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    दुबला दरवेश

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    प्राचीन काल में दो दरवेश एक दूसरे के गहरे मित्र थे। उन दोनों के बीच इतनी घनिष्ठता थी कि लोग उनके बारे में कहते थे कि यह दो शरीरों में एक आत्मा के समान हैं। उनमें से एक मोटा और पेटू था तथा कभी भी उसका पेट नहीं भरता था किंतु दूसरा दरवेश दुबला-पतला था। वह कम खाता था बल्कि किसी किसी दिन तो उसका खाने का मन ही नहीं करता था। पेटू दरवेश का कभी पेट ही नहीं भरता था और दुबले पतले दरवेश को भूख ही नहीं लगती थी और तीन चार निवालों में ही उसका पेट भर जाता था। काम के समय भी वह बहुत अधिक काम करता था जबकि मोटा दरवेश आलसी था और अधिकतर सोता रहता था। एक दिन दोनों को लम्बी यात्रा पर जाना पड़ा। काफ़ी लम्बा मार्ग तै करने के बाद वे दोनों बहुत थकी हुई अवस्था में एक नगर के द्वार पर पहुंचे और वहां पर संयोग से जासूसी के आरोप में गिरफ़्तार कर लिए गए। दोनों को एक घर में बंदी बना कर रखा गया। वहां से भागने का कोई मार्ग नहीं था। घर के सभी दरवाज़े और खिड़कियां मज़बूती से बंद कर दिए गए थे केवल छत पर हवा और प्रकाश के लिए एक छोटा सा रौशनदान था।दोनों दरवेश बेचारे यह तक नहीं जानते थे कि उन्हें किस अपराध में क़ैद किया गया है। उन्हें बस किसी सिपाही से यह सुनने को मिला था कि दोनों पर जासूसी का आरोप है। मोटे दरवेश को बहुत अधिक भूख लगी हुई थी। उसने कहा कि अरे हम कहां और जासूसी कहां? दुबला पतला दरवेश बहुत अधिक प्यासा था और काफ़ी पैदल चलने के कारण उसके पैरों में दर्द हो रहा था। उसने अपने पैरों को दबाते हुए कहा कि हमारा हुलिया कहीं से भी जासूसों जैसा नहीं लगता। पता नहीं किस मूर्ख ने हमारे बारे में यह बात उड़ा दी है कि हम जासूस हैं। ईश्वर हमारी रक्षा करे। पता नहीं हमें इस क़ैद से छुटकारा मिलेगा भी या नहीं। मोटे दरवेश ने कहा कि नहीं भई हमें शीघ्र ही मुक्त कर दिया जाएगा। जब जांच की जाएगी और यह पता चल जाएगा कि हम निर्दोष हैं तो हमें छोड़ दिया जाएगा। दूसरे दरवेश ने कहा कि यह बात उतनी सरल नहीं है जितनी तुम समझ रहे हो। मोटे दरवेश ने कहा कि सच कहते हो। यदि कोई हमारी शत्रुता में यह गवाही दे दे कि हम जासूस हैं तो फिर कौन हमें निर्दोष सिद्ध करेगा। दुबले पतले दरवेश ने कहा कि कोई भी नहीं, और मैं इसी बात से चिंतित हूं। हमने तो अब तक जासूसी के बारे में सोचा भी नहीं था और इस आरोप में धर लिए गए हैं, यदि बात आरोप से आगे बढ़ी और यह सिद्ध कर दिया गया कि हम जासूस हैं तो निश्चित रूप से हमें फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा। संभव है कि हमारे मारे जाने के बाद उन्हें पता चले कि हम निर्दोष थे किंतु उस समय उसका कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि हम तो मर चुके होंगे।वे दोनों अभागे दरवेश, जो जासूसी के बारे में कुछ जानते ही नहीं थे और वास्तव में निर्दोष थे, उस अन्धकारमयी कारावास में बड़े दुखी और असहाय से रहने लगे। उनकी समझ में नहीं आता था कि क्या करें। वे जितना भी चीख़ते-चिल्लाते और दीवारों पर हाथ मारते कोई भी उनकी आवाज़ नहीं सुनता था। वे निराशा के साथ चुप हो जाते और प्रतीक्षा करते कि शायद ईश्वर की कृपा हो जाए और उन्हें उस कारावास से मुक्ति मिल जाए। निराशा उन्हें मौत से पहले ही न मार दे इस लिए वे अपने मन में विभिन्न प्रकार की निराधार आशाएं पाले हुए थे और कहते थे कि संभव है कि निर्दोष व्यक्ति फांसी के फंदे तक तो जा सकता है किंतु फांसी पर नहीं चढ़ सकता है और क्या पता कल हर बात हमारे हित में हो जाए और हमें छोड़ दिया जाए।