्य रहस्यो को सुनना चाहिए, आप ने ईश्वर दूतो से अधिक धैर्य का परिचय दिया, आप की गली से सुबह की हवा के झोंके आ रहे है, यहा तक कि रक्तपात करने वाली तलवार भी आप से मार्गदर्शिता प्राप्त कर लेती है।