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    दूसरों के साथ व्यवहार का महत्व

    दूसरों के साथ व्यवहार का महत्व
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    इंसान के जीवन में दूसरों के साथ लेन देन बहुत महत्वपूर्ण विषय है। इंसान के सामाजिक जीवन को बेहतर बनाने में सामाजिक संबंध बहुत महत्वपूर्ण हैं। इंसान एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक होने की मांग यह है कि इंसान अपने सामाजिक दायित्वों को पहचाने और उसे ठीक तरह से अंजाम दे। ईश्वरीय धर्म इस्लाम ने भी इस महत्वपूर्ण विशेषता पर बहुत ध्यान दिया है। इस्लाम धर्म के बहुत से आदेश सामाजिक संबंधों से विशेष हैं।

    चूंकि अनुचित व्यवहार से इंसान के सामाजिक संबंध खराब हो सकते हैं और वह दिग्भ्रमित हो सकता है इसलिए महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने पवित्र कुरआन की बहुत सी आयतों में अनुचित कार्यों की ओर संकेत किया है और उन्हें स्वस्थ समाज एवं सामाजिक संबंधों के विघटन का महत्वपूर्ण कारण बताया है। इस आधार पर इस्लाम धर्म की बहुत सी शिक्षाओं में उचित और अनुचित कार्यों को बयान किया गया है और जो कार्य उचित नहीं हैं उनसे रोका गया है।

    जैसाकि आप जानते हैं कि सामाजिक संबंधों का जारी व बाकी रहना आपसी समझ बूझ, प्रेम और एक दूसरे के सम्मान पर निर्भर है। इस आधार पर मनुष्य वह व्यवहार को अंजाम देने पर बाध्य है जिसे वह चाहता है कि दूसरे भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार करें। अगर वह सच्चाई को पसंद करता है और वफादारी को पसंद करता है और अपने वचनों के प्रति कटिबद्ध रहना चाहता है तो उसे चाहिये कि वह स्वयं भी इन चीज़ों पर अमल करे और उसके बाद इस बात की अपेक्षा करे कि दूसरे भी उसके साथ इस प्रकार का व्यवहार करेंगे। अगर उसे यह अपेक्षा है कि लोग उसके साथ भलाई से पेश आयें तो वह स्वयं दूसरों के साथ भलाई से पेश आये। अगर वह यह चाहता है कि कोई उस पर अत्याचार न करे तो वह स्वयं भी दूसरों पर अत्याचार न करे दूसरों के अधिकारों का सम्मान करे और इस संबंध में उसे अग्रणी होना चाहिये।

    पवित्र कुरआन ने इस बात की आलोचना की है कि इंसान सामाजिक दायित्वों का निर्वाह न करे और दूसरों से उसे अंजाम देने की अपेक्षा रखे। पवित्र कुरआन उसे ग़ैर बुद्धिमत्ता का चिन्ह मानता है। पवित्र कुरआन के सूरये बक़रह की ४४वीं आयत में महान ईश्वर कहता है” क्या लोगों को अच्छे कार्य का आदेश देते हो और स्वयं को भूल गये हो जबकि तुम किताब पढ़ते हो क्या तुम लोग सोचते नहीं?

    तो इस बात को हमें जान लेना चाहिये कि समाज के हर सदस्य पर कुछ दायित्व हैं जिसे हर व्यक्ति को चाहिये कि उसे अंजाम दे और उस चीज को अंजाम देना जिसे वह दूसरों से अपेक्षा रखता है यह समाज के हर व्यक्ति का न्यूनतम अधिकार है। हज़रत इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम से मोमिन का मोमिन पर अधिकार के बारे में पूछा गया तो आपने फरमायाः तुम्हारे मोमिन भाई का तुम पर न्यूनतम अधिकार यह है कि तुम जो चीज़ अपने लिए पसंद नहीं करते हो उसे उसके लिए भी पसंद न करो”

    जिन चीजों को इस्लाम और समाज पसंद नहीं करता है उनमें से कुछ इस प्रकार हैं जैसे दूसरों को कष्ट पहुंचाना, लोगों के मध्य फूट डालना, उपहास करना, असंतुलित बात करना, दूसरों पर आरोप लगाना, कंजूसी, दूसरों की जासूसी करना, घमंड, अत्याचार, विश्वासघात और दूसरों के बारे में ग़लत विचारों की ओर संकेत किया जा सकता है और ये वह चीज़ें हैं जिनकी और पवित्र कुरआन की विभिन्न आयतों में संकेत किया गया है। दूसरी ओर महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन में उनमें से कुछ चीज़ों को भी बयान किया है जिसे इंसान को समाज में अंजाम देना चाहिये। जैसे अमानत का अदा करना, वादे का वफा करना, सच बोलना, अच्छे कार्यों में एक दूसरे की सहायता करना, परोपकार, विन्रमता, सुशील व्यवहार, न्याय,दूसरों को क्षमा कर देना और विचार विमर्श। इन चीज़ों को विचार करने से भलिभांति समझा जा सकता है कि इन चीज़ों का ध्यान रखना सामाजिक संबंधों के बेहतर बनाने में कितना प्रभावी है। उदाहरण स्वरूप जो इंसान दूसरों की गलतियों की अनदेखी कर देता है उसे माफ कर देता है यह भी भलाई व परोपकार है और इस कार्य से ग़लती करने वाले व्यक्ति के लिए यह संभावना उत्पन्न हो जाती है कि वह अपने को सुधारने का प्रयास करता है। दूसरे शब्दों में दूसरों की ग़लतियों को माफ करने वाला ग़लती करने वाले व्यक्ति को परिपूर्णता का मार्ग तय करने के लिए अवसर प्रदान करता है और उसका प्रभाव स्वयं माफ करने वाले पर भी पड़ता है। क्योंकि इंसान एक बंद वातावरण में नहीं रहता है और भौतिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति सामाजिक संबंधों के माध्यम से एक स्वाभाविक चीज़ है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