वे दोनों एक दूसरे से इसी प्रकार की बातें किया करते थे किंतु कोई भी उनकी बातों को नहीं सुनता था। दुबला पतला दरवेश कहता था कि यदि मुझे मुक्ति मिल जाए तो मैं इस तरह सरपट भागूंगा कि हवा भी मुझे छू नहीं पाएगी और मैं पलट कर भी नहीं देखूंगा और पलट कर कभी इस नगर में नहीं आऊंगा। मोटा दरवेश कहता कि मैं भी कभी इस नगर में पलट कर नहीं आऊंगा चाहे पूरे संसार की खाने-पीने की वस्तुएं इस नगर में हों और मुझे निःशुल्क दे दी जाएं तब भी मैं नहीं लौटूंगा।इसी प्रकार दो सप्ताह का समय बीत गया और वे दोनों अभागे दरवेश इस दौरान उसी अंधकारमयी कारावास में रहे। दो सप्ताहों के बाद पता चला कि वे दोनों निर्दोश हैं। कारावास का दरवाज़ा खोला गया, मोटा दरवेश मर चुका था जबकि उसका दुबला मित्र जीवित था। कारावास के निकट एकत्रित होने वाले लोग एक दूसरे से पूछ रहे थे कि यह दुबला व्यक्ति किस प्रकार भूख-प्यास सहन करके इतने दिनों तक जीवित रह गया, इन अभागों को एक दिन के अंतराल से सूखी रोटी का एक छोटा सा टुकड़ा और बहुत कम पानी दिया जाता था, कोई भी होता तो इन दो सप्ताहों में भूख और प्यास से मर गया होता। दुबला पतला दरवेश जो जीवित बच गया था, अपने मित्र की मृत्यु पर विलाप कर रहा था। वह यह सोच रहा था कि अंततः उसका मित्र एक निराधार आरोप के चलते मारा गया। अब जब इन लोगों को पता चल गया है कि हम निर्दोष हैं तो ये किस प्रकार उससे क्षमा मांग सकते हैं?किंतु लोग तो केवल उस मोटे व्यक्ति के मरने और दुबला व्यक्ति के जीवित बच जाने के बारे में बातें कर रहे थे और जिस विषय के बारे में कोई भी नहीं सोच रहा था, वह यह था कि वह अभागा मोटा दरवेश, निर्दोष मारा गया था। उसी भीड़ में एक ज्ञानी भी था। जब उसने लोगों की बातें सुनीं तो आगे बढ़कर कहा कि यदि इसके विपरीत होता तो अचरज की बात होती। वह मोटा व्यक्ति बहुत अधिक खाता था अतः उससे भूख सहन नहीं हुई और वह मर गया जबकि यह दुबला व्यक्ति, संयमी था और निश्चित रूप से इसने अपनी आदत के अनुसार संयम से काम लिया और जीवित बच गया।

    कहावत

    फ़ारसी की एक कहावत है कि दाख़िलेमून ख़ुदेमून रा कुश्त व बीरूनेमून मर्दुम रा, जिसका तात्पर्य है, विदित रूप से किसी रोचक वस्तु को देख कर उससे ईर्ष्या करना किंतु उसे प्राप्त करने में आने वाली कठिनाइयों की अनदेखी कर देना। तो आइये इस कहावत से संबंधित कहानी सुनते हैं।एक व्यक्ति का एक बहुत बड़ा बाग़ था। उसके बाग़ में हर प्रकार के फल का पेड़ मौजूद था। उसने अपने बाग़ की भली भांति देख-भाल के लिए बाग़ ही में एक घर बना लिया था और वह उसी में रहता था। उसके सौ से अधिक नौकर थे जो बाग़ की देख-भाल में उसकी सहायता करते थे। जो भी दूर से उसे, उसके बाग़ और उसके नौकरों को देखता था तो यही सोचता था कि कितना भाग्यशाली है वह, कितने अच्छे स्थान पर जीवन बिता रहा है और कितना अधिक धन है उसके पास। बाग़बानी करने वाले उसके मित्र और उससे थोक में फल ख़रीदने वाले छुट्टियों में उससे मिलने आते थे। वे जब भी उसके बाग़ में जाते तो या तो उसे विभिन्न प्रकार के रंग बिरंगे फलों से लदा हुआ पाते या फिर पेड़ों पर फूल लगे होते और वे फल देने के लिए तैयार होते। वे एक दो दिन बाग़ के भीतर बने हुए घर में रहते और मीठी-2 यादें लिए हुए नगर वापस चले जाते। उस व्यक्ति के मित्र सदैव उससे कहते थे कि कितने भाग्यशाली हो तुम, सुबह जब तुम सोकर उठते हो तभी से रात तक फूल, पेड़, फल और हरियाली देखते हो, न तो तुम्हें नगर के प्रदूषण का सामना करना पड़ता है और न ही कोई अन्य कठिनाई उठानी पड़ती है।वह व्यक्ति पेड़ों की देख-भाल में आने वाली कठिनाइयों के बारे में बताता और कहता कि यदि एक दिन भी देर से वर्षा हो या अधिक वर्षा हो जाए या इसी प्रकार शीतकाल और ग्रीष्मकाल के आने जाने में जल्दी या विलम्ब हो जाए तो ऐसी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं जिनकी क्षति पूर्ति नहीं की जा सकती। वह इस संबंध में जितनी भी बात करता, उसके मित्र समझ ही नहीं पाते थे। वह व्यक्ति जानता था कि समुद्र में जा चुका व्यक्ति ही चक्रवात के संकट का अनुमान लगा सकता है और जिन लोगों ने बाग़ में काम नहीं किया है और केवल फलों और फूलों को देखा है वे इस काम की कड़ाई और कठिनाई को नहीं समझ सकते। इसी कारण वह अपने मित्रों और मिलने जुलने वालों से इस संबंध में बहुत अधिक बात नहीं करता था।एक वर्ष शीत ऋतु जल्दी समाप्त हो गई अतः वसंत ऋतु से पूर्व ही फलों के पेड़ों पर फूल लग गए किंतु अभी वसंत ऋतु का पहला महीना भी समाप्त न हुआ था कि पुनः ठंडक पड़ने लगी। तेज़ हवाओं, वर्षा और ओलों ने पेड़ों पर आक्रमण कर दिया। कोमल फूल, जो तेज़ हवाओं की शक्ति और ओलों की मार सहन करने की क्षमता नहीं रखते थे, बहुत जल्दी टहनियों से अलग हो कर धरती पर गिर पड़े। टहनियां, जो अपनी शीतकालीन नींद से जागी ही थीं कि उन्हें ठंडक लगने लगी और वे पुनः सो गईं। ठंडक के इस अल्पकालीन आक्रमण के बाद किसी भी पेड़ पर न तो पत्ता उगा और न ही फूल लगा और जिस पेड़ पर फूल नहीं लगते उसमें फल भी नहीं उगते।उस वर्ष उस व्यक्ति से थोक में फल ख़रीदने वालों ने बहुत अधिक प्रतीक्षा की कि उनके मित्र के फल नगर में आएं किंतु ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे मित्र पर कोई संकट आ गया हो? इसके बाद वे सब इकट्ठे हो कर अपने मित्र के बड़े बाग़ में पहुंचे। जब उन्होंने बाग़ को देखा तो उनके मुंह आश्चर्य से खुले रह गए। बाग़ एकदम ख़ाली पड़ा था। न तो फल थे, न फूल थे और न ही पत्ते। बाग़ में काम करने वाले मज़दूर दुखी चेहरों के साथ पेड़ों के नीचे बैठे थे। बाग़ का मालिक भी एक कोने में बैठा हुआ यह सोच रहा था कि वह इतने सारे नौकरों का वेतन किस प्रकार से देगा? उसके मित्र बड़े दुख के साथ उसके निकट पहुंचे और पूछा कि क्या हुआ? क्यों इतने दुखी दिखाई दे रहे हो? तुम्हारे बाग़ को क्या हुआ है? उसने अपने मित्रों को पूरी बात बताई और कहा कि मैंने बड़ी मेहनत की ताकि मेरा बाग़ पतझड़ और शीत ऋतु से सुरक्षित निकल जाए, बाग़ की देख भाल के लिए कई रातें मैं सोया भी नहीं किंतु दो तीन दिन के लिए मौसम ठंडा हो गया और मैंने जितनी मेहनत की थी और बाग़ पर जितना पैसा ख़र्च किया था सब बेकार हो गया। तुम लोग देख रहे हो कि मेरा बाग़ अपनी सुंदरता के चलते बाहर से लोगों की हत्या करता है और भीतर से हम लोगों की हत्या कर रहा है। बाहर से सभी को इस प्रकार के बाग़ की लालसा होती है बल्कि वे इस संबंध में ईर्ष्या भी करते हैं किंतु भीतर से इसमें इतनी समस्याएं और कठिनाइयां हैं कि कभी कभी हमारी स्थिति ऐसी हो जाती है जैसी तुम लोग इस समय देख रहे हो।उसी के बाद से ऐसे अवसर पर जब कोई विदित रूप से किसी रोचक वस्तु या स्थिति को देख कर उससे ईर्ष्या करता है किंतु उसे प्राप्त करने में आने वाली कठिनाइयों की अनदेखी करता है तो कहते हैं, दाख़िलेमून ख़ुदेमून रा कुश्त व बीरूनेमून मर्दुम रा।