    इस्लाम के अनुसार इंसान के सामाजिक संबंध को सोच विचार के चरण में प्रेम, शुभ चिन्ता और सदभावना पर आधारित होना चाहिये। इसका अर्थ यह है कि एक मुसलमान को अपने दूसरे मुसलमान भाई के संबंध में अच्छा विचार रखना चाहिये। अपने विचार में शुभ चिन्ता, नसीहत, दोस्ती और भलाई को जन्म दे और उनके विरूद्ध षडयंत्र रचने से परहेज़ करे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस संदर्भ में फरमाते हैं ईश्वर इस बात को पसंद करता है कि इंसान अपने जैसे दूसरे इंसानों के बारे में अच्छा खयाल रखे”

    इस्लाम ने अमल के चरण में भी दायित्वों को सामाजिक संबंधों का आधार बनाया है। इसका मूल आधार महान ईश्वर पर ईमान और इंसान की आत्मा की मजबूती है। इस्लाम धर्म की शिक्षाएं इस संबंध में मनुष्य की प्रकृति व प्रवृत्ति से इस सीमा तक सूक्ष्म व समन्वित हैं कि अगर उस पर अमल किया जाये तो मानव जीवन की तस्वीर बदल सकती है। महान ईश्वर ने एक इंसान का दूसरे इंसान से दोस्ती का सबसे अच्छा मापदंड ईमान बताया है। क्योंकि मोमिनों के गैर मोमिनों से संबंधों से नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इंसान जिस सीमा तक प्रभाव डाल सकता है उसी सीमा तक दूसरों से प्रभाव स्वीकार भी सकता है। इस आधार पर दोस्ती के लिए ईमान की शर्त पर बल दिया जाता है। उदाहरण स्वरूप पवित्र कुरआन के सूरये नेसा की ४४वीं आयत में हम पढते हैं” हे ईमान लाने वालों मोमिनों के बजाये काफिरों से दोस्ती मत करो क्या तुम ईश्वर के समक्ष अपने विरुद्ध स्पष्ट निशानी उपलब्ध करना चाहते हो”

    सामाजिक व्यवहार एवं लेनदेन का मूलभूत आधार यह है कि इंसान दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार व बर्ताव करे। न्याय का ध्यान रखे जो चीज़ अपने लिए पसंद करता है वही चीज़ दूसरों के लिए भी पसंद करे और जो चीज अपने लिए पसंद नहीं करता वह चीज दूसरों के लिए भी पसंद नहीं करता लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करे और उनके मामलों पर ध्यान दे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने जेष्ठ सुपुत्र हज़रत इमाम हसन के नाम वसीयत के एक भाग में कहते हैं” स्वयं को अपने और दूसरों के बीच मापदंड बनाओ जो चीज अपने लिए पसंद करते हो वही चीज दूसरों के लिए पसंद करो और जिस चीज को तुम अपने लिए पसंद नहीं करते उसे दूसरों के लिए भी पसंद मत करो। दूसरों पर अत्याचार न करो जिस तरह तुम यह पसंद नहीं करते कि तुम पर अत्याचार किया जाये और दूसरों के साथ अच्छाई करो जिस तरह तुम यह चाहते हो कि तुम्हारे साथ अच्छाई की जाये।

    हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम भी लोगों के साथ संबंध के बारे में फरमाते हैं लोगों के साथ मिलो जुलो उनकी सभाओं में भाग लो लोगों के कार्यों में उनकी सहायता करो अलग थलग न हो जाओ और समाज से कटो नहीं और लोगों से उस तरह बात करो जिस तरह ईश्वर ने कहा है कि लोगों से अच्छी तरह बात करो”

    चूंकि उठना बैठना और दोस्ती का इंसान के व्यक्तित्व के निर्माण पर सीधा प्रभाव पड़ता है इसलिए इस्लाम ने कुछ लोगों के साथ उठने बैठने से मना किया है। जैसे अत्याचारी, अन्यायी, तुच्छ, पापी व अपराधी, कंजूस, भ्रष्ठ, झूठे, अज्ञानी और ईश्वर से शत्रुता रखने वाले व्यक्तियों के साथ उठने बैठने से मना किया है।

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